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'बिना शादी के बच्चे का जन्म...अब रेप का आरोप क्यों', लिव-इन रिलेशनशिप पर Supreme Court का बड़ा कमेंट; FAQ से समझें

सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि ऐसे रिश्ते से अलग होना अपने आप में कोई आपराधिक अपराध नहीं माना जा सकता.

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( Image Source:  X/ @ANI, Chatgpt )
विशाल पुंडीर
Edited By: विशाल पुंडीर4 Mins Read

Updated on: 27 April 2026 2:27 PM IST

लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर अक्सर भारत में लोगों की अलग-अलग राय देखने को मिलती है. कई बार लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर ऐसे मामले भी सामने आते हैं जो काफी हैरान कर देते हैं. अब सुप्रीम कोर्ट तक लिव-इन रिलेशनशिप के मामले पहुंच रहे हैं. वहीं सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि ऐसे रिश्ते से अलग होना अपने आप में कोई आपराधिक अपराध नहीं माना जा सकता. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि विवाह के बिना बने संबंधों में कुछ अंतर्निहित जोखिम होते हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति B. V. Nagarathna ने एक याचिका पर सुनवाई के दौरान की, जिसमें एक महिला ने शादी का झांसा देने के आरोप में एक व्यक्ति पर बलात्कार और यौन उत्पीड़न का केस दर्ज कराया था. अदालत ने इस दौरान सहमति से बने रिश्तों और आपराधिक मामलों के बीच स्पष्ट अंतर रेखांकित किया.

सवाल: क्या है अदालत की अहम टिप्पणी?

जवाब: सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि जब दो वयस्क बिना विवाह के साथ रहने का फैसला करते हैं, तो यह उनका निजी निर्णय होता है, लेकिन ऐसे रिश्तों में कई तरह के जोखिम भी शामिल होते हैं. उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा "यह एक लिव-इन रिलेशनशिप है. उसने बिना शादी के उस आदमी से एक बच्चे को जन्म दिया, और अब वह बलात्कार और यौन उत्पीड़न का आरोप लगा रही है. यह क्या है?"

सवाल: कोर्ट ने क्या उठाए सवाल?

जवाब: अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई संबंध आपसी सहमति से बना है, तो उसे बाद में आपराधिक मामले में बदलना गंभीर प्रश्न खड़े करता है. जज ने कहा "जब संबंध सहमति से बना हो तो अपराध का प्रश्न ही कहां उठता है?" उन्होंने यह भी जोड़ा कि ऐसे मामलों में पूछे गए सवालों को अक्सर पीड़ित को शर्मिंदा करने के रूप में देखा जाता है, लेकिन सहमति की प्रकृति को समझना भी उतना ही जरूरी है.

सवाल: अलग होने के बाद शिकायत क्यों?

जवाब: अदालत ने यह भी कहा कि कई मामलों में देखा जाता है कि लिव-इन रिलेशनशिप में लंबे समय तक साथ रहने के बाद जब संबंध खत्म होता है, तब एक पक्ष दूसरे के खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराता है. जज नागरत्ना ने कहा "लिव-इन रिलेशनशिप में यही होता है. सालों तक वे साथ रहे। जब उनका अलगाव हुआ, तो महिला ने पुरुष के खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई. ये सब विवाह से बाहर के रिश्तों की विचित्रताएं हैं."

सवाल: क्या बोला महिला का वकील?

जवाब: महिला के वकील ने अदालत को बताया कि आरोपी ने शादी का वादा किया था, लेकिन वह पहले से शादीशुदा था और उसकी कई पत्नियां थीं. महिला को इस बारे में जानकारी नहीं थी. इस पर जज नागरत्ना ने सवाल किया कि बिना विवाह के साथ रहने और बच्चे को जन्म देने का निर्णय क्यों लिया गया. उन्होंने यह भी कहा कि अदालत केवल याचिकाकर्ता के मामले पर विचार कर रही है, न कि आरोपी के अन्य कथित मामलों पर.

सवाल: बच्चे के अधिकारों पर कोर्ट का क्या रुख?

जवाब: अदालत ने महिला के प्रति सहानुभूति जताते हुए कहा कि वह अपने बच्चे के भरण-पोषण के लिए कानूनी सहायता मांग सकती है. साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट किया "अवैध संबंध हो सकता है, लेकिन ऐसे संबंध से पैदा हुआ बच्चा अवैध नहीं हो सकता. यदि विवाह हुआ होता, तो उसके अधिकार बेहतर होते."

अदालत ने दोनों पक्षों को सलाह दी कि वे इस विवाद को आपसी बातचीत और मध्यस्थता के जरिए सुलझाने की कोशिश करें. कोर्ट ने यह भी दोहराया कि लिव-इन रिलेशनशिप का टूटना अपने आप में किसी आपराधिक मामले का आधार नहीं बन सकता.

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