बंगाल में Ideology, कर्नाटक में सत्ता… अब पंजाब में अस्तित्व की लड़ाई, Congress का अर्ली वॉर प्लान क्या?
बंगाल में विचारधारा और कर्नाटक में सत्ता संघर्ष के बाद कांग्रेस अब पंजाब में अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रही है. पार्टी ने अर्ली वार प्लान तैयार किया.
कांग्रेस इस समय अलग-अलग राज्यों में अलग तरह की राजनीतिक चुनौतियों से जूझ रही है. पश्चिम बंगाल में पार्टी की लड़ाई वैचारिक जमीन बचाने की थी, जो नहीं बची. कर्नाटक में सत्ता संतुलन और नेतृत्व परिवर्तन सबसे बड़ा सवाल बना हुआ था, जो लगभग सुलझ चुका है. वहीं पंजाब में मामला कांग्रेस की राजनीतिक पहचान और अस्तित्व से जुड़ गया है. पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 अब दूर नहीं है, लेकिन कांग्रेस ने संकेत दे दिए हैं कि वह इस चुनाव को “अर्ली वार” की तरह लड़ने की तैयारी कर रही है. ऐसा होना भी स्वाभाविक है, क्योंकि पंजाब में हार का मतलब उत्तर भारत की राजनीति में कांग्रेस की स्थिति और कमजोर होना माना जाएगा. यही वजह है कि दिल्ली में लगातार बैठकों, संगठनात्मक समीक्षाओं और नेतृत्व स्तर पर सक्रियता बढ़ाई जा रही है.
कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती क्या?
दरअसल, पंजाब कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या भाजपा या आम आदमी पार्टी से पहले उसकी अपनी अंदरूनी गुटबाजी रही है. प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग, नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा, पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी और नवजोत सिंह सिद्धू जैसे नेताओं के अलग-अलग शक्ति केंद्र लंबे समय से पार्टी को कमजोर करते रहे हैं. इसी कारण कांग्रेस हाईकमान अब 2027 से पहले “वन लाइन कमांड” मॉडल पर काम करना चाहता है. राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और केसी वेणुगोपाल कई दौर की बातचीत पंजाब नेताओं के साथ कर चुके हैं.
कांग्रेस संगठनात्मक रीसेट क्यों कर रही है?
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक दिल्ली में हो रही बैठकों का फोकस सिर्फ चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि संगठनात्मक रीसेट भी है. कांग्रेस नेतृत्व समझ चुका है कि यदि पंजाब में दोबारा मुख्य मुकाबले में लौटना है, तो पहले अंदरूनी संघर्ष खत्म करना होगा. इसी वजह से हाईकमान सार्वजनिक बयानबाजी और आपसी हमलों को लेकर सख्त संदेश दे चुका है. राहुल गांधी ने भी स्पष्ट संकेत दिए हैं कि 2027 से पहले अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं होगी.
पंजाब में कांग्रेस की चिंता क्यों बढ़ रही है?
पंजाब की राजनीति तेजी से बहुकोणीय हो चुकी है. आम आदमी पार्टी सत्ता में है, भाजपा सिख चेहरा आगे कर नई सामाजिक रणनीति बना रही है, जबकि शिरोमणि अकाली दल भी ग्रामीण और पंथक राजनीति में वापसी की कोशिश कर रहा है. भाजपा द्वारा केवल सिंह ढिल्लों को पंजाब अध्यक्ष बनाना इसी सामाजिक समीकरण का हिस्सा माना जा रहा है. दूसरी ओर, AAP के कई नेताओं और राज्यसभा सांसदों को भाजपा से जोड़कर देखा जा रहा है, जबकि राघव चड्ढा को आगे बढ़ाना भी पंजाब में नई राजनीतिक रणनीति का संकेत माना जा रहा है.
कांग्रेस की रणनीति क्या?
कांग्रेस की रणनीति तीन स्तरों पर बनती दिख रही है. पहला, किसान और ग्रामीण पंजाब में अपनी पुरानी पकड़ मजबूत करना. दूसरा, दलित-सिख और हिंदू वोटों के बीच नया सामाजिक संतुलन बनाना. तीसरा, आम आदमी पार्टी के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी को समय रहते संगठित करना. राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे की बरनाला रैली को भी इसी अभियान की शुरुआत माना गया, जहां किसान-मजदूर राजनीति को फिर से सक्रिय करने की कोशिश हुई.
किन मुद्दों पर चुनाव लड़ने की तैयारी?
कांग्रेस समझ रही है कि पंजाब का चुनाव सिर्फ स्थानीय समीकरणों से नहीं जीता जाएगा. बेरोजगारी, नशा, कृषि संकट, केंद्र-राज्य संबंध और सिख पहचान जैसे मुद्दे 2027 में निर्णायक हो सकते हैं. पार्टी वैचारिक नैरेटिव और सामाजिक असंतोष को राजनीतिक ऊर्जा में बदलने की तैयारी कर रही है. बंगाल में जहां कांग्रेस अपनी वैचारिक जमीन खो चुकी है, वहीं पंजाब में उसे लगता है कि उसके पास अभी भी जमीन और चेहरे दोनों मौजूद हैं.
कर्नाटक मॉडल का पंजाब पर कितना असर?
कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन और गुटीय संतुलन को लेकर जिस तरह हाईकमान ने हस्तक्षेप किया, उससे साफ संकेत है कि कांग्रेस अब “हाई कमांड कंट्रोल मॉडल” की ओर लौट रही है. सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच संतुलन साधने की कोशिशों के समानांतर पंजाब में भी नेतृत्व विवाद को समय रहते नियंत्रित करने की कवायद चल रही है.
कांग्रेस का अर्ली वॉर प्लान क्या?
पंजाब में कांग्रेस ने 2027 विधानसभा चुनाव के लिए अपना ‘अर्ली वॉर प्लान’ तैयार कर लिया है. पार्टी इस बार किसी एक चेहरे पर दांव लगाने के बजाय ‘सामूहिक नेतृत्व’ के फॉर्मूले पर काम कर रही है. कांग्रेस का मानना है कि इससे गुटबाजी कम होगी और प्रताप सिंह बाजवा, अमरिंदर सिंह राजा वडिंग और चरणजीत सिंह चन्नी जैसे सभी बड़े नेता एकजुट होकर चुनावी लड़ाई लड़ेंगे.
पार्टी युवा और नए चेहरों पर भी बड़ा दांव खेलने की तैयारी में है. कांग्रेस 2027 में करीब 60 से 70 प्रतिशत नए उम्मीदवारों को मैदान में उतार सकती है. इसके पीछे रणनीति यह है कि जनता के बीच पुराने नेताओं को लेकर बनी नाराजगी को नए और युवा चेहरों के जरिए कम किया जाए.
टिकट वितरण को लेकर भी कांग्रेस ने डेटा-आधारित रणनीति अपनाई है. पार्टी ने सभी 117 विधानसभा क्षेत्रों में ‘हिडन ऑब्जर्वर’ तैनात किए हैं, जो जमीनी रिपोर्ट सीधे आलाकमान तक पहुंचा रहे हैं. इसके अलावा बाहरी एजेंसियों से भी सर्वे करवाए जा रहे हैं ताकि टिकट सिर्फ जीत की संभावना के आधार पर दिए जाएं.
कांग्रेस आम आदमी पार्टी को कानून-व्यवस्था, नशे और प्रशासनिक अस्थिरता के मुद्दे पर घेरने की तैयारी में है. वहीं बीजेपी के बढ़ते प्रभाव के बीच पार्टी खुद को पंजाब की सबसे मजबूत धर्मनिरपेक्ष ताकत के रूप में पेश करना चाहती है. ओबीसी और महिला मतदाताओं को साधने के लिए भी कांग्रेस अलग अभियान चला रही है. कुल मिलाकर, कांग्रेस 2027 को पंजाब में अपनी राजनीतिक वापसी का सबसे बड़ा मौका मानकर चल रही है.




