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होर्मुज पर पीछे हटने का संकेत Trump की एक और साजिश तो नहीं! एक्सपर्ट की राय में जानिए हकीकत क्या

क्या होर्मुज जलडमरुमध्य पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का पीछे हटना रणनीति है या साजिश? जानिए एक्सपर्ट्स की राय और इसके वैश्विक असर. क्या ईरान मानेगा यह प्रस्ताव.

Donald Trump Hormuz strategy
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( Image Source:  Sora AI )

मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने अपनी रणनीति को लेकर बड़ा संकेत दिया है. द वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका अब लंबा युद्ध लड़ने के बजाय सीमित समय में अपने सैन्य लक्ष्य हासिल कर, पीछे हटने की तैयारी में है. भले ही Strait of Hormuz पूरी तरह से खुल न पाए. यह रुख बताता है कि वॉशिंगटन अब सीधे टकराव को बढ़ाने के बजाय “टारगेटेड ऑपरेशन और कूटनीतिक दबाव” की रणनीति पर आगे बढ़ना चाहता है. ऐसा ट्रंप जोखिम को ध्यान में रखते हुए कर रहे हैं. ऐसे में अहम सवाल यह है कि, क्या ट्रंप प्रशासन वास्तव में ऐसा चाहता है, या ये भी ईरान के खिलाफ एक छलावा या साजिश है.

'युद्ध से बाहर निकलने के लिए छटपटा रहे ट्रंप'

इस मसले पर दिल्ली विश्वविद्यालय के दयाल सिंह कॉलेज में इंटरनेशनल रिलेशंस के प्रोफेसर विजय वर्मा का कहना है, "ट्रंप इजरायल और ईरान युद्ध में कूदकर खुद का हाथ जला चुके हैं. अब बाहर निकलने के लिए छटपटा रहे हैं. ईरान पीछे हटने के लिए तैयार नहीं है. अगर वॉर लंबा खिंचता है तो वियतनाम और अफगानिस्तान की तरह यहां भी अमेरिका का नुकसान होगा."

प्रोफेसर विजय वर्मा के मुताबिक ट्रंप प्रशासन के अधिकारियों ने होर्मुज जलडमरुमध्य से बंद रहने पर भी युद्धबंदी के संकेत दिए हैं. इसे दो नजरिए से देखा जा सकता है. पहला, अमेरिकन पॉलिटिकल कल्चर अब तक क्या रहा है? उनका मकसद क्या है? ट्रंप एक बिजनेसमैन हैं. उन्होंने वैचारिक अधार पर युद्ध की शुरुआत की है, पर उनका मकसद अमेरिकी हित को एक व्यापारी की तरह साधना था.

ट्रंप ईरान की ताकत का अंदाजा लगाने में भूल कर बैठे. मकसद से किया. काम हो . ईरान ने इसे अस्तित्व का सवाल बना लिया है. ईरान की रणनीति से साफ है, हमारा जो होगा ठीक, पर तुमको छोड़ेंगे नहीं. ट्रंप के सामने मुसीबत यह है कि अमेरिका के 30 से ज्यादा शहरों में लाखों लोग इस युद्ध के खिलाफ प्रोटेस्ट कर रहे हैं. वो अपने घर में घिर गए हैं. फिर अमेरिकन लॉन्ग टर्म वॉर को टॉलरेट नहीं करते है. अमेरिका के लिए यह वॉर अब महंगा साबित हो रहा है. ईरान अमेरिका को अहसास कराना चाहता है कि वो वेनेजुएला नहीं है. वो ऐसा कुछ करना चाहता है कि अमेरिका अगले 50 साल तक युद्ध लड़ने की हिमाकत न करे.

'EU और अरब देशों पर ट्रंप बना रहे दबाव'

विदेश मामलों के जानकार ब्रह्दीप अलूने का कहना है, "अमेरिका में मध्यावधि चुनाव होना है. इसलिए, वो युद्ध समाप्त करने का संकेत देकर ईयू और अरब देखों का खुला समर्थन हासिल करना चाहते हैं. ताकि मध्यावधि चुनाव के दौरान कह सकें कि पूरी दुनिया अमेरिका के साथ है."

इसके पीछे अलूने का तर्क है कि अमरिका का काम अरब देशों से तेल न भी मिले तो चल जाएगा. यही वजह है कि ट्रंप प्रशासन अरब देशों और ईयू के देशों प्रेसर पॉलिटिक्स का गेम रहा है. यह मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की रणनीति है. अहम सवाल है है कि होर्मुज जलडमरूमध्य न खुले तो कतर, सउदी अरब या अन्य देश तेल कैसे भेजेंगे. एमबीएस अपने देश की निर्भरता 2030 तक तेल वाली अर्थव्यवस्था बदलना चाहते हैं. ईयू के देश तेल और गैस कैसे हासिल करेंगे. यही यही वजह है कि सऊदी अरब ने अमेरिका से ईरान पर जमीनी हमला करने की अपील की है. इसी तरह अन्य देशों का साथ मिल जाए तो ट्रंप मिड टर्म इलेक्शन में इसे कैश करने की कोशिश करेंगे.

व्हाइट हाउस ने क्या संकेत दिए?

अमेरिकी समाचार पत्र द वॉल स्ट्रीट जर्नल ने प्रशासनिक अधिकारियों का हवाला देते हुए बताया कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने करीबी सहयोगियों से कहा है कि वह होर्मुज जलडमरुमध्य मोटे तौर पर बंद रहने की सूरत में भी ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान खत्म करने के लिए तैयार हैं, जो बाद में किसी और समय फिर से शुरू किया जा सकता है.

वॉल स्ट्रीट जर्नल की खबर के अनुसार हालिया दिनों में ट्रंप और उनके सहयोगियों द्वारा यह अनुमान लगाया है कि जलडमरुमध्य को जबरन खुलवाने के लिए एक अभियान चलाने से संघर्ष ट्रंप की निर्धारित समयसीमा, यानी चार-छह सप्ताह से आगे बढ़ जाएगा.

खबर के अनुसार ट्रंप ने फैसला किया है कि अमेरिका को ईरान की नौसेना को कमजोर करने और उसके मिसाइल भंडार को नुकसान पहुंचाने जैसे अपने मुख्य उद्देश्यों को हासिल करने के बाद मौजूदा सैन्य संघर्ष को धीरे-धीरे समाप्त करना चाहिए, और साथ ही तेहरान पर कूटनीतिक दबाव डालकर व्यापार के मुक्त प्रवाह को फिर से शुरू करने के लिए मजबूर करना चाहिए.

खबर में अधिकारियों के हवाले से कहा गया है कि अगर यह प्रयास विफल रहता है, तो अमेरिका यूरोप और खाड़ी क्षेत्र में अपने सहयोगियों पर दबाव डालेगा कि वे जलडमरूमध्य को फिर खुलवाने के लिए आगे आएं.

क्या अरब देशों को भी देना होगा सैन्य खर्च?

सोमवार को एक संवाददाता सम्मेलन में अमेरिकी राष्ट्रपति कार्यालय ‘व्हाइट हाउस’ की प्रेस सचिव कैरोलीन लेविट ने कहा कि राष्ट्रपति और पेंटागन प्रमुख ने हमेशा सैन्य अभियान के लिए चार से छह सप्ताह की अनुमानित समयसीमा बताई है. उन्होंने कहा, “आज 30 दिन हो गए हैं.” लेविट ने यह संकेत भी दिया कि अरब देशों से भी ईरान में जारी सैन्य अभियान का बोझ साझा करने के लिए कहा जा सकता है.

जब यह पूछा गया कि क्या कुवैत, यूएई और सऊदी अरब जैसे देशों को ईरान में जारी सैन्य अभियान का खर्च उठाना चाहिए तो उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि यह ऐसा मुद्दा है जिसमें राष्ट्रपति काफी रुचि ले सकते हैं. मैं इस पर उनसे पहले कुछ नहीं कहूंगी, लेकिन निश्चित रूप से यह एक विचार है और मुझे लगता है कि वह इस बारे में आपको ज्यादा जानकारी दे पाएंगे.”

दरअसल, अमेरिका और इजराइल ने 28 फरवरी को ईरान पर हमला कर दिया था, जिसके बाद ईरान ने पलटवार किया और पूरे खाड़ी क्षेत्र में संघर्ष फैल गया. होर्मुज जलडमरुमध्य दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण रणनीतिक मार्ग है. Strait of Hormuz फारस की खाड़ी को हिंद महासागर से जोड़ने वाला एक संकरा समुद्री मार्ग है, जो फिलहाल काफी हद तक बंद है. इसके कारण रोजाना गुजरने वाले सैकड़ों जहाजों की आवाजाही लगभग बंद हो गई है.

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