Pahalgam Terror Attack के 5 घाव! Operation Sindoor से लेकर 'ऑपरेशन महादेव' तक हुआ, 365 दिन बाद फिर भी जख्म हरे
पहलगाम की वादियां आज भी खूबसूरत हैं… नदी आज भी बहती है… पेड़ आज भी हवा में झूमते हैं… लेकिन कुछ परिवारों की जिंदगी में 22 अप्रैल हमेशा के लिए ठहर गया है… एक साल बाद भी… उनकी आंखों में इंतजार है, दिल में दर्द है और एक उम्मीद- कि शायद एक दिन आतंकवाद खत्म होगा…और 22 अप्रैल जैसी तारीख किसी और की जिंदगी में नहीं आएगी.
पहलगाम हमला: एक साल बाद भी जिंदा हैं वो जख्म
Pahalgam Terror Attack First Anniversary: 22 अप्रैल 2025... कश्मीर की वादियों में सुबह हमेशा की तरह शांत थी. पहलगाम की ठंडी हवा में देवदार के पेड़ झूम रहे थे. पर्यटक अपने कैमरों में यादें कैद कर रहे थे. कुछ परिवार चाय की दुकानों पर बैठकर गर्म कहवा पी रहे थे, तो कुछ बच्चे घोड़ों पर बैठकर पहाड़ों की तरफ जा रहे थे... लेकिन किसी को नहीं पता था कि यह सुबह कुछ ही पलों में दर्द की एक ऐसी कहानी बन जाएगी, जिसे पहलगाम कभी भूल नहीं पाएगा.
22 अप्रैल को बैसरन वैली, जिसे मिनी स्विट्जरलैंड भी कहा जाता है, में पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े द रेजिस्टेस फ्रंट (TRF) के तीन हथियारबंद आतंकवादियों ने पर्यटकों पर अंधाधुंध गोलीबारी की थी. इस कायराना हमले में 26 निर्दोष लोगों की मौत हो गई, जिनमें अधिकांश हिंदू पर्यटक थे. मरने वालों में एक स्थानीय मुस्लिम टट्टू (Pony) चालक और एक नेपाली नागरिक भी शामिल था.
इस हमले के जवाब में भारतीय सेना ने 'ऑपरेशन सिंदूर' (Operation Sindoor) शुरू किया था, जिसके तहत सीमा पार आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया गया. इसके अलावा, 'ऑपरेशन महादेव' के दौरान इस हमले में शामिल तीनों आतंकवादियों को सुरक्षा बलों ने मार गिराया था. आज इस हमले की पहली बरसी पर पहलगाम में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं.
पहलगाम के प्रसिद्ध 'सेल्फी पॉइंट' पर एक स्मारक (Memorial) बनाया गया है, जिस पर सभी 26 पीड़ितों के नाम लिखे गए हैं. हमले के एक साल बाद अब धीरे-धीरे घाटी में पर्यटकों की रौनक फिर से लौट रही है, हालांकि बैसरन वैली के कुछ हिस्सों में अब भी सुरक्षा बैरियर लगे हुए.
पहलगाम हमले में किन लोगों की हुई मौत?
पहलगाम हमले में मरने वालों में अधिकतर दिल्ली, गुजरात और महाराष्ट्र के पर्यटक थे. इसमें एक 6 वर्षीय बच्ची 'आरुषि' और एक बुजुर्ग दंपति भी शामिल थे. हमले में एक स्थानीय कश्मीरी गाइड, बशीर अहमद, ने अपनी जान पर खेलकर तीन पर्यटकों को बचाया था. हालांकि, आतंकियों की गोली लगने से उसकी मौत हो गई.
पहलगाम में एक साल बाद अब कैसे हैं हालात?
पहलगाम में अब 'स्मार्ट सर्विलांस' और ड्रोन से निगरानी बढ़ा दी गई है. चन्दनवाड़ी और बैसरन वैली जाने वाले रास्तों पर बायोमेट्रिक चेकपोस्ट लगाए गए हैं. हमले के डर को पीछे छोड़ते हुए इस साल रिकॉर्ड संख्या में पर्यटक कश्मीर पहुंच रहे हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि आतंकियों ने भाईचारा तोड़ने की कोशिश की थी, लेकिन लोग और भी बड़ी संख्या में यहां आकर आतंकियों को जवाब दे रहे हैं.
पहलगाम हमले का घाव सहने वाले पीड़ित परिवारों ने क्या कहा?
1- सरकार ने पूरा नहीं किया वादा: प्रियदर्शिनी आचार्य
22 अप्रैल की तारीख अब सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख नहीं रही. यह उन परिवारों के लिए एक ऐसा दिन बन गया है, जब समय जैसे थम जाता है, यादें लौट आती हैं और दर्द फिर से ताजा हो जाता है. ओडिशा के बालासोर में प्रियदर्शिनी आचार्य आज भी उस दिन को भूल नहीं पाईं. उनके पति प्रशांत कुमार सतपथी उस पहलगाम आतंकी हमले में मारे गए थे. एक साल बीत गया, लेकिन उनके लिए समय जैसे वहीं रुक गया है.
प्रियदर्शिनी की आवाज़ भर आती है जब वो कहती हैं, "मेरे पति पहलगाम आतंकी हमले में मारे गए… एक साल हो गया, लेकिन हर दिन उनकी याद दिलाता है… उनके जाने के बाद सब कुछ बदल गया… मेरी जिंदगी, मेरा सोचने का तरीका…" वो आगे कहती हैं कि उस समय सरकार ने नौकरी, बच्चे की पढ़ाई और आर्थिक सहायता का वादा किया था... लेकिन एक साल बाद भी, इंतजार खत्म नहीं हुआ है… और हर बीतता दिन उन्हें उस अधूरे वादे की याद दिलाता है.
2- हमें न्याय तब मिलेगा, जब हमारा देश आतंकवाद मुक्त होगा: असावरी जगदाले
महाराष्ट्र के पुणे में असावरी जगदाले के लिए 22 अप्रैल एक 'ब्लैक डे' बन गया है. उनके पिता संतोष जगदाले उस हमले में मारे गए थे. असावरी बताती हैं, " उस दिन हम बहुत खुश थे… हमने ट्रिप प्लान की थी… पहलगाम पहुंचे, तस्वीरें ले रहे थे… और सिर्फ एक घंटे में सब बदल गया…" उनकी आवाज़ भारी हो जाती है जब वो उस भयावह पल को याद करती हैं.
असावरी ने कहा, "एक 25 साल का लड़का AK-47 लेकर आता है… और आपसे आपका धर्म पूछता है… हम तय नहीं करते कि हम किस धर्म में जन्म लेंगे… फिर क्यों हमें कलमा पढ़ने के लिए मजबूर किया गया… क्या हमने कभी किसी को हनुमान चालीसा पढ़ने को मजबूर किया?" उनके शब्दों में दर्द भी है, गुस्सा भी और सवाल भी. वो कहती हैं, "लोगों को गोली मार दी गई… हमारी जिंदगी बदल गई… ऑपरेशन सिंदूर हुआ… आतंकियों को खत्म किया गया… लेकिन हमें न्याय तब मिलेगा, जब हमारा देश आतंकवाद मुक्त होगा."
3- एक पिता के लिए आज भी थमा हुआ है वक्त
हर पिता अपने बेटे के लिए सपने देखता है. उसकी सफलता पर गर्व करता है, और उसके भविष्य को लेकर उम्मीदों से भरा रहता है, लेकिन हरियाणा के करनाल में रहने वाले राजेश नरवाल के लिए 22 अप्रैल वो दिन बन गया, जब जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई. उनके बेटे, भारतीय नौसेना के लेफ्टिनेंट विनय नरवाल, पहलगाम आतंकी हमले में शहीद हो गए थे. आज उस दर्दनाक घटना को एक साल पूरा हो जाएगा, लेकिन एक पिता के लिए यह घाव आज भी ताजा है.
राजेश नरवाल उस दिन को याद करते हुए कहते हैं, "मुझे आज भी वो पल याद है… मैं सो रहा था, तभी बुरी खबर आई… उसके बाद जिंदगी, जिंदगी नहीं रही…" उनकी आवाज़ में ठहराव है, लेकिन दर्द साफ महसूस होता है. वो बताते हैं कि उन्हें सच्चाई पता थी, लेकिन दिल मानने को तैयार नहीं था. ऐसा लगता था कि वो वापस आ जाएगा… मुझे पता था कि ऐसा नहीं होगा… लेकिन मेरा मन मानने को तैयार नहीं था…
एक साल बीत गया, लेकिन यादें आज भी उतनी ही ताजा हैं... सबसे ज्यादा दर्द उन अच्छी यादों से होता है, जो अब सिर्फ याद बनकर रह गई हैं. राजेश नरवाल कहते हैं , "बहुत दर्द होता है… क्योंकि मैं उसे याद करता हूं… और उसकी अच्छी यादें ही सबसे ज्यादा परेशान करती हैं…"
22 अप्रैल… किसी के लिए यह एक तारीख है…लेकिन एक पिता के लिए यह वो दिन है… जब बेटे की आवाज़ हमेशा के लिए खामोश हो गई… एक साल बाद भी…घर वही है…कमरा वही है…यादें वही हैं… बस…वो बेटा अब लौटकर नहीं आएगा…
4- एक 22 साल के युवक ने इंसानियत के लिए जान दे दी
22 अप्रैल का दिन कई परिवारों के लिए दर्द लेकर आया था, लेकिन उसी दिन एक ऐसी कहानी भी सामने आई, जिसने दिखाया कि आतंक से बड़ा अगर कुछ है, तो वो इंसानियत है. पहलगाम में 22 साल के सैयद आदिल हुसैन शाह ने उस दिन जो किया, वह आज भी लोगों की आंखें नम कर देता है. आतंकियों की गोलियों के बीच आदिल ने अपनी जान की परवाह किए बिना पर्यटकों को बचाने की कोशिश की… और इसी कोशिश में उन्होंने अपनी जान गंवा दी.
हमले को एक साल पूरा होने पर महाराष्ट्र के मुंबई में डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे ने आदिल के परिवार के लिए नए घर का वर्चुअल उद्घाटन किया. इस दौरान उन्होंने आदिल को याद करते हुए भावुक शब्दों में कहा, "पहलगाम में इंसानियत की हत्या को एक साल हो गया… आज हम एक ऐसे बेटे को याद कर रहे हैं, जिसने अपने परिवार से पहले इंसानियत को चुना… उस दिन 22 साल का आदिल दूसरों को बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डाल रहा था… उसने इंसानियत के लिए अपनी जान दे दी…"
एकनाथ शिंदे ने आदिल के परिवार को भरोसा दिलाते हुए कहा कि महाराष्ट्र सरकार हमेशा उनके साथ खड़ी रहेगी. उन्होंने कहा, "मैं आदिल के माता-पिता और पूरे परिवार को भरोसा देता हूं कि हम हमेशा आपके साथ हैं… और आगे भी रहेंगे…"
वहीं पहलगाम में आदिल के पिता हैदर शाह ने भी भावुक होकर महाराष्ट्र सरकार का धन्यवाद किया. उन्होंने कहा, "हम महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे के बहुत आभारी हैं… उन्होंने घर में जरूरी हर चीज दी…" लेकिन उनके शब्दों में सबसे ज्यादा जो बात दिल को छू जाती है, वो यह थी , "आदिल ने ना हिंदू देखा, ना मुस्लिम, ना सिख… उसने बिना कुछ सोचे अपनी जान दे दी… सबको इंसानियत जिंदा रखनी चाहिए…"
22 अप्रैल…एक तरफ दर्द था…एक तरफ आंसू थे…लेकिन उसी दिन…एक 22 साल का युवक इंसानियत की सबसे बड़ी मिसाल बन गया. उसने दिखा दिया - धर्म से ऊपर अगर कुछ है…तो वो है… इंसानियत.. और शायद इसलिए…एक साल बाद भी… आदिल सिर्फ एक नाम नहीं…बल्कि उम्मीद बन चुका है…कि आतंक के बीच भी इंसानियत जिंदा है…
5- जब एक पत्नी की जिंदगी हमेशा के लिए बदल गईं
पुणे की संगीता गनबोटे के लिए 22 अप्रैल सिर्फ एक तारीख नहीं है… यह वह दिन है, जिसने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी. उनके पति कौस्तुभ गनबोटे पहलगाम आतंकी हमले में मारे गए थे. एक साल बीत गया, लेकिन उस दिन का डर और दर्द आज भी उनके साथ है. संगीता गनबोटे उस भयावह दिन को याद करते हुए कहती हैं, "पहलगाम में हुआ हमला बहुत खतरनाक था… मैं उसे अपनी आखिरी सांस तक नहीं भूल पाऊंगी." उनकी आवाज़ में दर्द साफ झलकता है। पति के जाने के बाद उनका जीवन जैसे ठहर सा गया है.
संगीता गनबोटे ने कहा, "मेरे पति की मौत के बाद मैं हमेशा दुख में रहती हूं… जिंदगी पहले जैसी नहीं रही…" लेकिन इस दर्द के बीच भी उन्होंने एक बड़ी बात कही. संगीता ने आतंकियों को संदेश देते हुए कहा कि आम लोगों को निशाना बनाकर कुछ हासिल नहीं किया जा सकता. उन्होंने कहा, "अगर उनकी लड़ाई सरकार से है, तो उन्हें सरकार से बात करनी चाहिए… आम लोगों को मारने से कुछ हासिल नहीं होगा…" उनकी यह बात सिर्फ एक पीड़ित परिवार की आवाज़ नहीं, बल्कि उन सभी लोगों की भावना है, जो आतंकवाद से प्रभावित हुए हैं.
संगीता गनबोटे ने भविष्य को लेकर भी एक महत्वपूर्ण सुझाव दिया. उन्होंने कहा कि स्कूलों में बच्चों को सिर्फ पढ़ाई ही नहीं, बल्कि ऐसे हमलों के दौरान कैसे खुद को सुरक्षित करें, यह भी सिखाया जाना चाहिए.
22 अप्रैल को एक पत्नी ने अपना जीवनसाथी खो दिया…एक परिवार ने अपना सहारा खो दिया… एक साल बाद भी…यादें ताजा हैं…आंसू बाकी हैं…और एक सवाल भी - क्या मासूम लोगों की जान लेकर कभी कोई लड़ाई जीती जा सकती है? शायद इस सवाल का जवाब ही आतंकवाद के खिलाफ सबसे बड़ा संदेश है…
पहलगाम की वादियां आज भी खूबसूरत हैं… नदी आज भी बहती है… पेड़ आज भी हवा में झूमते हैं… लेकिन कुछ परिवारों की जिंदगी में 22 अप्रैल हमेशा के लिए ठहर गया है… एक साल बाद भी… उनकी आंखों में इंतजार है, दिल में दर्द है और एक उम्मीद- कि शायद एक दिन आतंकवाद खत्म होगा…और 22 अप्रैल जैसी तारीख किसी और की जिंदगी में नहीं आएगी.




