क्या करीब 18 साल बाद टाटा समूह की पश्चिम बंगाल में वापसी होने वाली है? क्या सिंगुर, जो कभी उद्योगों के पलायन की पहचान बन गया था, अब फिर से निवेश और रोजगार का नया केंद्र बनेगा? वो कौन-सी घटना थी जिसने भारत के सबसे बड़े औद्योगिक समूहों में से एक टाटा को बंगाल छोड़ने पर मजबूर कर दिया था? दरअसल, पश्चिम बंगाल भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य ने दावा किया है कि टाटा समूह एक बार फिर राज्य में लौट सकता है. उन्होंने कहा कि टाटा का बंगाल छोड़ना राज्य के इतिहास की सबसे शर्मनाक घटनाओं में से एक था, जिसने पूरे देश में गलत संदेश भेजा. उनका यह बयान ऐसे समय में आया है जब भाजपा ने राज्य में उद्योगों को बढ़ावा देने और नए निवेश आकर्षित करने के लिए 100 दिनों की विशेष योजना शुरू की है. लेकिन इस बयान को समझने के लिए हमें करीब दो दशक पीछे जाना होगा... साल था 2008 टाटा मोटर्स अपनी महत्वाकांक्षी नैनो कार परियोजना पर काम कर रही थी. कंपनी ने पश्चिम बंगाल के सिंगुर में एक विशाल प्लांट लगभग तैयार कर लिया था. यह वही नैनो कार थी जिसे दुनिया की सबसे सस्ती कार के रूप में पेश किया जा रहा था. उम्मीद थी कि इससे हजारों लोगों को रोजगार मिलेगा और बंगाल में औद्योगिक विकास की नई शुरुआत होगी. लेकिन इसी दौरान सिंगुर में जमीन अधिग्रहण को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया. आरोप लगाए गए कि किसानों की बहु-फसली कृषि भूमि उनकी इच्छा के खिलाफ अधिग्रहित की गई है. उस समय विपक्ष में मौजूद ममता बनर्जी ने किसानों के समर्थन में आंदोलन शुरू कर दिया. देखते ही देखते यह आंदोलन इतना बड़ा हो गया कि सिंगुर राष्ट्रीय राजनीति का केंद्र बन गया.