Iran के सुप्रीम लीडर की मौत पर याद आए इमाम हुसैन, खामेनेई की मौत को कर्बला की शहादत से क्यों जोड़ रहे हैं लोग?
करबला की धरती पर 680 ईस्वी में जो हुआ, वह सिर्फ एक जंग नहीं थी, वह सच और सत्ता के बीच टकराव की एक मिसाल थी. आज जब ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत को लेकर चर्चाएं हो रही हैं, तो कुछ लोग उस घटना को करबला की शहादत के साथ जोड़कर देख रहे हैं.
Ayatollah Ali Khamenei Death: "अली की तरह जिए, हुसैन की तरह शहीद हुए." (Lived Like Ali, Martyred Like Hussain) सोशल मीडिया पर इस लाइन के साथ आपको ढेरों पोस्ट मिल जाएंगी और ये सभी पोस्ट ईरान के सुप्रीम लीडर रहे आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद शेयर की जा रही हैं. जिनकी मौत को पैगंबर मोहम्मद (स.अ) के नेफ्यू (नवासे) हज़रत हुसैन की शहादत (Martyrdom) के साथ जोड़कर देखा जा रहा है, जिन्होंने कर्बला में भूखे प्यासे उस वक्त के शासक यज़ीद के खिलाफ जंग लड़ी और शहीद हो गए.
ज्ञात हो कि शनिवार वाले दिन इजराइल ने ईरान पर ज़ोरदार हमले किए. इन हमलों का मकसद इस्लामिक रिपब्लिक के टॉप लीडर्स को निशाना बनाना था. अटैक में ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई और उनके परिवार के कई मेंबर्स की मौत हो गई. इसके बाद से ही लोगों ने उनकी मौत को हज़रत हुसैन की शहादत के साथ जोड़ना शुरू किया. आखिर खामेनेई की मौत कैसे हुसैन की शहादत के साथ जोड़कर देखी जा सकती है? इसके लिए आपको पूरा बैकग्राउंड जानना होगा, जो कुछ इस तरह है?
कौन थे हुसैन?
इमाम हुसैन इस्लाम के इतिहास की एक अहम और इज्जतदार हस्ती थे. वे पैगंबर हज़रत मुहम्मद के नवासे (नाती) थे. उनके पिता हज़रत अली इस्लाम के चौथे खलीफा थे और उनकी मां हज़रत फातिमा, पैगंबर मुहम्मद (स.अ) की बेटी थीं. इमाम हुसैन का जन्म 626 ईस्वी (4 हिजरी) में मदीना में हुआ था. उनके बड़े भाई का नाम हसन था.
अली के खलीफा बनने के बाद कैसे दो हिस्सों में बंटे मुसलमान?
हालांकि इस फैसले को सर्वसम्मति नहीं मिली. कई लोगों का कहना था कि खलीफा का चुनाव नामांकन के आधार पर नहीं, बल्कि आम राय और परामर्श से होना चाहिए, जैसा कि पहले तीन खलीफाओं के मामले में हुआ था. दूसरी ओर, एक गुट यह मानता था कि पैगंबर के दामाद और परिवार के सदस्य होने के कारण हजरत अली स्वाभाविक रूप से इस पद के अधिकारी हैं. इस मतभेद ने राजनीतिक विभाजन को जन्म दिया.
हसन की मौत के बाद कैसे बदला पूरा खेल?
लगभग चार वर्ष बाद, 661 ईस्वी में हजरत अली की भी हत्या कर दी गई. इसके बाद उनके बड़े बेटे हसन को उनका उत्तराधिकारी माना गया. लेकिन हालात तनावपूर्ण थे, खून-खराबे को रोकने और सत्ता संघर्ष को समाप्त करने के लिए हसन ने उस समय के शक्तिशाली और विरोधी सरदार मुआविया के साथ एक समझौता किया. इस समझौते के तहत सत्ता मुआविया को सौंप दी गई. शर्त यह थी कि वह अपनी स्थायी सल्तनत स्थापित नहीं करेगा और न ही उसका विस्तार करेगा.
670 ईस्वी में इमाम हसन की मृत्यु के बाद उनके छोटे भाई हुसैन को कूफा के लोगों ने उनका उत्तराधिकारी और अपना खलीफा मान लिया. हालांकि, हुसैन अपने बड़े भाई हसन के जरिए मुआविया के साथ किए गए समझौते से बंधे हुए थे. इसलिए वे तत्काल सत्ता का दावा करने की स्थिति में नहीं थे.
मुआविया ने कैसे किया समझौते का उल्लंघन?
676 ईस्वी में मुआविया ने उस समझौते को तोड़ते हुए अपने बेटे यजीद को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया. यह हसन के साथ किए गए करार का सीधा उल्लंघन था. इसी कारण इमाम हुसैन और उनके समर्थकों ने इसका खुलकर विरोध किया. 680 ईस्वी में मुआविया की मौत के बाद यजीद औपचारिक रूप से शासक बन गया, उसकी सत्ता कूफा सहित व्यापक क्षेत्र में स्थापित हो गई.
यज़ीद ने हुसैन की क्या की थी मांग?
उधर, कूफा की जनता में असंतोष था, वहां के लोगों ने इमाम हुसैन से गुजारिश की कि वे उमय्यद शासक यजीद को सत्ता से हटाएं. दूसरी तरफ, यजीद ने गद्दी संभालते ही इमाम हुसैन और अन्य असंतुष्ट लोगों से अपनी अधीनता स्वीकार करने और समर्थन देने की मांग की. इमाम हुसैन ने यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया. इसके साथ ही दोनों पक्षों के बीच टकराव की स्थिति और गहरी हो गई.
9 सितंबर 680 ईस्वी, बकरीद यानी हज से एक दिन पहले, इमाम हुसैन अपने परिवार, कबीले और लगभग 70 लोगों के साथ यात्रा कर रहे थे. कूफा से कुछ दूरी पर यजीद की लगभग 1,000 सैनिकों वाली सेना ने उनके काफिले को रोक लिया. इमाम हुसैन ने सुरक्षित रास्ता दिए जाने की मांग की और इसके लिए यजीद के गवर्नर उबैद अल्लाह इब्न जियाद से संपर्क किया गया, लेकिन कोई समाधान नहीं निकला.
इमाम हुसैन ने सुरक्षित मार्ग के बदले यजीद की शर्तें स्वीकार करने से इंकार कर दिया. इसके बाद उन्हें और उनके साथियों को रेगिस्तान में रुकने पर मजबूर कर दिया गया, लगभग एक महीने तक वे सीमित संसाधनों के साथ वहीं डेरा डाले रहे. यजीद ने उनके 72 साथियों की निगरानी के लिए और सैन्य दबाव बढ़ाने के उद्देश्य से लगभग 4,000 अतिरिक्त सैनिक भेज दिए.
यज़ीद ने कैसे किया अचानक हमला?
10 अक्टूबर 680 ईस्वी, जो मुहर्रम (इस्लामिक महीना) की 10वीं तारीख थी, की रात यजीद की सेना ने इमाम हुसैन के काफिले पर अचानक हमला कर दिया. भीषण युद्ध हुआ. लंबे समय से कठिन परिस्थितियों में रह रहे और संसाधनों की कमी झेल रहे हुसैन के लोग बड़ी सेना का मुकाबला नहीं कर सके. इस संघर्ष में इमाम हुसैन सहित उनके परिवार और कबीले के लगभग सभी लोग मारे गए. इसमें बुजुर्ग, बच्चे, महिलाएं और पुरुष सभी शामिल थे. जो कुछ लोग जीवित बचे, उन्हें बंदी बनाकर सीरिया भेज दिया गया.
इमाम हुसैन की शाहदत और खामेनेई की मौत को कैसे जोड़ा जा रहा है?
इमाम हुसैन की शहादत और ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत, इन दोनों घटनाओं को कुछ लोग प्रतीकात्मक और भावनात्मक रूप से जोड़कर देख रहे हैं. हालांकि दोनों घटनाएँ ऐतिहासिक रूप से बिल्कुल अलग दौर और परिस्थितियों की हैं, लेकिन धार्मिक और वैचारिक संदर्भ में तुलना की जा रही है.
1. अत्याचार बनाम प्रतिरोध की छवि
करबला की घटना को शिया मुस्लिम परंपरा में “ज़ुल्म के खिलाफ आवाज” का प्रतीक माना जाता है. इमाम हुसैन ने सत्ता के सामने झुकने से इनकार किया और शहादत दी. समर्थक आयतुल्लाह खामेनेई को भी इसी तरह बाहरी दबाव या दुश्मनों के खिलाफ खड़े नेता के रूप में प्रस्तुत करते हैं. जिन्होंने गलत के सामने सिर झुकाने की बजाय सिर कटाना बेहतर समझा.
2. शहादत की कॉन्सेप्ट
शिया विचारधारा में 'शहादत' (धर्म और सिद्धांतों के लिए जान देना) बहुत केंद्रीय महत्व रखती है. करबला इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. यदि किसी नेता की मौत को संघर्ष या दुश्मन की कार्रवाई से जोड़ा जाता है, तो कुछ लोग उसे भी “शहादत” के फ्रेम में रखकर देखते हैं- भले ही ऐतिहासिक संदर्भ अलग हो.
3. मुआविया के साथ खड़े थे कई मुस्लिम कबीले
कुछ लोग इतिहास और आज की राजनीति के बीच तुलना कर रहे हैं. उनका कहना है कि जैसे उस समय कई लोग मुआविया के साथ खड़े थे और हज़रत हुसैन करबला में कम साथियों के साथ अकेले रह गए थे, वैसे ही आज ईरान खुद को अकेला महसूस करता है. वे कहते हैं कि आज अमेरिका और इज़राइल के साथ कई मुस्लिम देश रिश्ते बनाए हुए हैं, जबकि ईरान उनसे टकराव की स्थिति में है. इसलिए कुछ लोग खामेनेई की मौत को प्रतीक के तौर पर हुसैन की शहादत से जोड़कर देखते हैं.




