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UP में गड़बड़ हुआ ‘सबका साथ’ का गणित? ब्राह्मणों की नाराज़गी, OBC में सेंध का डर; 2027 चुनाव से पहले BJP की असल अग्निपरीक्षा

यूपी की सियासत में ‘सबका साथ’ का गणित अब उलझता नजर आ रहा है. एक तरफ सवर्णों की नाराज़गी खुलकर सामने आ रही है, तो दूसरी ओर ओबीसी वोट बैंक में सेंध का डर बढ़ता जा रहा है. चुनाव से पहले बदलते जातीय समीकरणों ने बीजेपी के लिए सत्ता का रास्ता पहले से कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण बना दिया है.

BJP is facing major crisis in Uttar Pradesh before assemble elections 2027
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( Image Source:  AI GENERATED IMAGE- SORA )

UP News: उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले जातीय समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं. इंडिन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसे में बीजेपी एक जटिल स्थिति का सामना कर रही है. पार्टी को एक तरफ अपने पारंपरिक ऊंची जाति (सवर्ण) समर्थन आधार में बढ़ती नाराजगी का सामना करना पड़ रहा है, तो दूसरी ओर ओबीसी वोट बैंक में संभावित सेंध की चिंता भी सता रही है. इसके अलावा आंतरिक गुटबाजी और हाल में आए यूजीसी के नए नियमों को लेकर भी असहजता बढ़ी है.

यूजीसी के “उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने” वाले 2026 के नियमों का मकसद जाति आधारित भेदभाव रोकना है. लेकिन सवर्ण समुदाय के कई संगठनों ने इन नियमों की आलोचना की है. उनका आरोप है कि इनका दुरुपयोग कर सवर्णों के साथ भेदभाव किया जा सकता है, कुछ बीजेपी नेताओं ने भी खुलकर इसका विरोध किया. हालांकि सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद ये नियम फिलहाल रोक पर हैं.

क्या पार्टी के अंदर है नाराज़गी?

इन नियमों ने पार्टी के भीतर ब्राह्मण नेताओं की उस नाराजगी को भी उजागर किया है, जो बीजेपी के बढ़ते ओबीसी फोकस को लेकर पहले से मौजूद थी. इससे ब्राह्मण और ठाकुर समुदाय के बीच तनाव भी बढ़ा है, जो पिछली लोकसभा चुनाव से पहले ही दिखाई दिया था. यह स्थिति बीजेपी की ‘हिंदू एकजुटता’ की रणनीति के लिए चुनौती बन सकती है.

लोकसभा में कितना हुआ है नुकसान?

इस बीच समाजवादी पार्टी (एसपी) और उसके नेता अखिलेश यादव लगातार ओबीसी समुदाय में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं. एसपी अब सिर्फ यादव-मुस्लिम समीकरण से आगे बढ़कर पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) गठबंधन की रणनीति पर काम कर रही है. 2024 के लोकसभा चुनाव में इसका असर दिखा, जब एसपी को 37 सीटें मिलीं जबकि बीजेपी 33 सीटों पर सिमट गई थी.

समाजवादी पार्टी की कहां है सियासी नज़र?

29 मार्च को अखिलेश यादव दादरी में “समाजवादी समता भाईचारा रैली” को संबोधित करने वाले हैं. यहीं से उन्होंने 2012 का चुनाव अभियान शुरू किया था, जिसमें एसपी ने 403 में से 224 सीटें जीती थीं. इस बार उनकी नजर पश्चिम, मध्य और पूर्वी यूपी के गुर्जर, कुर्मी, सैनी और कुशवाहा वोटरों पर है.

अखिलेश ने बीजेपी सरकार पर ओबीसी के 27% आरक्षण को खत्म करने और पीडीए समुदाय की हजारों खाली पदों को न भरने का आरोप लगाया है. बीजेपी के कुछ नेताओं को डर है कि यूजीसी विवाद से एसपी को अपने आरोप मजबूत करने का मौका मिल सकता है.

ब्राह्मणों क्यों है बीजेपी से नाराज?

बीजेपी के कई सवर्ण सांसदों का कहना है कि यूजीसी नियमों ने उनके समुदाय का “भरोसा कमजोर” किया है. कई जिलों में पार्टी पदाधिकारियों ने इन नियमों को “काला कानून” बताते हुए इस्तीफा तक दे दिया. ब्राह्मण नेताओं की शिकायत है कि उनकी सामुदायिक बैठक पर आपत्ति जताई गई, जबकि ठाकुर और ओबीसी विधायकों की बैठकों पर कोई सवाल नहीं उठाया गया.

एक ब्राह्मण नेता ने इस स्थिति की तुलना कांग्रेस के “शाह बानो मामले” से की, जब राजीव गांधी सरकार ने 1985 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को कमजोर किया था. उनका कहना है कि जैसे उस फैसले ने राजनीतिक माहौल बदल दिया था, वैसे ही यह मुद्दा भी असर डाल सकता है.

कुछ नेताओं का कहना है कि सवर्णों में पहले से यह भावना है कि बीजेपी ओबीसी राजनीति को ज्यादा बढ़ावा दे रही है, जिससे नौकरियों और सत्ता में उनका हिस्सा कम हो रहा है. उनका आरोप है कि पहले एससी-एसटी कानूनों का दुरुपयोग हुआ और अब ओबीसी को भी इसमें शामिल कर लिया गया है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जातीय विभाजन से ऊपर उठकर व्यापक हिंदू एकता की बात की थी, लेकिन पार्टी के अंदरूनी नेताओं का कहना है कि समाज में खाई बढ़ती जा रही है। हालांकि ब्राह्मण समुदाय को राजनीतिक रूप से प्रभावशाली माना जाता है, लेकिन कुछ नेताओं का कहना है कि उनके पास विकल्प सीमित हैं. कांग्रेस अब निजी क्षेत्र में भी आरक्षण की बात कर रही है और एसपी ने अभी तक सवर्णों को लुभाने के लिए कोई बड़ा कदम नहीं उठाया है. फिर भी नाराजगी का असर मतदान प्रतिशत और माहौल पर पड़ सकता है.

क्या बीजेपी के घट रहे हैं आंकड़े?

आंकड़े बताते हैं कि यूपी में बीजेपी की सीटें लगातार कम हुई हैं. 2014 में पार्टी ने 71 लोकसभा सीटें जीती थीं, जो 2019 में 62 और 2024 में घटकर 33 रह गईं. 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 403 में से 312 सीटें मिली थीं, जबकि 2022 में यह संख्या 255 रह गई. रिपोर्ट के मुताबिक, 2019 से 2024 के बीच गैर-यादव, गैर-कुर्मी ओबीसी और गैर-जाटव दलित समुदायों में भी बीजेपी का समर्थन घटा है. औसत जीत का अंतर भी कम हुआ है.

2024 के कमजोर प्रदर्शन के बाद पार्टी की समीक्षा में आंतरिक खींचतान को कारण बताया गया. कहा गया कि ब्राह्मण वर्ग योगी आदित्यनाथ सरकार से असंतुष्ट है. वहीं लोकसभा चुनाव से पहले ठाकुर समुदाय में भी उम्मीदवारों के चयन को लेकर नाराजगी की खबरें सामने आई थीं, खासकर पश्चिमी यूपी में. इन सब परिस्थितियों के बीच बीजेपी को अपने पारंपरिक सवर्ण आधार और ओबीसी समर्थन के बीच संतुलन साधने की बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है.

UP NEWSयोगी आदित्‍यनाथअखिलेश यादव
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