UP में बिछने लगी 2027 की बिसात! अखिलेश सतर्क, मायावती अलग, कांग्रेस किस करवट?
यूपी विधानसभा चुनाव 2027 से पहले सपा, बसपा और कांग्रेस के रिश्तों में दूरी बढ़ती दिख रही है. अखिलेश सतर्क हैं, मायावती अलग राह पर चल रही हैं. अहम सवाल- कांग्रेस क्या करे?
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में अभी करीब आठ महीने का समय बाकी है, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी बिसात बिछानी शुरू कर दी है. पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु की राजनीति से मिले संकेतों ने यूपी की रणनीति को भी प्रभावित किया है. समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव अब कांग्रेस से दूरी बनाते हुए “सॉफ्ट हिंदुत्व” की लाइन पर आगे बढ़ते दिखाई दे रहे हैं, जबकि कांग्रेस दलित वोट बैंक को साधने के लिए मायावती तक पहुंचने की कोशिश में लगी है. लेकिन मायावती ने मुलाकात से इनकार कर साफ संकेत दे दिया कि बसपा फिलहाल अकेले चलने की नीति पर कायम है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अगर सपा और बसपा दोनों कांग्रेस से दूरी बनाए रखते हैं तो यूपी में विपक्षी एकता का भविष्य क्या होगा?
1. अखिलेश क्यों हुए सतर्क?
पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु की राजनीति ने उत्तर प्रदेश की सियासत पर असर डालना शुरू कर दिया है. खासकर कांग्रेस के राहुल गांधी द्वारा डीएमके से अलग टीवीके प्रमुख थलापति विजय के साथ बढ़ती नजदीकियों को अखिलेश यादव ने गंभीरता से लिया. इसके बाद अखिलेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर लिखा था, “हम वो नहीं जो मुश्किलों में साथ छोड़ दें.”
यूपी के सियासी जानकारों का मानना है कि अखिलेश अब यह संदेश देना चाहते हैं कि समाजवादी पार्टी यूपी में अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाए रखेगी. इसी कारण वह कांग्रेस के साथ सीट शेयरिंग और गठबंधन की राजनीति को लेकर सतर्क दिखाई दे रहे हैं. बंगाल और तमिलनाडु के अनुभवों ने उन्हें यह एहसास कराया है कि क्षेत्रीय दलों को राष्ट्रीय दलों से बराबरी की दूरी बनाकर चलना होगा.
2. सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पर क्यों बढ़ रही समाजवादी पार्टी?
2024 लोकसभा चुनाव के बाद समाजवादी पार्टी ने महसूस किया कि सिर्फ मुस्लिम-यादव समीकरण पर टिके रहना 2027 में पर्याप्त नहीं होगा. इसी वजह से अखिलेश यादव अब मंदिर, भंडारा, धार्मिक आयोजनों और सांस्कृतिक प्रतीकों को लेकर पहले की तुलना में ज्यादा सक्रिय दिखाई दे रहे हैं.
सपा अब भाजपा के हिंदुत्व नैरेटिव का सीधा विरोध करने के बजाय “सॉफ्ट हिंदुत्व” की रणनीति अपना रही है. इसका मकसद गैर-यादव पिछड़ी जातियों और सवर्ण हिंदू वोटरों के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाना है. यही वजह है कि पार्टी कांग्रेस के साथ ज्यादा नजदीकी दिखाने से भी बच रही है, क्योंकि उसे डर है कि इससे उसका नया सामाजिक समीकरण प्रभावित हो सकता है.
3. कांग्रेस ने मायावती की तरफ क्यों बढ़ाया ‘हाथ’?
इसी बीच कांग्रेस ने बसपा प्रमुख मायावती तक पहुंचने की कोशिश कर नई राजनीतिक चर्चा छेड़ दी. कांग्रेस सांसद तनुज पुनिया और कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेंद्र पाल गौतम मंगलवार को मायावती से मिलने उनके आवास पहुंचे.
हालांकि, दोनों नेताओं की मुलाकात मायावती से नहीं हो सकी. राजेंद्र पाल गौतम ने सोशल मीडिया पर लिखा कि वे मायावती का हालचाल जानने पहुंचे थे, लेकिन मुलाकात नहीं हो पाई. वहीं तनुज पुनिया ने कहा कि कांग्रेस बैठक के दौरान पता चला था कि मायावती की तबीयत ठीक नहीं है, इसलिए शिष्टाचार मुलाकात के लिए गए थे. भले ही कांग्रेस इसे सामान्य मुलाकात बता रही हो, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे दलित राजनीति के नए समीकरण के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है.
4. मायावती ने मुलाकात से इनकार कर क्या संदेश दिया?
बसपा सुप्रीमो मायावती लंबे समय से “एकला चलो” की नीति पर कायम हैं. उन्होंने पहले भी कई बार कांग्रेस पर हमला बोला है और साफ किया है कि बसपा किसी के पीछे चलने वाली पार्टी नहीं है. ऐसे में कांग्रेस नेताओं से मुलाकात से इनकार को राजनीतिक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है.
मायावती यह संकेत देना चाहती हैं कि बसपा अभी किसी गठबंधन की राजनीति में दिलचस्पी नहीं रखती. खास बात यह है कि बसपा का कोर वोट बैंक अभी भी दलित समाज का एक बड़ा हिस्सा है और मायावती नहीं चाहतीं कि कांग्रेस उसकी राजनीतिक हिस्सेदारी में सेंध लगाए. यही वजह है कि कांग्रेस नेताओं को समय न देकर बसपा ने साफ कर दिया कि फिलहाल वह अपने दम पर चुनाव लड़ने की तैयारी में है.
5. कांग्रेस की सबसे बड़ी चिंता दलित वोट बैंक क्यों?
कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती यूपी में अपना खोया सामाजिक आधार वापस पाना है. पार्टी को लगता है कि अगर दलित वोट बैंक का एक हिस्सा भी उसके साथ आता है तो वह भाजपा और सपा दोनों के खिलाफ मजबूत स्थिति बना सकती है. इसी रणनीति के तहत कांग्रेस लगातार संविधान, दलित अधिकार और सामाजिक न्याय के मुद्दे उठा रही है. कांग्रेस नेताओं का कहना है कि भाजपा संविधान बदलना चाहती थी और यूपी में दलितों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों पर अत्याचार बढ़े हैं.
कांग्रेस यह भी मानती है कि 2024 लोकसभा चुनाव में INDIA गठबंधन ने भाजपा को यूपी में चुनौती दी थी, इसलिए 2027 में भी समान विचारधारा वाले दलों को साथ आना चाहिए. लेकिन समस्या यह है कि न सपा पूरी तरह भरोसा दिखा रही है और न ही बसपा गठबंधन को तैयार है. इस बात को ध्यान में रखते हुए राहुल गांधी ने लगातार दो दिन यूपी में रहे. इस दौरान उन्होंने अमेठी और रायबरेली में जनसभा को संबोधित किया. उन्होंने आरएसएस और बीजेपी को चुनौती देते हुए कहा वो कुछ भी कर लें, कांग्रेस दलितों और वंचितों की हितों में अपना संघर्ष जारी रखेगी.
6. कांग्रेस के साथ गठबंधन में सपा और बसपा का पुराना अनुभव कैसा रहा?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस के साथ गठबंधन का इतिहास क्षेत्रीय दलों के लिए बहुत उत्साहजनक नहीं रहा है. उसका असर आगामी चुनाव को लेकर अभी से दिखने भी लगा है.
1996: कांग्रेस-बसपा गठबंधन
1993 में सपा के साथ गठबंधन कर बसपा ने 67 सीटें जीती थीं. इसके बाद 1996 में बसपा ने कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ा. इस चुनाव में बसपा को 67 सीटें और लगभग 27.73 प्रतिशत वोट मिले. कांग्रेस को सिर्फ 33 सीटें मिलीं. हालांकि, चुनाव बाद मायावती ने कांग्रेस का साथ छोड़कर भाजपा के समर्थन से सरकार बना ली. यानी इस गठबंधन से बसपा को फायदा हुआ, लेकिन कांग्रेस को कोई बड़ा राजनीतिक लाभ नहीं मिला.
2017: कांग्रेस-सपा गठबंधन
2017 विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया था. उस समय “यूपी को ये साथ पसंद है” जैसे नारे भी चले थे, लेकिन नतीजा उल्टा निकला. भाजपा 300 से ज्यादा सीटें जीत गई. कांग्रेस सिर्फ 7 सीटों पर सिमट गई जबकि सपा को 47 सीटें मिलीं. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस के साथ गठबंधन से सपा का पारंपरिक वोट बैंक पूरी तरह ट्रांसफर नहीं हुआ और भाजपा ने इसका फायदा उठा लिया. यही वजह है कि अब अखिलेश छोटे दलों के साथ गठबंधन की रणनीति को ज्यादा सुरक्षित मान रहे हैं.
7. 2027 में विपक्षी एकता का भविष्य क्या होगा?
फिलहाल यूपी की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या 2027 में विपक्षी दल एक मंच पर आएंगे या अलग-अलग चुनाव लड़ेंगे. सपा और बसपा दोनों कांग्रेस से दूरी बनाए हुए हैं. मायावती गठबंधन के मूड में नहीं दिख रहीं, जबकि अखिलेश यादव सीट शेयरिंग को लेकर स्पष्ट संदेश दे चुके हैं कि गठबंधन “जीत” के आधार पर होगा.
ऐसे में कांग्रेस की स्थिति सबसे मुश्किल नजर आती है. पार्टी के पास संगठन कमजोर है, लेकिन वह दलित और अल्पसंख्यक वोटरों के जरिए अपनी जमीन वापस पाने की कोशिश कर रही है. दूसरी तरफ सपा अपने सामाजिक समीकरण को हिंदुत्व के नए संतुलन के साथ आगे बढ़ाना चाहती है.
अगर विपक्षी दल अलग-अलग चुनाव लड़ते हैं तो इसका सबसे बड़ा फायदा भाजपा को मिल सकता है. लेकिन अगर चुनाव से पहले कोई बड़ा सामाजिक या राजनीतिक समीकरण बनता है, तो यूपी की लड़ाई पूरी तरह बदल भी सकती है. फिलहाल इतना तय है कि बंगाल और तमिलनाडु के बाद अब उत्तर प्रदेश में भी 2027 की राजनीतिक शतरंज सज चुकी है.




