Afghanistan के बाद अब Iran? क्या America पर मंडरा रहा ‘Forever War’ का खतरा
ईरान संकट ने अमेरिका के सामने नए “Forever War” का खतरा खड़ा कर दिया है. जानिए कैसे ड्रोन, प्रॉक्सी और तेल राजनीति इस संघर्ष को लंबा बना सकती है.
अमेरिका ने 2021 में अफगानिस्तान से अपनी सेना हटाते समय दावा किया था कि वह अब Forever War (अंतहीन युद्धों) के दौर को खत्म कर रहा है. उससे पहले इराक युद्ध भी वॉशिंगटन के लिए राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य रूप से भारी साबित हुआ था. लेकिन अब वेस्ट एशिया में बढ़ते तनाव, ईरान के साथ टकराव और खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य सक्रियता ने फिर वही सवाल खड़ा कर दिया है. क्या अमेरिका एक बार फिर ऐसे संघर्ष में फंस रहा है, जिसका कोई स्पष्ट अंत नहीं होगा? फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार युद्ध का स्वरूप बदल चुका है. अब टैंक और बड़े जमीनी कब्जे की जगह समुद्री रास्तों, ड्रोन, साइबर हमलों, आर्थिक प्रतिबंधों और प्रॉक्सी संगठनों के जरिए लंबे समय तक चलने वाला संघर्ष देखने को मिल सकता है.
क्या इस संघर्ष का कोई स्पष्ट लक्ष्य दिखाई देता है?
किसी भी युद्ध के लंबे खिंचने की सबसे बड़ी वजह उसका अस्पष्ट लक्ष्य होता है. अमेरिका की ईरान नीति में भी यही समस्या दिखाई देती है. वॉशिंगटन एक तरफ ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकना चाहता है, दूसरी तरफ वह खाड़ी क्षेत्र में समुद्री व्यापार की सुरक्षा भी चाहता है. इसके साथ-साथ अमेरिका इजरायल की सुरक्षा, क्षेत्रीय संतुलन और अपने सैन्य प्रभाव को भी बनाए रखना चाहता है.
समस्या यह है कि इन लक्ष्यों में से कोई भी ऐसा नहीं है जिसे आसानी से हासिल कर “जीत” घोषित की जा सके. इराक और अफगानिस्तान में भी अमेरिका स्पष्ट रणनीति न होने के कारण उसे अंतिम मुकाम तक नहीं पहुंचा सका. नतीजा यह हुआ कि युद्ध लगातार फैलता गया और उसकी लागत बढ़ती चली गई. ईरान संकट में भी यही खतरा दिखाई दे रहा है. इन सबसे पहले वियतनाम वॉर में भी अमेरिका को मुंह की खानी पड़ी थी.
ईरान ट्रेडिशनल वॉर के बजाय लंबी रणनीति पर काम करता है?
ईरान की सैन्य सोच अमेरिका से पूरी तरह अलग मानी जाती है. तेहरान सीधे बड़े युद्ध की बजाय कम लागत वाले लंबे दबाव की नीति अपनाता रहा है. यही कारण है कि उसने वर्षों से क्षेत्रीय सहयोगी संगठनों और प्रॉक्सी नेटवर्क पर निवेश किया है.
लेबनान में हिजबुल्लाह, यमन में हूती संगठन, इराक और सीरिया में सक्रिय शिया गुट, ईरान की व्यापक रणनीति का हिस्सा माने जाते हैं. इन संगठनों के जरिए ईरान बिना सीधे युद्ध घोषित किए अमेरिका और उसके सहयोगियों पर दबाव बनाता है.
इसके अलावा, ईरान साइबर हमलों, ड्रोन तकनीक और समुद्री मार्गों में रुकावट पैदा करने की क्षमता भी रखता है. होर्मुज स्ट्रेट में तनाव बढ़ाना पूरी दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित कर सकता है. यही वजह है कि यह संघर्ष सीमित सैन्य कार्रवाई के बावजूद लंबे समय तक जारी रह सकता है.
अमेरिकी सेना पर कई मोर्चों का दबाव बढ़ रहा है?
अमेरिका इस समय केवल पश्चिम एशिया पर ध्यान केंद्रित नहीं कर रहा है. एक तरफ वह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने की रणनीति पर काम कर रहा है. दूसरी तरफ यूक्रेन युद्ध में रूस के खिलाफ सैन्य और आर्थिक समर्थन भी दे रहा है. लाल सागर और खाड़ी क्षेत्र में भी उसकी नौसैनिक मौजूदगी लगातार बनी हुई है.
ऐसे में ईरान के साथ नया तनाव अमेरिकी सेना पर 'मल्टी वॉर' का दबाव बढ़ा सकता है. रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक अलग-अलग क्षेत्रों में सैन्य सक्रियता बनाए रखना आर्थिक रूप से बेहद महंगा और रणनीतिक रूप से जोखिम भरा होता है. यही स्थिति कभी इराक और अफगानिस्तान युद्धों के दौरान भी बनी थी.
क्या तेल बाजार संघर्ष को लंबा बना सकते हैं?
पश्चिम एशिया का कोई भी संकट केवल क्षेत्रीय नहीं रहता, क्योंकि इसका सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ता है. दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल परिवहन का रास्ता होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरता है. यदि यहां तनाव बढ़ता है तो कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आ सकता है.
ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी का असर महंगाई, वैश्विक व्यापार और आर्थिक विकास पर पड़ता है. यही कारण है कि हर छोटी सैन्य घटना अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बड़ी प्रतिक्रिया पैदा करती है. इससे संघर्ष लगातार वैश्विक चर्चा में बना रहता है और राजनीतिक दबाव बढ़ता जाता है.
क्या घरेलू राजनीति भी अमेरिका के लिए संकट बढ़ा सकती है?
अमेरिका में किसी भी सैन्य टकराव का असर घरेलू राजनीति पर भी पड़ता है. यदि पश्चिम एशिया में अमेरिकी सैनिकों या ठिकानों पर बड़ा हमला होता है तो सरकार पर जवाबी कार्रवाई का दबाव बढ़ जाता है. इसके बाद प्रतिशोध, जवाबी हमला और फिर नए हमलों का चक्र शुरू हो सकता है.
इराक युद्ध के बाद भी अमेरिका लंबे समय तक इसी प्रकार के प्रॉक्सी संघर्षों में उलझा रहा था. यही वजह है कि कई विशेषज्ञों को डर है कि ईरान संकट भी धीरे-धीरे “स्थायी सैन्य तनाव” में बदल सकता है.
भारत के लिए इसका क्या मतलब?
भारत के लिए पश्चिम एशिया का संकट बेहद संवेदनशील है. भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से पूरा करता है. यदि तेल महंगा होता है तो इसका सीधा असर महंगाई और आर्थिक विकास पर पड़ेगा.
इसके अलावा, खाड़ी देशों में काम करने वाले लाखों भारतीयों की सुरक्षा और वहां से आने वाली विदेशी मुद्रा भी महत्वपूर्ण है. समुद्री व्यापार महंगा होने से भारत के आयात-निर्यात पर असर पड़ सकता है. साथ ही भारत को अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती भी झेलनी पड़ सकती है. यही कारण है कि ईरान संकट केवल पश्चिम एशिया की समस्या नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था के लिए लॉन्ग टर्म चुनौती बनता जा रहा है.




