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4 साल पहले कांग्रेस से आए केवल सिंह ढिल्लों को BJP ने बनाया प्रदेश अध्यक्ष, चुनाव से कुछ महीने पहले कैसे दी इतनी बड़ी जिम्मेदारी?

4 साल पहले कांग्रेस से BJP में आए केवल सिंह ढिल्लों को पंजाब अध्यक्ष बनाकर पार्टी ने चुनाव से पहले सिख, किसान और मालवा राजनीति पर बड़ा दांव खेला.

4 साल पहले कांग्रेस से आए केवल सिंह ढिल्लों को BJP ने बनाया प्रदेश अध्यक्ष, चुनाव से कुछ महीने पहले कैसे दी इतनी बड़ी जिम्मेदारी?
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( Image Source:  kewal singh dhillon facebook )

पंजाब की राजनीति में BJP ने इस बार बड़े चेहरे को छोड़ जमीनी नेता पर बड़ा दांव खेल दिया है. इस रणनीति के तहत पार्टी ने Kewal Singh Dhillon को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया है. खास बात यह है कि ढिल्लों करीब चार साल पहले ही कांग्रेस छोड़कर BJP में आए थे, लेकिन विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले पार्टी ने उन्हें राज्य की सबसे बड़ी संगठनात्मक जिम्मेदारी सौंप दी. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर BJP ने इतना बड़ा फैसला क्यों लिया और केवल सिंह ढिल्लों का राजनीतिक सफर कैसा रहा है.

कौन हैं केवल सिंह ढिल्लो?

केवल सिंह ढिल्लो पंजाब के मालवा क्षेत्र के बड़े जाट सिख नेताओं में गिने जाते हैं. उनका राजनीतिक आधार बरनाला और आसपास के इलाकों में माना जाता है. लंबे समय तक वे कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय रहे और पार्टी संगठन से लेकर चुनावी राजनीति तक मजबूत पकड़ बनाए रखी.

केवल सिंह ढिल्लो की पहचान ऐसे नेता की रही है जो ग्रामीण पंजाब, किसान समुदाय और सहकारी राजनीति में प्रभाव रखते हैं. पंजाब कांग्रेस में कैप्टन अमरिंदर सिंह दौर में भी वे सक्रिय चेहरों में शामिल रहे. हालांकि, बाद में कांग्रेस के अंदरूनी बदलाव और नेतृत्व संकट के बीच उन्होंने पार्टी से दूरी बना ली.

कांग्रेस से BJP तक का सफर

केवल सिंह ढिल्लो ने साल 2022 में केवल सिंह ढिल्लों ने कांग्रेस छोड़कर BJP का दामन थाम लिया था. उस समय पंजाब में कांग्रेस अंदरूनी कलह से जूझ रही थी और कैप्टन अमरिंदर सिंह के इस्तीफे के बाद कई नेता असहज महसूस कर रहे थे.

मालवा क्षेत्र के जमीनी नेता ढिल्लो का BJP में जाना इसलिए भी अहम माना गया क्योंकि उस दौर में कृषि कानूनों को लेकर पंजाब में BJP की छवि काफी कमजोर हो चुकी थी. ऐसे समय में किसी बड़े सिख और किसान पृष्ठभूमि वाले नेता का पार्टी में शामिल होना BJP के लिए राजनीतिक संदेश था.

BJP ने उन्हें संगठन और किसान समाज के बीच संवाद बढ़ाने की जिम्मेदारियों में भी आगे रखा. पार्टी लगातार उन्हें मालवा बेल्ट में सक्रिय करती रही, जो पंजाब की राजनीति का सबसे निर्णायक क्षेत्र माना जाता है.

BJP ने इतनी बड़ी जिम्मेदारी क्यों दी?

पंजाब में BJP लंबे समय से शहरी हिंदू वोट तक सीमित मानी जाती रही है. पार्टी अब खुद को “पंजाब की ऑल-कम्युनिटी पार्टी” के रूप में पेश करना चाहती है. केवल सिंह ढिल्लो जैसे जाट सिख चेहरे को आगे कर BJP यह संदेश देना चाहती है कि पार्टी सिख नेतृत्व को भी शीर्ष भूमिका देने को तैयार है.

पंजाब की राजनीति में मालवा क्षेत्र सबसे ज्यादा सीटों वाला इलाका है. कांग्रेस, AAP और अकाली दल की असली लड़ाई भी यहीं केंद्रित रहती है. ढिल्लों का प्रभाव इसी क्षेत्र में माना जाता है, इसलिए BJP उन्हें चुनावी रणनीति का अहम चेहरा बना रही है.

BJP समझती है कि अकेले पारंपरिक वोट बैंक के भरोसे पंजाब में विस्तार संभव नहीं है. ढिल्लो कांग्रेस की पृष्ठभूमि से आते हैं और सिख ग्रामीण राजनीति की समझ रखते हैं. पार्टी को उम्मीद है कि वे कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल दोनों के पारंपरिक वोटरों में असर डाल सकते हैं.

चुनाव से पहले BJP ऐसे नेता को आगे लाना चाहती थी जो सिर्फ संगठनात्मक चेहरा न होकर मैदान में भी सक्रिय हो. ढिल्लों को “ग्राउंड कनेक्ट” वाला नेता माना जाता है. यही वजह है कि पार्टी ने चुनावी तैयारी के अहम समय में उन पर भरोसा जताया.

BJP का बड़ा राजनीतिक संदेश

केवल सिंह ढिल्लो को प्रदेश अध्यक्ष बनाना सिर्फ संगठनात्मक बदलाव नहीं, बल्कि पंजाब की राजनीति के लिए BJP की नई रणनीति का संकेत माना जा रहा है. पार्टी अब हिंदुत्व के साथ-साथ सिख प्रतिनिधित्व, किसान राजनीति और क्षेत्रीय संतुलन को भी साधने की कोशिश कर रही है.

आने वाले विधानसभा चुनाव में यह फैसला कितना असर डालता है, यह तो चुनावी नतीजे बताएंगे, लेकिन इतना तय है कि BJP ने पंजाब में अपनी राजनीति को नए ढंग से पेश करने की शुरुआत कर दी है.

मालवा में किसका प्रभाव ज्यादा?

पंजाब विधानसभा की कुल 117 सीटों में 69 सीटें के मालवा क्षेत्र में आती हैं. इस क्षेत्र में लुधियाना, बठिंडा, पटियाला, संगरूर, मोगा, फाजिल्का, फिरोजपुर, मुक्तसर, फरीदकोट, मानसा, बरनाला, मलेरकोटला, फतेहगढ़ साहिब, रूपनगर और साहिबजादा अजीत सिंह नगर (मोहाली) सहित 15 जिले आते हैं.

मालवा बेल्ट में जट सिख (Jat Sikh) समुदाय का राजनीतिक और आर्थिक रूप से सबसे अधिक दबदबा है. इसके अलावा, ग्रामीण और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था होने के कारण यहां दलित आबादी और किसान यूनियनों का भी चुनावों में बहुत बड़ा असर रहता है. पंजाब की राजनीति का केंद्र माने जाने वाले मालवा में, अधिकांश मुख्यमंत्री इसी क्षेत्र से चुने जाते हैं.

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