कर्नाटक और कश्मीर में घूमे, सुन्नी मस्जिद में पढ़ी नमाज, जब खामेनेई ने भारत का किया था दौरा; Iran जाकर की थी जमकर तारीफ
ईरान के सर्वोच्च नेता बनने से कई साल पहले अयातुल्लाह अली खामेनेई भारत की यात्रा कर चुके थे. 1980-81 में उन्होंने कर्नाटक और कश्मीर का दौरा किया और स्थानीय लोगों से मुलाकात की थी. दशकों बाद उन्होंने खुद इस यात्रा को याद करते हुए भारत की धार्मिक विविधता और उसके नेताओं की सराहना की थी.
Ayatollah Ali Khamenei Visited India: ईरान के सबसे शक्तिशाली नेता बनने से काफी पहले, अयातुल्लाह अली होसेनी खामेनेई ने 1980-81 में भारत का दौरा किया था. उस समय वे 41 साल के एक धर्मगुरु थे और इस्लामिक रिपब्लिक के शुरुआती दौर में कर्नाटक और कश्मीर गए थे. 1989 में ईरान के सर्वोच्च नेता बनने से पहले उनका यह दौरा दोनों देशों के रिश्तों का एक खास अध्याय माना जाता है.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, कई दशक बाद, तेहरान में भारतीय नेताओं से मुलाकात के दौरान खामेनेई ने इस भारत यात्रा को याद किया था. उन्होंने महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और मौलाना अबुल कलाम आजाद की प्रशंसा की थी और भारत की धार्मिक विविधता को सराहा था. इससे यह साफ था कि भारत के साथ उनका एक व्यक्तिगत जुड़ाव भी रहा है.
कैसा था खामेनेई का ईरान दौरा?
ईरानी डॉक्यूमेंट्स के मुताबिक, 1979 की ईरानी क्रांति के दो साल बाद और अक्टूबर 1981 में राष्ट्रपति बनने से ठीक पहले, खामेनेई भारत आए थे. यह यात्रा रुहोल्लाह खुमैनी की सरकार के जरिए शुरू किए गए अंतरराष्ट्रीय संपर्क अभियान का हिस्सा थी.
खामेनेई पहले बेंगलुरु पहुंचे और फिर वहां से करीब 75 किलोमीटर दूर स्थित अलीपुर गए. अलीपुर की पहचान एक ऐसे कस्बे के रूप में है जहां शिया मुस्लिम आबादी अधिक है और जहां ईरान के साथ धार्मिक और शैक्षणिक संबंध लंबे समय से रहे हैं.
अलीपुर पहुंचकर खामेनेई ने क्या किया था?
खामेनेई की आधिकारिक वेबसाइट पर 1981 की कुछ तस्वीरें भी पब्लिश हैं, जिनमें बेंगलुरु और अलीपुर में उनका स्वागत करते हुए लोग दिखाई दे रहे हैं. तस्वीरों के कैप्शन में साफ लिखा है कि भारतीय लोगों ने उस समय उनका स्वागत किया था. स्थानीय जानकारी के अनुसार, उन्होंने 1981-82 के दौरान अलीपुर गांव में ईरान सरकार के सहयोग से बने एक अस्पताल का उद्घाटन भी किया था.
अलीपुर के लिए यह दौरा ईरान के साथ उसके रिश्तों का अहम पड़ाव माना जाता है. आज भी वहां के कई युवा धार्मिक शिक्षा के लिए ईरान के मदरसों में जाते हैं या तेहरान और मशहद जैसे शहरों की यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करते हैं. यह संबंध 1980 के दशक की उस यात्रा से पहले का भी है और उसके बाद भी जारी रहा.
क्या खामेनेई ने की थी कश्मीर की यात्रा?
रिपोर्ट के मुताबिक ईरानी दस्तावेज़ में साफ मिलता है कि खामेनेई ने 1980 के आखिर या 1981 की शुरुआत में कश्मीर का दौरा किया था. बताया जाता है कि उन्होंने श्रीनगर में सभाओं को संबोधित किया था. कश्मीरी कार्यकर्ता क़ल्बी हुसैन रिज़वी के मेमोएर से पता लगता है कि यह दौरा उस समय हुआ जब घाटी में सांप्रदायिक तनाव था.
कश्मीर में क्या सुन्नी मस्जिद में की थी नमाज अदा?
रिज़वी के अनुसार, खामेनेई ने श्रीनगर की एक सुन्नी मस्जिद में जुमे की नमाज अदा की और कश्मीर के मीरवाइज मौलवी फारूक के सामने खड़े होकर लगभग 15 मिनट का भाषण दिया था. संस्मरण में दावा किया गया है कि उस भाषण के बाद शिया और सुन्नी समुदायों के बीच दूरी कम हुई और दोनों समुदाय एक-दूसरे की मस्जिदों में नमाज पढ़ने लगे थे.
मनमोहन सिंह से क्या बोले थे खेमेनेई?
करीब तीन दशक बाद, अगस्त 2012 में जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तेहरान गए थे, तब खामेनेई ने अपने भारत दौरे का जिक्र भी किया था. विदेश मंत्रालय (MEA) के रिकॉर्ड के मुताबिक, उन्होंने कहा कि उन्होंने भारतीय इतिहास पढ़ा है, गांधीजी के संघर्ष की सराहना करते हैं और उनका मानना है कि गुटनिरपेक्ष आंदोलन के असली संस्थापक जवाहरलाल नेहरू थे.
उसी मुलाकात में उन्होंने बताया कि वे भारत की एक सड़क, अली कबीर स्ट्रीट, पर गए थे. वहां उन्होंने सिख समुदाय के लोगों को देखा, जो व्यापार करते हैं. वे एक दुकान में भी गए थे, जहां उन्हें कुछ किताबें भेंट की गई थीं. उन्होंने कहा कि उन्हें सिख धर्म और भारत की धार्मिक विविधता के बारे में कुछ जानकारी है. उन्होंने यह भी कहा कि धार्मिक विविधता महत्वपूर्ण है और इससे देश की एकता को नुकसान नहीं होना चाहिए, सभी समुदायों के बीच सद्भाव जरूरी है.
1989 में ईरान के सर्वोच्च नेता बनने के बाद खामेनेई ने भारत की औपचारिक राजकीय यात्रा नहीं की. बाद में भारतीय नेताओं से उनकी मुलाकातें तेहरान में या बहुपक्षीय सम्मेलनों के दौरान हुईं. अपने भाषणों और लेखों में खामेनेई ने विभाजन से पहले के भारतीय नेताओं, जैसे मौलाना अबुल कलाम आजाद और कवि मोहम्मद इकबाल की भी प्रशंसा की है.
कब आई रिश्तों में आई थोड़ी खटास
हालांकि उनके कार्यकाल में कुछ तनाव के मौके भी आए. हाल के सालों में कश्मीर पर दिए गए उनके सार्वजनिक बयानों पर भारत ने कड़ी आपत्ति जताई. विदेश मंत्रालय ने ईरानी दूतों को तलब कर साफ कहा कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है और ऐसे बयान आंतरिक मामलों में दखल हैं.




