Bengal के बाद Punjab Next? BJP की नई सियासी बिसात से क्यों बढ़ी कांग्रेस की बेचैनी
बंगाल के बाद अब पंजाब में BJP की सक्रियता और नए राजनीतिक समीकरणों ने कांग्रेस की चिंता बढ़ा दी है. संगठन और नेतृत्व बदलाव पर सियासत तेज है.
बंगाल में लंबे समय तक आक्रामक राजनीतिक प्रयासों के बाद सरकार बनाने में सफल रही बीजेपी की नजर अब पंजाब पर दिखाई दे रही है. यही कारण है कि कांग्रेस ने भी पंजाब में अपनी राजनीतिक तैयारी समय से पहले शुरू कर दी है. पार्टी के भीतर यह चिंता बढ़ रही है कि यदि भाजपा ने पंजाब में अपनी नई हिंदू राष्ट्रवादी positioning को मजबूत कर लिया, तो कांग्रेस का पारंपरिक राजनीतिक स्पेस उत्तर भारत में और सिकुड़ सकता है.
ऐसा इसलिए कि पंजाब में कांग्रेस सरकार बनाती रही है, 2027 के चुनाव में पार्टी हारी तो उसका वजूद यूपी, जम्मू कश्मीर, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान जैसे उत्तर भारतीय राज्यों में सिर्फ मौजूदी भर की ही होगी. क्योंकि इन राज्यों में वर्तमान में कहीं भी कांग्रेस की सरकार नहीं है.
दरअसल, पंजाब की राजनीति लंबे समय तक भाजपा ने ध्यान नहीं दिया. भाजपा, शिरोमणि अकाली दल के सहयोगी के रूप में सीमित शहरी हिंदू वोट बैंक पर निर्भर रहती थी. लेकिन किसान आंदोलन के बाद अकाली दल और भाजपा का गठबंधन टूट गया. इसके बाद भाजपा ने पहली बार पंजाब में स्वतंत्र राजनीतिक विस्तार की रणनीति पर गंभीरता से काम शुरू किया.
इसलिए बढ़ गई कांग्रेस की चिंता
भाजपा अब पंजाब में केवल हिंदुत्व की पारंपरिक राजनीति नहीं कर रही, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, सीमा राज्य, ड्रग्स, खालिस्तान समर्थक गतिविधियों और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों को जोड़कर एक नया narrative बनाने की कोशिश कर रही है. पार्टी पंजाब को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से सीमावर्ती राज्य के रूप में पेश करती आई है. इससे भाजपा शहरी हिंदू वोट के साथ-साथ राष्ट्रवादी सिख मतदाताओं के एक हिस्से तक पहुंच बनाना चाहती है.
बीजेपी का नैरेटिव क्या?
कांग्रेस को डर है कि यह वही मॉडल है, जिसकी शुरुआती झलक बंगाल में दिखाई दी थी. बंगाल में भाजपा ने शुरुआत में खुद को बाहरी पार्टी की छवि से निकालकर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद प्लस राजनीतिक असुरक्षा के narrative से स्थापित किया. धीरे-धीरे उसने विपक्ष की मुख्य धुरी बनने तक का सफर तय किया. कांग्रेस को आशंका है कि पंजाब में भी भाजपा इसी तरह पहचान, सुरक्षा और राष्ट्रवाद के कॉकटेल पर राजनीति खड़ी करने की कोशिश कर सकती है.
इसके अलावा, बीजेपी पंजाब में “ड्रग्स और गैंगस्टर नेटवर्क” को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी में दिख रही है. अमित शाह और बीजेपी के नेता लगातार पंजाब की कानून व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं. पार्टी यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि AAP सरकार प्रशासनिक नियंत्रण खो रही है. कांग्रेस को डर है कि यदि anti-incumbency बढ़ती है और भाजपा कानून व्यवस्था का नैरेटिव सफलतापूर्वक स्थापित कर देती है, तो उसका सीधा नुकसान कांग्रेस को भी हो सकता है.
नए चेहरे को आगे लाने की रणनीति
एक और बड़ा कारण पंजाब कांग्रेस की आंतरिक स्थिति है. राज्य में कांग्रेस अभी भी गुटबाजी से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाई है. अमरिंदर सिंह के जाने के बाद पार्टी में कई power centres बन गए. प्रताप सिंह बाजवा, अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग, चरणजीत सिंह चन्नी और दूसरे नेताओं के बीच नेतृत्व संतुलन लगातार चुनौती बना हुआ है. कांग्रेस नेतृत्व को लगता है कि यदि संगठन मजबूत नहीं हुआ, तो भाजपा छोटे-छोटे सामाजिक और क्षेत्रीय समूहों में अपनी पैठ बना सकती है.
भाजपा की रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सिख चेहरों को आगे लाना भी है. पार्टी यह समझती है कि केवल हिंदू ध्रुवीकरण के आधार पर पंजाब में बड़ी सफलता मिलना मुश्किल है. इसलिए वह राष्ट्रवादी सिख नेतृत्व, पूर्व अफसरशाही, डेरा नेटवर्क और शहरी मध्यवर्ग को जोड़ने की कोशिश कर रही है. कांग्रेस को यह भी चिंता है कि भाजपा पंजाब में “moderate Sikh nationalism” की नई राजनीतिक भाषा गढ़ने का प्रयास कर सकती है.
कांग्रेस के लिए पंजाब चुनाव प्रतिष्ठा का सवाल क्यों?
राजनीतिक रूप से कांग्रेस पंजाब को उत्तर भारत में अपने आखिरी बड़े मजबूत राज्यों में से एक मानती है. हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और बिहार में पार्टी पहले ही कमजोर स्थिति में है. ऐसे में यदि पंजाब में भी भाजपा विपक्ष की मुख्य दावेदार बनती है, तो कांग्रेस का उत्तर भारत में नए सिरे से उभर पाना और कठिन हो जाएगा.
यही वजह है कि कांग्रेस ने अभी से पंजाब में कैंडिडेट सर्वे, यूथ लीडरशिप प्रमोशन और संगठनात्मक पुनर्गठन पर काम शुरू कर दिया है. पार्टी समझती है कि पंजाब का चुनाव केवल एक राज्य का चुनाव नहीं होगा, बल्कि यह तय करेगा कि उत्तर भारत की विपक्षी राजनीति में कांग्रेस अपनी केंद्रीय भूमिका बचा पाती है या नहीं.




