बार-बार पड़ते हैं बीमार? पेट में मिलने वाले ये बैक्टीरिया तो नहीं है वजह; दिमाग से लेकर दिल की गंभीर बीमारी तक सब करते हैं कंट्रोल
क्या आप जानते हैं कि आपके पेट में मौजूद छोटे-छोटे बैक्टीरिया आपकी पूरी सेहत तय करते हैं. अगर इनका संतुलन बिगड़ जाए तो इम्यूनिटी से लेकर दिमाग, दिल और वजन तक पर असर पड़ सकता है. जानिए एक्सपर्ट से कि गट माइक्रोबायोटा क्या है, ये कैसे काम करता है और इसे हेल्दी रखने के आसान तरीके क्या हैं.
Gut Bacteria Role in Overall Health: हेल्थ एक्सपर्ट्स अकसर कहते हैं कि अगर पेट स्वस्थ तो सब कुछ स्वस्थ. लेकिन पेट को हेल्दी रखने के लिए केवल अच्छा खाना ही नहीं जरूरी है, बल्कि पेट में मौजूद वह बैक्टीरिया भी जरूरी हैं जो आपके खाने को पचाने में अहम भूमिका निभाते हैं. अगर इन बैक्टीरिया की मात्रा कम होने लकती है तो इंसान ज्यादा बीमार रहने लगता है और उसे कई तरह की गंभीर बीमारियां घेरने लगती हैं. ऐसा कहा जाता है कि हमारे शरीर में जितनी सेल्स हैं उतने ही बैक्टीरिया भी मौजूद हैं.
गट बैक्टीरिया से जुड़ी समस्याओं को लेकर हमने Dr.Shrey (Senior Consultant- Internal Medicine,Sharda Hospital) से बात की. उन्होने बतायाकि आखिर गट बैक्टीरिया यानी माइक्रोबायोटा क्या होता है और ये कैसे आपको हेल्दी रखनी में मदद करते हैं, और अगर इनकी शरीर में कमी हो जाती है तो क्या-क्या बीमारियां आपको घेरने लगती हैं.
माइक्रोबायोटा क्या होते हैं?
हमारे आंतों में मिलने वाले बैक्टीरिया, वायरस, फंगस और आर्किया जो हमारे खाने को पचाने और दूसरी कई चीजों में मदद करते हैं, इनके ग्रुप को माक्रोबायोटा कहते हैं. वैसे शरीर के अलग-अलग हिस्सों में माइक्रोबायोटा मिलते हैं, लेकिन इनकी सबसे ज्यादा तादाद आंतों में होती है.
क्या होता है इन माइक्रोबायोटा का काम?
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के जरिए शुरू की गई ह्यूमन माइक्रोबायोम प्रोजेक्ट और इसके बाद हुईं कई स्टडीज़ से यह साफ हो चुका है कि आंतों में मिलने वाले माइक्रोबायोटा पाचन, इम्यूनिटी, मोटाबोविज़्म, हार्मोनल बैलेंस और यहां तक कि मेंटल हेल्थ में भी अहम भूमिक निभते हैं. आंतों में मौजूद अहम बैक्टीरियल ग्रुप्स में फर्मिक्यूट्स और बैक्टेरोइडेट्स शामिल हैं. इनकी बैलेंस्ड मौजूदगी को हेल्दी माइक्रोबायोम का संकेत माना जाता है.
खाने और न्यूट्रीशन में क्या होता है माइक्रोबायोटा का रोल?
आंतों के बैक्टीरिया कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट, फाइबर और रेजिस्टेंट स्टार्च को तोड़ने में मदद करते हैं, जिन्हें इंसान के शरी में मिलने वाले एंजाइम पूरी तरह पचा नहीं पाते हैं. इस प्रोसेस में शॉर्ट-चेन फैटी एसिड बनाते हैं, जैसे ब्यूटिरेट, एसीटेट और प्रोपियोनेट. आसान भाषा में समझें तो यह हमारी बड़ी आंत के हिस्से कोलन को एनर्जी देने में मदद करते हैं और साथ में उसमें आई सूजन को भी करने में मदद करते हैं.
कई स्टडीज़ में देखा गया है कि जिन लोगों में पेट के इन बैक्टीरिया के लेवल में कमी होती है, उन्हें अकसर आंतों की सूजन जैसी बीमारियां होने का जोखिम बढ़ जाता है. इसके साथ ही ये बैक्टीरिया विटामिन के और बी- विटामिन्स को बनाने का भी काम करते हैं.
इन बैक्टीरिया की कमी से क्या बीमारियां हो सकती हैं?
इम्यूनिटी का वीक होना
ह्यूमन इम्यून सिस्टम का एक बड़ा हिस्सा आंतों से जुड़ा है. आंतों की अंदर की परत और वहां मौजूद माइक्रोबायोटा मिलकर एक सुरक्षा कवच बनाते हैं. कई रिसर्च में देखा गया है है कि बचपन में माइक्रोबायोटा का विकास इम्यून सिस्टम की ट्रेनिंग में अहम होता है. यही कारण है कि जन्म के तरीके, स्तनपान, एंटीबायोटिक का इस्तेमाल और गलत खान-पान माइक्रोबायोम के स्ट्रक्चर को प्रभावित करते हैं.
दिमाग पर असर
पिछले एक दशक में गट-ब्रेन एक्सिस पर हुए रिसर्च ने यह साफ किया है कि आंत और दिमाग के बीच दो-तरफा कम्यूनिकेशन होता है. यह कम्यूनिकेशन नर्वस सिस्टम, खास तौर पर वेगस नर्व, हार्मोन और इम्यून सिग्नल्स के जरिए से होता है. इसकी कमी होने से डिप्रेशन, एंग्जाइटी और नींद न आना जैसी समस्याएं होने के चांसेस होते हैं. सेरेटोनिन का शरीर में लेवल सही होना भी इन्हीं बैक्टीरिया पर निर्भर करता है. सेरेटोनिन को फील गुड हार्मोन भी कहा जाता है जो नींद लाने का काम करता है.
मोटापा और डायबिटीज
मोटापा और टाइप 2 डायबिटीज जैसी मेटाबॉलिक बीमारियों में माइक्रोबायोम की भूमिका पर भी कई तरह की रिसर्च हो चुकी हैं. इसकी कमी होने से शरीर मोटापे की ओर बढ़ता है. माइक्रोबायोटा इंसुलिन रेज़िस्टेंस को होने से रोकते हैं जिसकी वजह से डायबिटीज की संभावना कम हो जाती है. हालांकि लाइफस्टाइल, जेनेटिक्स और आहार डायबिटीज और मोटापे के सबसे अहम वजहों में से एक हैं.
आंतों में सूजन
इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज, जिसमें क्रोहन डिसीज़ और अल्सरेटिव कोलाइटिस शामिल हैं. ये अकसर शरीर में माइक्रोबायोम के लेवल अनस्टेबल होने की वजह से होती है. इसके अलावा, कुछ स्टडीज में ये भी देखा गया है कि लंबे वक्त तक माक्रोबायोम में बदलाव कोलन कैंसर का कारण भी बन सकता है.
हार्ट पर असर
इन बैक्टीरिया की कमी से लगातार पेट खराब रहता है, जिसकी वजह से खाना सही तरह नहीं पचता है और शरीर पर अधिक चर्बी आने के चांसेज़ ज्यादा होते हैं. ऐसे में यह दिल की नसों में प्लैक जमने का भी एक कारण बन सकते हैं. जिसके वॉल ब्लॉक हो सकती है और हार्ट अटैक तक हो सकता है.
त्वचा, बालों और आंखों पर असर
इन माक्रोबायोटा की कमी से जब न्यूट्रीएंट्स सही तरह से एब्जॉर्ब नहीं होंगे तो स्किन खराब, बाल और आंखों पर इसका गलत असर पड़ेगा. खाने में मिलने वाले विटामिन्स और मिनिरल्स छोटी आंत में जाकर पचते हैं, जहां माइक्रोबयोटा की मौजूदगी होती है. जब इनका लेवल कम होगा तो यह माइक्रोन्यूट्रिएंट्स सही तरह से पच नहीं पाएंगे और बालों का झड़ना, आंखों की रोशनी का कम होना, त्वचा का फटना और नाइट ब्लाइंडनेस जैसी समस्या पैदा होगी.
पेट में गुड बैक्टीरिया का लेवल क्यों हम होता है?
एंटीबायोटिक दवाएं शरीर को बीमारी से तो दूर कर देती हैं, लेकिन इनकी वजह से पेट में मौजूद गट बैक्टीरिया कम होने लगते हैं. बार-बार एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल गट बैक्टीरिया के बैलेंस को बिगाड़ता है, जिसकी वजह से पेट दर्द, उल्टी, गैस और दस्त जैसी समस्या होती है. इसके साथ ही बाहर मिलने वाले पैक्ड आइटम्स और ज्यादा मीठी और तली हुई चीजें भी माइक्रोबायोटा के लेवल को कम करने का काम करती हैं.
इन बैक्टीरिया के लेवल को कैसें बढ़ाएं?
अपनी डाइट में प्रोबायोटिक्स सप्लीमेंट्स और फूड को शामिल करें. प्रीबायोटिक्स वे फाइबर होते हैं जो गुड बैक्टीरिया के लिए भोजन का काम करते हैं. प्रोबायोटिक्स जिंदा बैक्टीरिया होते हैं, जो पर्याप्त मात्रा में दिए जाने पर माइक्रोबायोटा के लेवल को सुधार सकते हैं. दही, फरमेंटेड फूड और हाई फायबर युक्त आहार को माइक्रोबायोम के लेवल को बढ़ाने का काम करता है. फल इसका बेहतर उदाहरण हो सकते हैं, खास तौर पर सेब, जिसमें पैक्टिन फाइबर होता है जो पेट के लिए काफी लाभदायक है.




