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सिर्फ नाम के प्रधानमंत्री हैं शहबाज शरीफ, पाकिस्तान की कमान मुनीर के ही पास, ट्रंप ने कर दिया साबित

ट्रंप की पोस्ट ने पाकिस्तान की सत्ता संरचना पर सवाल खड़े कर दिए. क्या शहबाज शरीफ सिर्फ नाम के PM हैं और असली ताकत मुनीर के पास है?

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शायद अनजाने में ही सही सोशल मीडिया पर एक पोस्ट के जरिए पाकिस्तान के सबसे असहज सवाल का जवाब दे दिया. ईरान युद्ध खत्म होने के बाद मुस्लिम-बहुल देशों से अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होने का आग्रह करते हुए, उन्होंने उन नेताओं में पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर का नाम लिया, जिनसे उन्होंने बात की थी और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया; जिससे इस बात पर बहस फिर से छिड़ गई है कि इस्लामाबाद में असल सत्ता किसके हाथों में है?

दरअसल, सोमवार को अब्राहम अकॉर्ड्स के विस्तार के बारे में एक लंबी 'ट्रुथ सोशल' पोस्ट में, ट्रंप ने उन विश्व नेताओं की सूची दी जिनसे उन्होंने सप्ताहांत में बात की थी. लेकिन जब पाकिस्तान की बात आई, तो उन्होंने प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का ज़िक्र नहीं किया.

इस चूक को नजरअंदाज करना मुश्किल क्यों?

डोनाल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब के मोहम्मद बिन सलमान, UAE के मोहम्मद बिन ज़ायेद, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन और मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी का ज़िक्र उनके आधिकारिक राजकीय नेतृत्व की भूमिकाओं के साथ किया. लेकिन पाकिस्तान के चुने हुए प्रधानमंत्री इस सूची में कहीं भी नहीं थे.

यह संदेश किसी कूटनीतिक चूक से ज़्यादा, देश के भीतर की एक सच्चाई की पुष्टि जैसा लगा: कि पाकिस्तान की सैन्य संस्था (मिलिट्री एस्टैब्लिशमेंट) अपनी चुनी हुई सरकार की तुलना में कहीं ज़्यादा प्रभाव रखती है, खासकर विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में.

पाकिस्तान में सत्ता किसके हाथों में है?

ट्रंप की ये टिप्पणियाँ तब आईं जब वह कई मुस्लिम-बहुल देशों पर अब्राहम अकॉर्ड्स के तहत इज़रायल को औपचारिक रूप से मान्यता देने का दबाव बना रहे थे; इस समझौते की मध्यस्थता सबसे पहले उनके पिछले कार्यकाल के दौरान की गई थी. ईरान के साथ चल रही बातचीत से जुड़े एक बड़े क्षेत्रीय फेरबदल में संभावित प्रतिभागियों के तौर पर सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, मिस्र और तुर्की का ज़िक्र किया गया था.

लेकिन पाकिस्तान का इसमें शामिल होना इस्लामाबाद के लिए बहुत ज़्यादा जोखिम भरा है. UAE और बहरीन के विपरीत, पाकिस्तान ने कभी भी इज़रायल को मान्यता नहीं दी है, और पारंपरिक रूप से किसी भी कूटनीतिक संबंध को एक स्वतंत्र फ़िलिस्तीनी राष्ट्र के निर्माण से जोड़ा है. यही कारण है कि ट्रंप के प्रस्ताव ने इस्लामाबाद को एक बेहद असहज स्थिति में डाल दिया है.

फ़िलिस्तीनी राष्ट्र के दर्जे पर कोई बड़ी प्रगति हुए बिना इज़रायल को औपचारिक रूप से मान्यता देने से पाकिस्तान के भीतर ज़बरदस्त विरोध और राजनीतिक अस्थिरता पैदा हो सकती है. चुनी हुई सरकार के लिए, यह राजनीतिक रूप से विनाशकारी साबित हो सकता है. सेना के लिए, यह सत्ता पर फिर से कब्ज़ा करने के दरवाज़े खोल सकता है.

ट्रंप की कॉल पर चुप्पी ने बहुत कुछ कह दिया

Axios की एक रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप ने सप्ताहांत में पाकिस्तान और कई अरब नेताओं के साथ हुई एक उच्च-स्तरीय कॉन्फ्रेंस कॉल के दौरान यह विचार रखा. रिपोर्ट के मुताबिक, इस पर प्रतिक्रिया के तौर पर सिर्फ़ चुप्पी छाई रही. Axios ने बताया कि अब्राहम समझौते के तहत इज़रायल को व्यापक मान्यता देने का प्रस्ताव रखने के बाद, ट्रंप ने मज़ाक में पूछा कि क्या कॉल में शामिल लोग अभी भी लाइन पर हैं.

पाकिस्तान के लिए यह एक अजीब पल था. इस्लामाबाद ने खुद को ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थ के तौर पर पेश करने की कोशिश की है, जबकि साथ ही खाड़ी देशों और चीन के साथ भी अपने करीबी रिश्ते बनाए रखे हैं.

इसके साथ ही, अफ़गानिस्तान से अमेरिका के हटने के बाद, अमेरिका और पाकिस्तान के रिश्तों में आए कई सालों के तनाव के बाद, पाकिस्तान अब ट्रंप के साथ किसी बड़े टकराव का जोखिम नहीं उठा सकता- खासकर आर्थिक और कूटनीतिक मोर्चे पर. अगर ट्रंप पाकिस्तान पर इज़रायल के साथ रिश्ते सामान्य करने का दबाव डालना शुरू कर दें, तो यह संतुलन बनाना और भी मुश्किल हो जाएगा.

आसिम मुनीर का बढ़ता कद

शहबाज़ शरीफ़ के बजाय आसिम मुनीर का ज़िक्र करने के ट्रंप के फ़ैसले ने सेना प्रमुख के बढ़ते कद को भी उजागर किया. क्षेत्रीय संकटों के दौरान, खासकर ईरान, अफ़गानिस्तान और अमेरिका के साथ सहयोग से जुड़े मुद्दों पर, मुनीर पाकिस्तान के प्रमुख फ़ैसला लेने वाले व्यक्ति के तौर पर उभरकर सामने आए हैं.

कई रिपोर्टों का दावा है कि उन्होंने ट्रंप के करीबी लोगों तक सीधी पहुँच बना ली है. पिछले साल ट्रंप ने मुनीर के साथ एक बंद कमरे में बैठक की थी और उनकी तारीफ़ भी की थी. पाकिस्तान अब खुद को दो विरोधी वास्तविकताओं के बीच फंसा हुआ पा रहा है.

ट्रंप के अब्राहम समझौते के प्रस्ताव को बहुत सख्ती से ठुकराने पर, क्षेत्रीय अस्थिरता के इस दौर में वॉशिंगटन के साथ रिश्तों में तनाव आने का खतरा है. लेकिन इज़रायल को मान्यता देने की दिशा में ज़रा सा भी कदम बढ़ाने पर देश के भीतर भारी गुस्सा भड़क सकता है.

क्या है अब्राहम अकॉर्ड्स?

अब्राहम अकॉर्ड्स (Abraham Accords) अमेरिका की मध्यस्थता में 2020 में हुए ऐसे ऐतिहासिक समझौते हैं, जिनके तहत इज़राइल और कई अरब देशों ने आपसी रिश्तों को सामान्य बनाने पर सहमति जताई. सबसे पहले संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन ने इज़राइल के साथ समझौता किया, बाद में मोरक्को और सूडान भी इसमें शामिल हुए. इन समझौतों का नाम पैगंबर इब्राहिम पर रखा गया, जिन्हें यहूदी, ईसाई और इस्लाम में सम्मानित माना जाता है.

अब्राहम अकॉर्ड्स के तहत देशों ने राजनयिक संबंध स्थापित किए, दूतावास खोले, व्यापार, पर्यटन, तकनीक, रक्षा और निवेश में सहयोग बढ़ाया. अमेरिका ने इसे मध्य पूर्व में शांति और स्थिरता की दिशा में बड़ा कदम बताया. हालांकि, फिलिस्तीन मुद्दे को दरकिनार करने के आरोपों के कारण कई अरब संगठनों और नेताओं ने इसकी आलोचना भी की. इसके बावजूद, इस समझौते ने मध्य पूर्व की राजनीति और इज़राइल-अरब संबंधों में बड़ा बदलाव ला दिया.

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