Saudi डिफेंस मिनिस्टर की पाक के असीम मुनीर से मुलाकात, Iran के खिलाफ जंग में होने वाला है कुछ बड़ा खेला, क्या हैं मायने?
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर ने सऊदी अरब के रक्षा मंत्री खालिद बिन सलमान से अहम मुलाकात की है. इस मुलाकात के कई मतलब निकाले जा रहे हैं. इसके साथ ही सवाल उठ रहा है कि अगर सऊदी अरब ईरान के खिलाफ हमले करता है तो क्या पाकिस्तान उसका साथ देगा.
Pakistan in Iran War: पाकिस्तान के सेना प्रमुख और देश के वास्तविक ताकतवर नेता माने जाने वाले असीम मुनीर ने सऊदी अरब के रक्षा मंत्री खालिद बिन सलमान से मुलाकात की है. यह मुलाकात ऐसे समय में हुई है जब मध्य पूर्व में हालात तेजी से बदल रहे हैं. ये पाकिस्तान के लिए असमंजस का वक्त है, एक तरफ सऊदी है जिसे उसने सुरक्षा देने का वादा किया है तो वहीं दूसरी तरफ ईरान है, जिसके साथ कहीं न कहीं धार्मिक सेंटिमेंट्स जुड़े हुए हैं.
कुछ दिन पहले सऊदी अरब की अरामको ऑयल रिफाइनरी पर हमला हुआ था. इसके बाद से ही माना जा रहा है कि सऊदी ईरान के खिलाफ एक्शन ले सकता है. ज्ञात हो कि 28 फरवरी तो अमेरिका-इजरायल के संयुक्त हमलों में ईरान के अली खामेनेई की मौत के बाद तेहरान ने पूरे मध्य पूर्व में जोरदार सैन्य जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी थी.
इस मुलाकात पर क्या बोले रक्षा मंत्री?
सऊदी रक्षा मंत्री खालिद बिन सलमान ने इस मुलाकात की जानकारी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर दी. उन्होंने असीम मुनीर के साथ एक तस्वीर साझा करते हुए लिखा कि पाकिस्तान के सेना प्रमुख और रक्षा बलों के प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर से मुलाकात हुई.
इसके साथ ही उन्होंने कहा कि दोनों नेताओं ने सऊदी अरब पर हुए ईरानी हमलों और उन्हें रोकने के लिए संयुक्त रणनीतिक रक्षा समझौते के तहत उठाए जाने वाले कदमों पर चर्चा की. इस तरह की कार्रवाई क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता को कमजोर करती है और उम्मीद जताई कि ईरान समझदारी दिखाएगा और कोई गलत कदम नहीं उठाएगा.
क्या है इस बैठक के मतलब?
विशेषज्ञों के अनुसार यह बैठक रणनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है. कुछ महीने पहले ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि तुर्की ने परमाणु हथियारों से लैस पाकिस्तान और सऊदी अरब के साथ त्रिकोणीय रक्षा गठबंधन बनाने का प्रस्ताव दिया था, जिसे 'इस्लामिक नाटो' जैसा ढांचा बताया गया. इस पहल का मकसद मध्य पूर्व और उससे बाहर बदलते सुरक्षा समीकरणों को नए तरीके से तैयार करना बताया गया था.
अब जब ईरान लगातार मिसाइल और ड्रोन हमले कर रहा है, तब यह सवाल उठ रहा है कि क्या पाकिस्तान केवल बयान देने तक सीमित रहेगा या इससे आगे भी कोई कदम उठाएगा. इसकी वजह पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच 2025 का रणनीतिक आपसी रक्षा समझौता भी है.
पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच क्या है समझौता?
यह समझौता मूल रूप से सितंबर में पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच हुआ था. रिपोर्ट के अनुसार इसमें कहा गया है कि अगर किसी एक देश पर हमला होता है तो उसे सभी सदस्यों पर हमला माना जाएगा. यह प्रावधान नाटो के आर्टिकल 5 जैसा माना जाता है, जिसके तहत सदस्य देश सामूहिक रक्षा के लिए प्रतिबद्ध होते हैं.
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार तुर्की को भी इस व्यवस्था में शामिल करने पर बातचीत काफी आगे बढ़ चुकी है और समझौता होने की संभावना जताई जा रही है. रिपोर्ट में कहा गया है कि यह विस्तार दक्षिण एशिया, मध्य पूर्व और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान के बढ़ते रणनीतिक हितों को दर्शाता है.
क्या पाकिस्तान उठाएगा कोई कदम?
हालांकि सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या पाकिस्तान वास्तव में कोई सैन्य कदम उठाएगा. इस समझौते में सामूहिक रक्षा की बात जरूर है, लेकिन इसके मुख्य प्रावधान पारंपरिक सहयोग जैसे संयुक्त सैन्य अभ्यास, खुफिया जानकारी साझा करना और ड्रोन तकनीक से जुड़े सहयोग पर केंद्रित हैं. इसमें परमाणु हथियारों से जुड़े किसी वादे का जिक्र नहीं है.
पाकिस्तान अगर सऊदी अरब में सेना भेजता है तो क्या होगा?
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से फोन पर बात करते हुए एकजुटता दिखाई थी और शांति के प्रयासों का समर्थन करने की बात कही, लेकिन किसी सैन्य तैनाती का जिक्र नहीं किया. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर पाकिस्तान सेना भेजता है तो वह खुद एक बड़े युद्ध में फंस सकता है, जिससे उसकी पहले से कमजोर अर्थव्यवस्था और सुरक्षा हालात पर और दबाव बढ़ सकता है.




