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UP में अब सिर्फ Yadav vs Non-Yadav नहीं: छोटे caste clusters तय करेंगे सत्ता?

UP Elections 2027 में छोटे कास्ट क्लस्टर निर्णायक बन रहे हैं. जानें BJP, SP और छोटे दल किस जातीय गणित पर सत्ता की रणनीति बना रहे हैं.

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पहले बिहार, अब बंगाल, तमिलनाडु और केरल विधानसभा चुनावों ने सियासी दलों की नींद उड़ दी है. यही वजह है 2027 में उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में बदलाव अभी से दिखने लगे हैं. यूपी में लंबे समय तक यादव बनाम गैर-यादव, जाटव बनाम गैर-जाटव और हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण के इर्द-गिर्द घूमती रही, लेकिन 2027 विधानसभा चुनाव से पहले तस्वीर तेजी से बदल रही है. बड़ी जातियों के साथ-साथ छोटे जातीय समूह यानी “कास्ट क्लस्टर” चुनावी राजनीति में निर्णायक बनते जा रहे हैं. इसे साधने में प्रदेश के सभी प्रमुख दल अभी से जुट गए हैं.

निषाद, कुर्मी, मौर्य, राजभर, सैनी, कश्यप, लोध, पासी और पटेल जैसे समुदाय अब केवल वोट बैंक नहीं, बल्कि सत्ता की चाबी माने जा रहे हैं. यही कारण है कि BJP, SP, BSP और छोटे क्षेत्रीय दल अब बूथ स्तर पर माइक्रो सोशल इंजीनियरिंग में जुटे हैं. यूपी के राजनीतिक दलों के नेता समझ चुके हैं कि अब सिर्फ एक बड़ी जाति के सहारे सत्ता नहीं मिलती, बल्कि दर्जनों छोटे जातीय क्लस्टर मिलकर चुनावी नतीजे तय करते हैं.

क्या होता कास्ट क्लस्टर?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में कास्ट क्लस्टर का मतलब ऐसे छोटे जातीय समूहों से है, जिनकी आबादी किसी जिले, क्षेत्र या 20-30 विधानसभा सीटों पर निर्णायक असर डालती है. ये समुदाय राज्य स्तर पर भले बहुत बड़े न दिखें, लेकिन स्थानीय चुनावी गणित में बेहद अहम होते हैं.

जैसे पूर्वांचल में राजभर, निषाद और बिंद समुदाय असर रखते हैं. पश्चिमी यूपी में गुर्जर, सैनी और जाटव समीकरण अहम हैं. अवध और बुंदेलखंड में कुर्मी, लोध और पासी वोट निर्णायक माने जाते हैं.

अब पार्टियां केवल ओबीसी या दलित जैसे बड़े वर्गों की बात नहीं करतीं, बल्कि हर छोटे समूह के हिसाब से टिकट, संगठन और चुनावी नैरेटिव तैयार करती हैं. इसे ही माइक्रो सोशल इंजीनियरिंग कहा जाता है.

छोटे दल क्यों अहम?

उत्तर प्रदेश में कई छोटे दल अपने सीमित वोट बैंक के बावजूद बड़ी पार्टियों के लिए जरूरी बन गए हैं. जैसे :

  • सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी राजभर वोटों पर असर रखती है.
  • निषाद पार्टी मछुआरा और निषाद समुदाय में प्रभाव रखती है.
  • अपना दल (एस) कुर्मी-पटेल वोटों में पकड़ रखती है.
  • राष्ट्रीय लोक दल पश्चिमी यूपी में जाट वोटों को प्रभावित करती है.

इन दलों का वोट प्रतिशत भले 1 से 4% तक हो, लेकिन कई सीटों पर यही वोट जीत-हार तय कर देते हैं. इसी कारण BJP और SP दोनों छोटे दलों के साथ गठबंधन को रणनीतिक हथियार मानते हैं.

किस जाति के कितने वोट?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय समीकरण बेहद जटिल माने जाते हैं. यादव समुदाय की आबादी करीब 9-10% मानी जाती है, जबकि कुर्मी-पटेल लगभग 7-8% हैं. जाटव वोट करीब 10-11% और गैर-जाटव दलित समुदाय लगभग 11-12% तक माना जाता है. इसके अलावा राजभर 2-3%, निषाद और मछुआरा समुदाय 3-4%, लोध 2-3% और मौर्य-कुशवाहा-सैनी समूह करीब 7-8% प्रभाव रखते हैं. सवर्ण वर्ग में ब्राह्मण लगभग 9-10% और ठाकुर 6-7% माने जाते हैं. वहीं मुस्लिम आबादी करीब 19% के आसपास है.

यही वजह है कि यूपी में अब कोई एक जाति अकेले चुनावी जीत तय नहीं कर सकती. पहले जहां यादव, जाटव या सवर्ण वोटों के बड़े ध्रुवीकरण से सत्ता का रास्ता बनता था, वहीं अब छोटे-छोटे सामाजिक समूह यानी कास्ट क्लस्टर चुनावी परिणामों में निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं. राजनीतिक दल अब बूथ स्तर तक जातीय गणित बनाकर रणनीति तैयार कर रहे हैं. यही कारण है कि छोटे दल और छोटे समुदाय आज यूपी की सत्ता की राजनीति में किंगमेकर की भूमिका में दिखाई देने लगे हैं.

क्यों बदल रहा पैटर्न?

पहले चुनाव बड़े जातीय ध्रुवीकरण पर लड़े जाते थे. लेकिन अब युवा मतदाता, सरकारी योजनाएं, स्थानीय नेतृत्व और सामाजिक सम्मान जैसे मुद्दे भी प्रभाव डाल रहे हैं.

भारतीय जनता पार्टी ने गैर-यादव OBC और गैर-जाटव दलित वोटों पर मजबूत पकड़ बनाई. दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी अब PDA यानी पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक समीकरण के जरिए छोटे समुदायों को जोड़ने की कोशिश कर रही है.

इसी बीच छोटे जातीय समूह भी अब अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी खुलकर मांग रहे हैं. उन्हें सिर्फ वोट बैंक नहीं, बल्कि सत्ता में प्रतिनिधित्व चाहिए. यही वजह है कि अब हर दल छोटे कास्ट क्लस्टर को साधने में जुटा है.

2027 में क्या असर होगा?

2027 विधानसभा चुनाव में वही पार्टी बढ़त बना सकती है, जो छोटे जातीय समूहों को बेहतर तरीके से जोड़ पाएगी. BJP का फोकस लाभार्थी योजनाओं और हिंदुत्व के साथ गैर-यादव OBC पर है. SP PDA मॉडल से सामाजिक गठजोड़ मजबूत करना चाहती है. BSP अब भी जाटव कोर वोट बचाने में लगी है, जबकि चंद्रशेखर आजाद दलित युवाओं में नई जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यूपी में अब “एक जाति बनाम दूसरी जाति” का दौर कमजोर हो रहा है. आने वाले चुनाव में छोटे-छोटे कास्ट क्लस्टर, स्थानीय समीकरण और माइक्रो वोट ट्रांसफर ही सत्ता का रास्ता तय करेंगे.

जाति नहीं 'विकास' पर फोकस - अवनीश त्यागी

यूपी बीजेपी के प्रवक्ता अवनीश त्यागी ने यह पूछे जाने पर कि डबल इंजन की सरकार को कास्ट क्लसटर्स पर जोर देने की जरूरत क्यों पड़ी, के जवाब में कहा, 'बीजेपी कास्ट पॉलिटिक्स में विश्वास नहीं करती है. पार्टी की रणनीति सबका साथ, सबका विकास और सभी का विश्वास हासिल करना है. इसके लिए बीजेपी की केंद्र सरकार अलग-अलग योजनाओं पर जोर देती आई है.' इसी रणनीति के तहत सभी वर्गों के लोगों को पार्टी से जोड़ने का काम करती है. फिर, बीजेपी जैसी पार्टी किसी जाति या समुदाय की अनदेखी नहीं कर सकती. पार्टी की रणीनति सभी को साथ लेकर चलने की है. वही, काम हम कर रहे हैं.

सबको साधने की रणनीति - सिसोदिया

वहीं, बीजेपी नेता आलोक सिसोदिया का कहना है 'कास्ट क्लस्टर' से जुड़े वोट हैं तो बीजेपी के ही, जहां तक, उन पर फोकस करने की बात और सियासी मैनेजमेंट की है, तो सियासी पार्टियां अपनी-अपनी स्ट्रेटजी के तहत ये काम करती हैं. कास्ट क्लसटर्स वोटर हार्ड वोटर हैं. इनको साधने से बीजेपी के पक्ष में वोटिंग परसेंट बढ़ेगी. फिर पार्टी चाहती है कि उसे सभी वर्गों का समर्थन मिले.

Politicsयोगी आदित्‍यनाथअखिलेश यादव
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