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ये हैं भारत का 'बाउंसर गांव', जहां हर घर से निकलता है पहलवान, जानिए क्या खाते हैं यहां के ताकतवर युवा?

दक्षिण दिल्ली का असोला-फतेहपुर बेरी गांव आज फिटनेस, अखाड़ों और बाउंसर कल्चर के लिए पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है.

ये हैं भारत का बाउंसर गांव, जहां हर घर से निकलता है पहलवान, जानिए क्या खाते हैं यहां के ताकतवर युवा?
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असोला-फतेहपुर बेरी… दिल्ली का वो गांव, जहां सुबह की शुरुआत चाय से नहीं बल्कि दंगल, पुशअप्स और भारी-भरकम वर्कआउट से होती है. यहां हर गली में आपको जिम, अखाड़ा और मजबूत शरीर वाले युवा दिखाई देंगे. यही वजह है कि लोग इस गांव को 'बाउंसरों की फैक्ट्री' और 'भारत का सबसे ताकतवर गांव' तक कहने लगे हैं. दक्षिण दिल्ली का यह गांव सिर्फ अपनी फिटनेस कल्चर के लिए नहीं, बल्कि हजारों बाउंसर और पहलवान तैयार करने के लिए भी मशहूर है.

यहां फिटनेस कोई शौक नहीं बल्कि जिंदगी का हिस्सा है. गांव के बच्चे बचपन से ही अखाड़े की मिट्टी में पसीना बहाना सीख जाते हैं. मोबाइल और टीवी से ज्यादा यहां युवाओं का समय एक्सरसाइज, कुश्ती और बॉडी बनाने में गुजरता है. यही कारण है कि असोला-फतेहपुर बेरी के कई युवक दिल्ली-NCR के होटल, क्लब, बड़े इवेंट और वीआईपी सिक्योरिटी में बाउंसर और बॉडीगार्ड के तौर पर काम कर रहे हैं.

आखिर क्यों मशहूर है असोला-फतेहपुर बेरी?

असोला-फतेहपुर बेरी को लोग 'बाउंसरों का गांव' इसलिए कहते हैं क्योंकि यहां लगभग हर घर से एक युवक फिटनेस या सिक्योरिटी लाइन से जुड़ा हुआ है. गांव में सुबह-शाम जिम और अखाड़ों में भीड़ लगी रहती है. यहां के युवा खुद को मजबूत बनाने के लिए अलग-अलग तरीके अपनाते हैं. कोई ट्रैक्टर खींचता दिख जाता है तो कोई भारी बाइक उठाकर ट्रेनिंग करता है. गांव के बुजुर्गों का मानना है कि मजबूत शरीर मेहनत, अनुशासन और सही खानपान से बनता है. इसलिए यहां युवाओं को छोटी उम्र से ही सख्त रूटीन फॉलो करना सिखाया जाता है.

पहलवान बनने के लिए कितना खाना पड़ता है?

अक्सर लोग सोचते हैं कि पहलवान या बाउंसर बनने के लिए सिर्फ जिम जाना काफी है, लेकिन असली मेहनत ट्रेनिंग के साथ-साथ खानपान में होती है. बड़े-बड़े पहलवान दिन के कई घंटे सिर्फ एक्सरसाइज में निकालते हैं. पुराने जमाने के मशहूर रेसलर दारा सिंह और गामा पहलवान का नाम आज भी फिटनेस की मिसाल माना जाता है.

बताया जाता है कि दारा सिंह रोजाना हजारों दंड-बैठक लगाते थे. वहीं गामा पहलवान की डाइट इतनी भारी थी कि आज सुनकर लोग हैरान हो जाते हैं. फिटनेस एक्सपर्ट्स के मुताबिक, पुराने समय के पहलवान हजारों कैलोरी की डाइट लेते थे ताकि शरीर को ताकत और रिकवरी मिल सके.

क्या खाते हैं पहलवान और बाउंसर?

असोला-फतेहपुर बेरी के ज्यादातर युवा देसी और हेल्दी खाना पसंद करते हैं. उनकी डाइट में दूध, दही, घी, पनीर, दाल, सूखे मेवे और प्रोटीन वाली चीजें भरपूर होती हैं. कई लोग अंडा, चिकन और मटन भी खाते हैं.

उनकी रोजाना की डाइट कुछ इस तरह होती है-

  • सुबह दूध, बादाम और देसी घी
  • दिन में दाल, रोटी, चावल और सलाद
  • एक्सरसाइज के बाद प्रोटीन वाली चीजें
  • शाम को हल्का लेकिन पौष्टिक खाना

गांव के लोग शराब, स्मोकिंग और जंक फूड से दूरी बनाकर रखते हैं. उनका मानना है कि गलत आदतें शरीर को कमजोर बना देती हैं.

सिर्फ बॉडी नहीं, अनुशासन भी है पहचान

इस गांव की सबसे बड़ी खासियत सिर्फ मजबूत शरीर नहीं, बल्कि अनुशासन है. यहां के युवा सुबह जल्दी उठते हैं, तय समय पर ट्रेनिंग करते हैं और खानपान का पूरा ध्यान रखते हैं. गांव के बुजुर्ग बच्चों को छोटी उम्र से मेहनत और फिटनेस का महत्व समझाते हैं. यही वजह है कि असोला-फतेहपुर बेरी आज सिर्फ दिल्ली का गांव नहीं, बल्कि फिटनेस और पहलवानी की पहचान बन चुका है. यहां के युवाओं का मानना है कि मजबूत शरीर रातों-रात नहीं बनता, उसके लिए सालों की मेहनत, सही डाइट और अनुशासन जरूरी होता है.

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