चीन-रूस के ट्रैप में फंसे ट्रंप? ईरान ने ठुकराई सीक्रेट डील, अब अमेरिका के पास आखिरी रास्ता क्या?
ईरान ने सीक्रेट डील से इनकार कर अमेरिका की रणनीति को झटका दिया. चीन-रूस फैक्टर के बीच ट्रंप के सामने अब कूटनीति, दबाव या टकराव में क्या विकल्प बचे हैं?
मिडिल ईस्ट में फरवरी 2026 से चल रही कूटनीतिक हलचल अब एक नए मोड़ पर पहुंच गई है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जिस समझौते को अपनी बड़ी विदेश नीति जीत के रूप में पेश करना चाहते थे, उसी पर ईरान ने सार्वजनिक तौर पर ठंडा पानी डाल दिया. ट्रंप ने दावा किया था कि तेहरान परमाणु कार्यक्रम पर बड़ी रियायतें देने को तैयार है और 60 दिनों के युद्धविराम को बढ़ाया जाएगा, लेकिन ईरानी नेतृत्व ने साफ संकेत दिया कि अमेरिका की शर्तों पर कोई अंतिम सहमति नहीं बनी है. यही वजह है कि अब सवाल उठ रहा है कि क्या चीन और रूस की बढ़ती भूमिका ने अमेरिका की पूरी रणनीति को उलझा दिया है.
आखिर कौन-सी डील की कोशिश हो रही थी?
अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत का केंद्र परमाणु कार्यक्रम, यूरेनियम संवर्धन (Enrichment), स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की सुरक्षा और क्षेत्रीय तनाव कम करना था. रिपोर्टों के मुताबिक अमेरिका चाहता था कि ईरान अपने उच्च स्तर के संवर्धित यूरेनियम भंडार को खत्म करे, परमाणु हथियार बनाने की दिशा में जाने वाली सभी संभावनाओं को बंद करे और अंतरराष्ट्रीय निगरानी को स्वीकार करे.
ट्रंप प्रशासन की कोशिश थी कि 2015 के ओबामा-युग के परमाणु समझौते से भी ज्यादा सख्त व्यवस्था बनाई जाए. अमेरिका केवल अस्थायी रोक नहीं बल्कि लंबे समय तक या स्थायी प्रतिबंध चाहता था, जबकि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को राष्ट्रीय संप्रभुता और सुरक्षा से जोड़कर देखता है.
डील क्यों अटक गई?
सबसे बड़ा विवाद यूरेनियम संवर्धन को लेकर है. अमेरिका की मांग थी कि ईरान या तो संवर्धन पूरी तरह बंद करे या उसके मौजूदा उच्च संवर्धित यूरेनियम भंडार को देश से बाहर भेजा जाए. दूसरी तरफ ईरान का कहना है कि शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम चलाना उसका वैध अधिकार है और वह “जीरो एनरिचमेंट” की शर्त स्वीकार नहीं करेगा.
यही नहीं, अमेरिका की तरफ से परमाणु ढांचे को सीमित करने, मिसाइल कार्यक्रम पर नियंत्रण और क्षेत्रीय गतिविधियों पर रोक जैसी शर्तें भी रखी गईं. ईरान ने इन्हें अपनी सुरक्षा संरचना पर सीधा हमला माना.
तेहरान को यह भी भरोसा नहीं है कि किसी समझौते के बाद अमेरिका भविष्य में उसे तोड़ेगा नहीं. 2018 में अमेरिका द्वारा पुराने परमाणु समझौते से बाहर निकलने का अनुभव अभी भी ईरानी नेतृत्व की सोच पर असर डालता है.
ट्रंप आखिर चाहते क्या हैं?
ट्रंप के सामने दो लक्ष्य हैं. पहला, ईरान को परमाणु हथियार क्षमता हासिल करने से रोकना. दूसरा, मिडिल ईस्ट में ऐसा समझौता दिखाना जिसे घरेलू राजनीति में बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश किया जा सके.
अमेरिका को डर है कि अगर ईरान के पास बड़ी मात्रा में 60 प्रतिशत तक संवर्धित यूरेनियम बना रहता है तो वह अपेक्षाकृत कम समय में हथियार-स्तर के 90 प्रतिशत संवर्धन तक पहुंच सकता है. अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) पहले भी ईरान के बढ़ते भंडार को लेकर चिंता जता चुकी है.
इसके अलावा, वॉशिंगटन चाहता है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में किसी तरह का संकट न हो, क्योंकि दुनिया के तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से गुजरता है. इस इलाके में तनाव बढ़ने का सीधा असर वैश्विक तेल कीमतों और विश्व अर्थव्यवस्था पर पड़ता है.
ईरान तैयार क्यों नहीं?
ईरान की नजर में यह केवल परमाणु मुद्दा नहीं बल्कि सत्ता, सुरक्षा और प्रतिष्ठा का सवाल है. तेहरान मानता है कि अगर उसने अपनी संवर्धन क्षमता पूरी तरह छोड़ दी तो भविष्य में उसके पास कोई रणनीतिक दबाव बिंदु नहीं बचेगा.
यही कारण है कि उच्च संवर्धित यूरेनियम का भंडार ईरान का सबसे बड़ा “बर्गेनिंग चिप” बन गया है. रिपोर्टों के अनुसार, हालिया सैन्य हमलों के बाद भी ईरान के पास महत्वपूर्ण मात्रा में संवर्धित सामग्री बची हुई है.
ईरानी नेतृत्व यह भी मानता है कि क्षेत्र में इजरायल, अमेरिकी सैन्य उपस्थिति और लगातार प्रतिबंधों के बीच बिना सुरक्षा गारंटी के कोई बड़ी रियायत देना जोखिम भरा होगा. इसी वजह से तेहरान लगातार कह रहा है कि पहले प्रतिबंधों और दबाव की नीति खत्म हो, उसके बाद समझौते की बात आगे बढ़े.
चीन और रूस का खेल क्या?
यहीं से कहानी और दिलचस्प हो जाती है. चीन और रूस सीधे तौर पर अमेरिका-ईरान वार्ता को नियंत्रित नहीं कर रहे, लेकिन दोनों देशों ने ईरान को इतना कूटनीतिक और आर्थिक सहारा जरूर दिया है कि तेहरान अब पहले की तुलना में ज्यादा आत्मविश्वास से बातचीत कर रहा है.
चीन ईरानी तेल का बड़ा खरीदार बना हुआ है. पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद बीजिंग ने तेहरान के लिए आर्थिक ऑक्सीजन का काम किया है. दूसरी तरफ रूस ने परमाणु मुद्दे पर कई बार मध्यस्थ या वैकल्पिक साझेदार की भूमिका निभाने की कोशिश की है. यहां तक कि रूस की तरफ से ईरान के संवर्धित यूरेनियम को अपने यहां रखने का प्रस्ताव भी सामने आया था.
यूक्रेन युद्ध के बाद रूस और चीन दोनों अमेरिकी प्रभाव को चुनौती देने वाली बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की बात करते हैं. ऐसे में ईरान उनके लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार बन गया है. यही वजह है कि तेहरान को अब यह महसूस होता है कि उसके पास केवल पश्चिम पर निर्भर रहने की मजबूरी नहीं है.
ईरान ने कैसे पलट दिया खेल?
कुछ दिन पहले तक संकेत मिल रहे थे कि कोई प्रारंभिक समझ बन सकती है, लेकिन फिर ईरान ने सार्वजनिक रूप से उन दावों से दूरी बना ली जिनमें कहा जा रहा था कि वह अपना संवर्धित यूरेनियम छोड़ने को तैयार है.
तेहरान ने संदेश दिया कि अंतिम समझौते से पहले वह अपनी सबसे बड़ी रणनीतिक ताकत नहीं छोड़ेगा. इससे अमेरिका की वार्ता रणनीति पर दबाव बढ़ गया. अब यदि वॉशिंगटन अपनी शर्तों पर अड़ा रहता है तो बातचीत टूट सकती है, और यदि नरमी दिखाता है तो घरेलू राजनीतिक आलोचना का सामना करना पड़ सकता है.
यानी ईरान ने अपने सीमित संसाधनों के बावजूद बातचीत की मेज पर समय, भू-राजनीति और चीन-रूस के समर्थन का इस्तेमाल करके अमेरिका की जल्दबाजी को अपने पक्ष में मोड़ दिया है.
मिडिल ईस्ट युद्ध से इसका क्या संबंध है?
गाजा युद्ध, लेबनान में तनाव, रेड सी संकट, हूती गतिविधियां और ईरान-इजरायल टकराव ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर बना दिया है. अमेरिका नहीं चाहता कि परमाणु संकट और क्षेत्रीय युद्ध एक साथ विस्फोटक रूप लें.
दूसरी तरफ ईरान यह समझता है कि क्षेत्रीय अस्थिरता उसे अतिरिक्त रणनीतिक महत्व देती है. जब भी मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ता है, दुनिया का ध्यान ऊर्जा सुरक्षा और समुद्री मार्गों पर चला जाता है. ऐसे में तेहरान की बातचीत की ताकत बढ़ जाती है.
60 दिनों के लिए युद्धविराम की चर्चा क्यों?
अमेरिका की ओर से 60 दिनों के युद्धविराम (Ceasefire Extension) का विचार मुख्य रूप से क्षेत्रीय तनाव को नियंत्रित करने और कूटनीतिक बातचीत के लिए समय निकालने से जुड़ा है. ट्रंप प्रशासन की ओर से ऐसा प्रस्ताव रखा गया है. इसके पीछै वॉशिंगटन का मानना है कि यदि संघर्ष कुछ समय के लिए रोका जाए तो परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों और सुरक्षा गारंटी जैसे मुद्दों पर बातचीत आगे बढ़ सकती है.
ट्रंप प्रशासन का ये भी कहना है कि अमेरिका नहीं चाहता कि सैन्य टकराव सीधे बड़े क्षेत्रीय युद्ध में बदल जाए, क्योंकि इससे तेल आपूर्ति, वैश्विक अर्थव्यवस्था और उसके सहयोगियों की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है. हालांकि ईरान युद्धविराम को तभी स्वीकार करने के पक्ष में दिखता है जब उसे ठोस राजनीतिक और आर्थिक रियायतों की गारंटी मिले. कुछ एक्सपर्ट ये भी कहते हैं कि ट्रंप के हाथ में अब बहुत कुछ नहीं है. वह किसी तरह इससे बाहर निकलना चाहते हैं, लेकिन उन्हें कोई रास्ता नजर नहीं आ रही है.
यह संकट कब से है और कब तक चलेगा?
इस विवाद की जड़ें 1979 की ईरानी इस्लामी क्रांति तक जाती हैं. इसके बाद अमेरिका और ईरान के रिश्ते लगातार तनावपूर्ण रहे. 2000 के दशक में परमाणु कार्यक्रम मुख्य मुद्दा बना. 2015 में परमाणु समझौता हुआ, लेकिन 2018 में अमेरिका के बाहर निकलने के बाद अविश्वास फिर बढ़ गया.
2026 में हालिया सैन्य तनाव, प्रतिबंध, समुद्री टकराव और नई वार्ताओं ने इस संकट को और जटिल बना दिया है. मौजूदा हालात देखते हुए यह कहना मुश्किल है कि कोई स्थायी समाधान जल्दी निकलेगा. जब तक अमेरिका “जीरो एनरिचमेंट” और ईरान “परमाणु अधिकार” की अपनी मूल स्थिति से पीछे नहीं हटते, तब तक यह टकराव किसी न किसी रूप में जारी रहने की संभावना है.
यानी फिलहाल डील से ज्यादा दबाव की राजनीति चल रही है. ट्रंप त्वरित समाधान चाहते हैं, जबकि ईरान लंबी रणनीतिक लड़ाई खेल रहा है. और इसी बीच चीन और रूस वह बैकअप स्पेस दे रहे हैं, जिसने तेहरान को अमेरिका के सामने झुकने से रोके रखा है.
डील फेल, अब ट्रंप की अगली चाल क्या?
विदेश मामलों के जानकार ब्रह्मदीप अलूने का कहना है कि ईरान के इनकार के बाद अमेरिका के पास मोटे तौर पर चार विकल्प बचे हैं. पहला, कूटनीतिक वार्ता जारी रखकर किसी सीमित समझौते की कोशिश करना. दूसरा, आर्थिक प्रतिबंधों को और सख्त कर ईरान पर दबाव बढ़ाना. तीसरा, चीन, रूस और यूरोपीय सहयोगियों के साथ मिलकर बहुपक्षीय दबाव बनाना ताकि तेहरान को रियायतें देने पर मजबूर किया जा सके. चौथा, सैन्य दबाव या क्षेत्रीय शक्ति-प्रदर्शन, हालांकि यह सबसे जोखिम भरा विकल्प माना जाता है क्योंकि इससे व्यापक मिडिल ईस्ट संघर्ष भड़क सकता है. फिलहाल वॉशिंगटन की प्राथमिकता बातचीत और दबाव के मिश्रण के जरिए ईरान को समझौते की मेज पर बनाए रखना है.




