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क्या है Abraham Accords जो बना पाकिस्तान की गले की फांस, इजराइल से लेकर ट्रंप तक - बुरी तरह घिरे मुनीर और शरीफ

Abraham Accords पर ट्रंप की अपील के बाद पाकिस्तान में सियासी हलचल तेज है. इजराइल मुद्दे पर मुनीर और शहबाज शरीफ की मुश्किलें बढ़ती दिख रही हैं.

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की एक अपील ने पाकिस्तान की अंदरूनी राजनीति, सेना और विदेश नीति में नया भूचाल ला दिया है. वह चाहते हैं कि मुस्लिम देश अब्राहम अकॉर्ड (Abraham Accords) में शामिल होकर इजराइल के साथ रिश्ते सामान्य करें, लेकिन पाकिस्तान ने इसे अपनी मौलिक विचारधारा (Core Principles) के खिलाफ बता दिया. वहां के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ (Khawaja Asif) के बयान के बाद सवाल और गहरे हो गए, क्योंकि ट्रंप की बातचीत में पाकिस्तान सेना प्रमुख Asim Munir का नाम भी सामने आया. अब पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अमेरिका को नाराज किए बिना फिलिस्तीन समर्थक अपनी पुरानी नीति को कैसे बचाए. यही वजह है कि अब्राहम अकॉर्ड अब पाकिस्तान के लिए केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और वैचारिक संकट बन चुका है.

दरअसल, Trump की अपील पर पाकिस्तान ने साफ संकेत दिए हैं कि वह इजराइल के साथ संबंध सामान्य करने वाले किसी भी समझौते का हिस्सा बनने को तैयार नहीं है. लेकिन इसी मुद्दे ने पाकिस्तान के भीतर सत्ता संतुलन, सेना की भूमिका और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की राजनीतिक स्थिति पर भी नए सवाल खड़े कर दिए हैं. खासकर तब, जब ट्रंप ने जिन नेताओं से बातचीत का दावा किया, उनमें पाकिस्तान सेना प्रमुख Asim Munir का नाम भी शामिल था.

पाकिस्तान ने ट्रंप के प्रस्ताव को क्यों ठुकराया?

पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने अब्राहम समझौते में शामिल होने की संभावना को लगभग खारिज करते हुए कहा कि पाकिस्तान किसी ऐसे समझौते का हिस्सा नहीं बन सकता जो उसकी फंडामेंटल प्रिंसिपल्स के खिलाफ हो. उन्होंने कहा कि इजराइल पर भरोसा नहीं किया जा सकता और पाकिस्तान का रुख लंबे समय से स्पष्ट है कि फिलिस्तीन मुद्दे के समाधान से पहले वह इजराइल को मान्यता नहीं देगा.

आसिफ ने यहां तक कहा कि पाकिस्तान उन चुनिंदा देशों में शामिल है, जिसके पासपोर्ट पर भी इजराइल का नाम नहीं लिखा होता. हालांकि, उन्होंने अपनी टिप्पणी को निजी राय बताया, लेकिन पाकिस्तान सरकार, विदेश मंत्रालय और ISPR की चुप्पी ने इस पूरे विवाद को और बड़ा बना दिया है.

ट्रंप आखिर चाहते क्या हैं?

डोनाल्ड ट्रंप की कोशिश पश्चिम एशिया में एक बड़े रणनीतिक पुनर्गठन की मानी जा रही है. ट्रंप चाहते हैं कि कई मुस्लिम और अरब देश इजराइल के साथ औपचारिक रिश्ते स्थापित करें और Abraham Accords का दायरा बढ़ाया जाए. ट्रंप का दावा है कि इन समझौतों से जुड़े देशों को आर्थिक, तकनीकी और सुरक्षा के स्तर पर भारी फायदे हुए हैं.

ट्रंप ने सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, तुर्की, मिस्र और अन्य देशों से एक साथ इस समझौते में शामिल होने की अपील की थी. उन्होंने यह भी संकेत दिया कि ईरान के साथ किसी संभावित समझौते से पहले इस क्षेत्र में नई कूटनीतिक संरचना तैयार की जानी चाहिए.

यही वजह है कि पाकिस्तान पर दबाव बढ़ा, क्योंकि हाल के दिनों में ट्रंप ने जिन नेताओं से बातचीत की, उनमें पाकिस्तान सेना प्रमुख आसिम मुनीर भी शामिल बताए गए. इसके बाद पाकिस्तान में सवाल उठने लगे कि क्या सेना और सरकार इस मुद्दे पर एकमत हैं या नहीं.

आखिर Abraham Accords है क्या?

अब्राहम अकॉर्ड 2020 में ट्रंप प्रशासन के दौरान शुरू किया गया अमेरिकी मध्यस्थता वाला समझौता था. इसका उद्देश्य इजराइल और अरब देशों के बीच दशकों पुराने टकराव को खत्म कर कूटनीतिक संबंध स्थापित करना था. इस समझौते के तहत सबसे पहले यूएई और बहरीन

ने इजराइल को औपचारिक मान्यता दी. इसके बाद मोरक्को और सूडान भी इस प्रक्रिया में शामिल हुए. ट्रंप के दामाद Jared Kushner ने इस समझौते को अंतिम रूप दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी. अमेरिका का दावा था कि इससे पश्चिम एशिया में शांति, व्यापार, निवेश और सुरक्षा सहयोग को नई दिशा मिलेगी. हालांकि, फिलिस्तीन समर्थक देशों ने इसे फिलिस्तीनी मुद्दे की अनदेखी करार दिया.

पाकिस्तान के लिए यह इतना संवेदनशील क्यों?

पाकिस्तान की विदेश नीति में फिलिस्तीन मुद्दा हमेशा बेहद भावनात्मक और वैचारिक विषय रहा है. पाकिस्तान ने आज तक इजराइल को एक राष्ट्र के रूप में मान्यता नहीं दी है. इस्लामाबाद का आधिकारिक रुख यह रहा है कि 1967 से पहले की सीमाओं के आधार पर स्वतंत्र फिलिस्तीनी राष्ट्र बनने तक वह इजराइल से संबंध स्थापित नहीं करेगा.

यही कारण है कि पाकिस्तान के भीतर धार्मिक संगठनों, कट्टरपंथी समूहों और विपक्षी दलों के बीच यह मुद्दा बेहद संवेदनशील माना जाता है. यदि पाकिस्तान Abraham Accords में शामिल होता है, तो उसे घरेलू स्तर पर भारी राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ सकता है.

मुनीर और शहबाज शरीफ क्यों घिर गए?

इस पूरे विवाद में सबसे ज्यादा दबाव पाकिस्तान सेना प्रमुख आसिम मुनीर और प्रधानमंत्री Shehbaz Sharif पर दिखाई दे रहा है. ट्रंप के बयान के बाद पाकिस्तान में यह चर्चा तेज हो गई कि क्या अमेरिका के साथ बातचीत में किसी तरह की सहमति बनी थी, जिसे बाद में सार्वजनिक दबाव के कारण खारिज करना पड़ा.

विपक्ष और पाकिस्तानी मीडिया का एक हिस्सा पहले ही आरोप लगाता रहा है कि पाकिस्तान की वास्तविक सत्ता सेना के हाथ में है और शहबाज शरीफ केवल औपचारिक प्रधानमंत्री की भूमिका निभा रहे हैं. ट्रंप के पोस्ट में आसिम मुनीर का जिक्र आने के बाद यह बहस और तेज हो गई.

दूसरे मुस्लिम देशों का रुख क्या है?

सऊदी अरब के मुहम्मद बिन सुल्तान ने फिलहाल स्पष्ट किया है कि वह तब तक इजराइल के साथ संबंध सामान्य नहीं करेगा, जब तक फिलिस्तीन के लिए “अपरिवर्तनीय रास्ता” तय नहीं हो जाता. हालांकि पश्चिम एशिया की बदलती राजनीति को देखते हुए यह भी माना जा रहा है कि कई देश भविष्य में व्यावहारिक रणनीति अपनाने की कोशिश कर सकते हैं.

कई अरब देशों के लिए अब सुरक्षा, निवेश, तकनीक और अमेरिका के साथ रणनीतिक संबंध भी उतने ही महत्वपूर्ण हो चुके हैं जितना फिलिस्तीन मुद्दा. यही कारण है कि Abraham Accords को केवल कूटनीतिक समझौता नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया की नई भू-राजनीतिक व्यवस्था के रूप में देखा जा रहा है.

पाकिस्तान के सामने बड़ी चुनौती क्या है?

पाकिस्तान इस समय आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और अंतरराष्ट्रीय दबावों से जूझ रहा है. ऐसे में अमेरिका के साथ संबंध खराब करना भी उसके लिए आसान नहीं है. दूसरी तरफ, इजराइल को मान्यता देना घरेलू राजनीति में भारी विस्फोट पैदा कर सकता है.

यही वजह है कि इस्लामाबाद फिलहाल संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है. लेकिन ट्रंप की खुली अपील और आसिम मुनीर के नाम के सामने आने के बाद यह मुद्दा केवल विदेश नीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पाकिस्तान की सत्ता संरचना और उसकी वैचारिक राजनीति की सबसे बड़ी परीक्षा बन गया है.

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