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Unfollow नहीं सीधा ब्लॉक, राघव चड्ढा के भाजपा में जाने से क्या Gen Z खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं

राघव चड्ढा के बीजेपी में जाने की खबर के बाद Gen Z में जबरदस्त नाराज़गी देखी जा रही है. सोशल मीडिया पर Unfollow ही नहीं, सीधे Block करने का ट्रेंड चल पड़ा है. युवा खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं और इसे भरोसे के साथ धोखा मान रहे हैं.

Unfollow नहीं सीधा ब्लॉक,  राघव चड्ढा के भाजपा में जाने से क्या Gen Z खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं
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( Image Source:  Chait GPT )
सागर द्विवेदी
By: सागर द्विवेदी7 Mins Read

Updated on: 27 April 2026 8:00 AM IST

सियासत इस कदर अवाम पे अहसान करती है...पहले आँखें छीन लेती है फिर चश्मे दान करती है. आज के इस कहानी में हम बात करने जा रहे हैं केजरीवाल की राजनीति की यानी यूं कहें तो हमारी बिल्ली हमीं से म्याऊँ... ऐसा ही शायद केजरीवाल के साथ हुआ है. हम बात कर रहे हैं जो कभी आप के हुआ करते थे और केजरीवाल के आंखों के तारे थे अब उन्होंने भाजपा का लड्डू चख लिया यानी राघव चड्ढा और उनके साथियों की.

यह कहानी 2 अप्रैल से शुरू होती है. जब आम आदमी पार्टी ने अचानक Raghav Chadha को राज्यसभा में उप-नेता के पद से हटा दिया. यह सिर्फ एक पद नहीं था, बल्कि उनकी राजनीतिक ताकत और पहचान का अहम हिस्सा था. इस फैसले ने साफ संदेश दिया. पार्टी के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है.

इसके बाद राघव चड्ढा सामने आए, एक वीडियो के साथ. उन्होंने सवाल उठाया, 'जब मैं लोगों के हक की बात करता हूं, तो मुझे ही चुप क्यों कराया जा रहा है? इसके अगले दिन धुरंधर फिल्म का चर्चित डायलॉग सामने आता है जिसमें Raghav Chadha कहते हैं कि 'घायल हूं घातक नहीं'. इस लाइन से हलचल मच जाती है और शोर शराबा होने लगता है कि कुछ बड़ा होने वाला है.

वीडियो के बाद कयासों का दौर शुरू हो गया. कोई कह रहा था कि राघव कांग्रेस का रुख करेंगे, तो कोई उन्हें बीजेपी में जाता देख रहा था. इसी बीच देश में बंगाल की चुनावों की गर्मी भी चरम पर थी और कहा जा रहा था इस बार बंगाल में खेला होगा इस तरह जैसे नारे हवा में गूंज रहे थे. लेकिन किसी को अंदाजा नहीं था कि असली “खेला” दिल्ली में होने वाला है.

24 अप्रैल, शाम करीब 4 बजे. अचानक खबर आती है कि राघव चड्ढा प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाले हैं. लोग टीवी स्क्रीन और मोबाइल पर नजरें गड़ाए बैठे थे और फिर जो उन्होंने कहा, उसने सब कुछ बदल दिया. 'मैं AAP से दूर जा रहा हूं… मैं बीजेपी में शामिल होने जा रहा हूं.' यह सुनकर लोग अभी संभले भी नहीं थे कि उन्होंने अगला बड़ा ऐलान कर दिया. 'हम दो-तिहाई सांसदों के साथ बीजेपी में विलय करेंगे.'

जब आप के थे राघव तक कितने थे इंस्टाग्राम के फॉलोवर्स

जब राघव आप के थे तब उनके सोशल मीडिया इंस्टाग्राम पर 14. 7 मिलियन के करीब थे फॉलोवर्स थे लेकिन भाजपा में जाने के बाद यानी अब उनके फॉलोवर्स 12.6 मिलियन हैं और लगातार कम ही हो रहे हैं.24 घंटे में करीब 10 लाख फॉलोवर्स कम हो रहे हैं ऐसे में अब यूजर्स सोशल मीडिया पर वीडियो बनाकर उनकी प्रोफाइल के मजे ले रहे हैं.

यह खबर सिर्फ चौंकाने वाली नहीं थी, बल्कि राजनीतिक भूचाल जैसी थी. कुछ ही देर में राघव चड्ढा ने भाजपा का हाथ थाम लिया. सियासत में इसे रणनीति कहा गया, लेकिन आम लोगों. खासकर युवाओं के लिए यह एक गहरा झटका था. उन्हें लगा जैसे उनकी उम्मीदों के साथ 'खेला' हो गया.

Unfollow नहीं सीधा ब्लॉक

फिर जो हुआ, वह सोशल मीडिया के इतिहास में एक बड़ा उदाहरण बन गया. ट्विटर, इंस्टाग्राम, हर प्लेटफॉर्म पर #UnfollowRaghavChadha ट्रेंड करने लगा. देखते ही देखते 20 से 25 लाख यूजर्स ने उन्हें अनफॉलो कर दिया. कई लोगों ने सिर्फ अनफॉलो नहीं, बल्कि सीधे ब्लॉक कर दिया. जो चेहरा कभी युवाओं के लिए प्रेरणा था, वही अचानक नफरत का केंद्र बन गया.

Gen Z खुद को ठगा महसूस करने लगे

Gen Z का गुस्सा सिर्फ एक राजनीतिक फैसले पर नहीं था. यह भरोसे के टूटने का गुस्सा था. यही वह पीढ़ी थी जो राघव चड्ढा को अपना नेता मानती थी. उन्हें लगता था कि यह नेता उनकी भाषा समझता है, उनके मुद्दे उठाता है और उनके लिए लड़ता है. लेकिन जब वही नेता अचानक दूसरी तरफ चला गया, तो उन्हें लगा जैसे उनके साथ धोखा हुआ है और धोखेबाज, गद्दार, साथ ही Gen Z खुद को ठगा महसूस करने लगे.

किन वजहों से Gen Z के फेवरेट थे राघव?

दरअसल, राघव चड्ढा की लोकप्रियता यूं ही नहीं बनी थी. उन्होंने संसद में ऐसे मुद्दे उठाए जो आम जिंदगी से जुड़े थे. महंगे समोसे, पितृत्व अवकाश, ट्रैफिक की समस्या, और टेलीकॉम डेटा लिमिट. उन्होंने गिग वर्कर्स के शोषण पर भी आवाज उठाई. यहां तक कि वह खुद एक दिन के लिए Blinkit डिलीवरी पार्टनर बने, ताकि उनकी परेशानियों को समझ सकें.

इन सब प्रयासों ने उनकी छवि एक “जमीन से जुड़े नेता” की बना दी थी. युवा उन्हें सिर्फ एक राजनेता नहीं, बल्कि अपना प्रतिनिधि मानते थे. लेकिन अब वही युवा कह रहे हैं. 'इस देश में किसी पर भरोसा नहीं किया जा सकता.' यह सिर्फ गुस्सा नहीं, बल्कि गहरी निराशा है.

Gen Z ने राघव को दी थी ये सलाह

दिलचस्प बात यह है कि जब उन्हें उप-नेता पद से हटाया गया था, तब उन्हें भारी जनसमर्थन मिला था. उन्होंने एक इंस्टाग्राम रील भी शेयर की थी, जिसमें एक यूजर ने उन्हें 'Gen Z पार्टी' बनाने की सलाह दी थी. उस यूजर ने चेतावनी भी दी थी कि अगर वह किसी दूसरी पार्टी में गए, तो उन्हें नफरत का सामना करना पड़ सकता है. राघव ने इसे 'दिलचस्प विचार' बताया था. लेकिन उन्होंने वह रास्ता नहीं चुना.

उनके बीजेपी में जाने के बाद सोशल मीडिया पर एक और चीज ने लोगों का ध्यान खींचा. उनके पुराने पोस्ट गायब होने लगे. खासकर वे पोस्ट, जिनमें उन्होंने पीएम मोदी और बीजेपी की आलोचना की थी. ‘आप’ नेता Saurabh Bharadwaj ने तंज कसते हुए कहा कि अब उनके प्रोफाइल पर ‘मोदी’ नाम के सिर्फ दो पोस्ट बचे हैं, और दोनों में तारीफ है.

अच्छा सिला दिया तूने मेरे प्यार का...

इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक लाइन बार-बार याद आती है. 'अच्छा सिला दिया तूने मेरे प्यार का…' राघव चड्ढा, जो कभी एक साधारण CA हुआ करते थे, उन्हें राजनीति में पहचान दिलाने में Arvind Kejriwal की बड़ी भूमिका रही. लेकिन किसी ने क्या खूब कहा है कि 'अंधे को आंख मिलने पर सबसे पहले लाठी फेंकता है'. शायद इसी तरह के मुहावरे पर Gen Z राघव को याद कर रहे होंगे.

Gen Z का दर्द सिर्फ इस बात का नहीं है कि उनका पसंदीदा नेता बदल गया, बल्कि इस बात का है कि उनकी उम्मीदें टूट गईं. वे कहते हैं कि वे राघव की बातों में खुद को देखते थे. जब वह संसद में बोलते थे, तो लगता था कि कोई उनकी आवाज उठा रहा है. लेकिन अब वही आवाज उन्हें खोखली लग रही है.

क्या Gen Z राघव चड्डा से नफरत करने लगे?

आज हालात यह हैं कि जो युवा कभी उनकी हर स्पीच का इंतजार करते थे, वही अब उनका नाम तक सुनना पसंद नहीं कर रहे. सोशल मीडिया पर उन्हें अनफॉलो करना, ब्लॉक करना. यह सिर्फ एक डिजिटल रिएक्शन नहीं है, बल्कि एक भावनात्मक विरोध है.

यह कहानी सिर्फ एक नेता के पार्टी बदलने की नहीं है. यह कहानी है भरोसे की, उम्मीदों की और उस दर्द की जो तब होता है जब आपका “अपना” अचानक बदल जाता है. राजनीति में फैसले बदलते रहते हैं, लेकिन जनता की याददाश्त और भावनाएं इतनी जल्दी नहीं बदलतीं. और शायद यही वजह है कि Gen Z आज सिर्फ गुस्से में नहीं है. बल्कि वह सीख चुका है कि भरोसा करना सबसे बड़ा जोखिम है.

स्टेट मिरर स्पेशलअरविंद केजरीवाल
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