Apple को बचाने के लिए Steve Jobs ने Nike से क्या सीखा? कहानी 1997 के टाउनहॉल मीटिंग की
Steve Jobs ने 1997 में Apple में लौटने के बाद कंपनी को बचाने के लिए सबसे पहले ब्रांड की पहचान सुधारने पर ध्यान दिया. उन्होंने Nike का उदाहरण देते हुए बताया कि मार्केटिंग फीचर्स नहीं, भावनाओं और वैल्यू पर आधारित होनी चाहिए.
फीचर्स नहीं, इमोशन बेचो- Steve Jobs का मार्केटिंग मंत्र
(Image Source: Sora_ AI )"सिर्फ नए प्रोडक्ट बनाना काफी नहीं होगा. कंपनी की ब्रांड इमेज को भी फिर से मजबूत करना पड़ेगा. Apple की पहचान कमजोर पड़ चुके हैं. इसे वापस लाना जरूरी है. इसके लिए हमें Nike से प्रेरणा लेने की जरूरत है, जो दुनिया की सबसे बेहतरीन मार्केटिंग करने वाली कंपनियों में से एक है..." यह बात स्टीव जॉब्स ने 1997 में Apple में अपनी नाटकीय वापसी के बाद कर्मचारियों के साथ टाउनहॉल में हुई मीटिंग के दौरान कही. उस समय कंपनी दिवालिया होने की कगार पर थी.
स्टीव जॉब्स ने कर्मचारियों को समझाया कि मार्केटिंग का मतलब फीचर या स्पेसिफिकेशन बताना नहीं, बल्कि कंपनी की सोच और वैल्यू बताना है. उन्होंने कहा कि दुनिया बहुत शोर से भरी है, इसलिए कोई भी कंपनी लोगों को ज्यादा बातें याद नहीं करा सकती. ऐसे में जरूरी है कि लोग आपके बारे में एक साफ और मजबूत संदेश याद रखें.
स्टीव जॉब्स ने Apple कर्मचारियों से क्या कहा?
- स्टीव जॉब्स ने कर्मचारियों से साफ कहा कि Apple को यह बताना बंद करना होगा कि उसके कंप्यूटर कितने तेज हैं या Windows से बेहतर क्यों हैं.
- Nike का उदाहरण देते हुए जॉब्स ने कहा कि वह जूते बेचती है, जो एक आम प्रोडक्ट है, लेकिन उसके विज्ञापन प्रोडक्ट नहीं बल्कि खिलाड़ियों और खेल की भावना को दिखाते हैं. इसी वजह से लोग Nike को सिर्फ शू कंपनी नहीं, बल्कि जुनून और उपलब्धि की पहचान मानते हैं.
- जॉब्स ने कहा कि Apple भी लोगों को यह एहसास दिलाए कि वह सिर्फ कंप्यूटर बनाने वाली कंपनी नहीं, बल्कि दुनिया बदलने का सपना देखने वालों के लिए है.
- जॉब्स ने Apple की असली पहचान बताते हुए कहा कि कंपनी उन लोगों पर भरोसा करती है जिनमें जुनून है और जो दुनिया को बेहतर बनाना चाहते हैं. यही सोच बाद में Apple के मशहूर 'Think Different' अभियान की नींव बनी.
- जॉब्स का मानना था कि तकनीकी ताकत से ज्यादा महत्वपूर्ण रचनात्मकता और सोच है.
FAQ
क्या Nike भी जॉब्स की सोच से प्रभावित थी?
दिलचस्प बात यह है कि Nike भी जॉब्स की सोच से प्रभावित थी. जब Mark Parker 2006 में Nike के CEO बने, तो उन्होंने सलाह के लिए जॉब्स को फोन किया. जॉब्स ने उन्हें साफ कहा कि कंपनी बेहतरीन प्रोडक्ट बनाती है, लेकिन कई बेकार चीजें भी बनाती है, इसलिए कमजोर प्रोडक्ट हटाकर सिर्फ अच्छे पर ध्यान देना चाहिए. Parker ने बाद में माना कि यही सलाह Nike के लिए बेहद काम की साबित हुई.
1997 में वापसी के बाद Steve Jobs ने Apple को बचाने का प्लान कैसे बनाया?
1997 में कंपनी में लौटते ही जॉब्स ने कहा कि सबसे पहले प्रोडक्ट नहीं, ब्रांड की इमेज ठीक करनी होगी. उनका मानना था कि लोग Apple को भूलते जा रहे हैं, इसलिए पहचान वापस बनाना जरूरी है.
मार्केटिंग पर जॉब्स की सबसे बड़ी सीख क्या थी?
जॉब्स ने कहा कि मार्केटिंग फीचर्स बताने का नाम नहीं, वैल्यू और भावनाओं से जुड़ने का तरीका है. दुनिया बहुत शोर से भरी है, इसलिए लोगों के दिमाग में जगह बनाने के लिए साफ संदेश देना जरूरी है.
जॉब्स ने टेक्निकल बातें करने से क्यों मना किया?
जॉब्स ने कहा कि प्रोसेसर, स्पीड, मेमोरी जैसी बातें आम लोगों को याद नहीं रहतीं. ब्रांड को याद रखने लायक बनाना है तो कहानी और मकसद बताओ, स्पेसिफिकेशन नहीं.
इंस्पिरेशन के लिए जॉब्स ने Nike को क्यों चुना?
जॉब्स के मुताबिक Nike जूते बेचती है, जो एक साधारण चीज है, लेकिन उसकी मार्केटिंग लोगों को खिलाड़ियों और जुनून से जोड़ देती है. Nike अपने प्रोडक्ट की नहीं, एथलीट्स की कहानी दिखाती है. यही उसकी ताकत है.
Apple को लेकर जॉब्स की असली सोच क्या थी?
जॉब्स ने कहा Apple सिर्फ कंप्यूटर बनाने वाली कंपनी नहीं है, बल्कि ऐसे लोगों के लिए है जो दुनिया बदलने का जुनून रखते हैं. यही सोच बाद में 'Think Different' जैसी पहचान बनी.
Nike के CEO को जॉब्स ने क्या सलाह दी थी?
जब Mark Parker CEO बने, तो उन्होंने जॉब्स से सलाह ली. जॉब्स ने कहा, “आप बेहतरीन प्रोडक्ट भी बनाते हो और बहुत बेकार भी. खराब चीजें हटाओ और अच्छे पर फोकस करो.” यही एडिटिंग Nike के लिए गेम-चेंजर साबित हुई.