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24 साल की हुई दिल्ली मेट्रो, सिस्टम हुआ हाईटैक-नेटवर्क से लेकर बजट बमबम, फिर ‘फील गुड’ क्यों नहीं?

साल 2002 में शुरू हुई दिल्ली मेट्रो आज 395 किलोमीटर नेटवर्क और रोजाना 60-70 लाख यात्रियों के साथ NCR की लाइफलाइन बन चुकी है. फिर भी भीड़, सफाई, सुरक्षा जांच और यात्रा अनुभव के कारण कई यात्रियों को अब भी “गुड फील” नहीं होता.

Delhi Metro 24 years DMRC
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दिल्ली की तेज रफ्तार जिंदगी में दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (Delhi Metro Rail Corporation) की मेट्रो अब सिर्फ सार्वजनिक परिवहन सेवा नहीं, बल्कि लाखों लोगों की रोजमर्रा की जरूरत बन चुकी है. 2002 में शुरू हुई यह व्यवस्था आज सैकड़ों किलोमीटर के नेटवर्क और करोड़ों यात्रियों के भरोसे के साथ राजधानी और एनसीआर की लाइफलाइन बन गई है. तकनीक, विस्तार और सुविधाओं के मामले में दिल्ली मेट्रो को दुनिया की बेहतर मेट्रो सेवाओं में गिना जाता है, लेकिन इसके बावजूद कई यात्रियों के मन में सवाल उठता है, इतनी सुविधाओं के बाद भी मेट्रो यात्रा का अनुभव हमेशा “गुड फील” क्यों नहीं देता? भीड़, सफाई, सुरक्षा जांच और रोजमर्रा के अनुभव जैसे मुद्दे इस बहस को लगातार जीवित रखते हैं.

1. 2002 से शुरू हुई दिल्ली मेट्रो, कैसे बनी NCR की लाइफलाइन?

दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन द्वारा संचालित दिल्ली मेट्रो ने 24 दिसंबर 2002 को अपना पहला कॉरिडोर शुरू किया था. शुरुआती सेक्शन ने राजधानी में सार्वजनिक परिवहन का नया मॉडल पेश किया. ट्रैफिक, प्रदूषण और लंबी यात्रा के बीच यह तेज और भरोसेमंद विकल्प बनकर उभरी. दो दशकों में मेट्रो ने सिर्फ दिल्ली ही नहीं बल्कि पूरे NCR के आवागमन की तस्वीर बदल दी. आज लाखों लोग रोजाना ऑफिस, कॉलेज और कारोबार के लिए इसी पर निर्भर हैं.

2. 12 लाइनों और 395KM नेटवर्क तक कैसे पहुंची मेट्रो?

आज दिल्ली मेट्रो करीब 12 लाइनों और लगभग 395 किलोमीटर नेटवर्क के साथ दुनिया के बड़े मेट्रो सिस्टम में शामिल है. इसमें करीब 289 स्टेशन हैं जो दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद, फरीदाबाद और गुरुग्राम में फैले हैं. दिल्ली में इस समय मेट्रो की 12 लाइनें हैं. प्रमुख लाइन्स में Yellow Line (समयपुर बादली – हुडा सिटी सेंटर) और Blue Line (द्वारका सेक्टर 21 – नोएडा सिटी सेंटर / नोएडा इलेक्ट्रॉनिक सिटी व वैशाली) है. इसके अलावा, Red, Green, Violet, Pink, Magenta, Grey, Airport Express, Rapid Metro (Gurgaon) हैं. यात्री संख्या के हिसाब से Yellow और Blue लाइन्स रोजाना करीब 25 से 30 लाख यात्री रोज सफर करते हैं. बाकी लाइन्स भी व्यस्त हैं, पर मुख्य यात्री भार इन्हीं दो लाइन्स पर केंद्रित रहता है. यात्रियों का भार Yellow और Blue लाइन्स और बाकी 50% यात्री अन्य लाइन्स परसफर करते हैं .

3. 24 साल में अधिकतम किराए में 8 गुने की बढोतरी क्यों?

डीएमआरसी की शुरुआत 24 दिसंबर 2002 को हुई थी. उस समय मेट्रो का न्यूनतम किराया 4 रुपये और अधिकतम किराया लगभग 8 रुपये रखा गया था. जैसे-जैसे नेटवर्क और संचालन लागत बढ़ी, किराए में भी समय-समय पर बदलाव किए गए. 2009 में पहली बार किराए में बड़ा संशोधन हुआ और अधिकतम किराया बढ़ाकर करीब 30 रुपये तक किया गया. इसके बाद 2017 में किराया दो चरणों में बढ़ाया गया, जिससे यात्रियों पर सबसे ज्यादा असर पड़ा. उस समय न्यूनतम किराया 10 रुपये से बढ़ाकर 20 रुपये कर दिया गया, जबकि अधिकतम किराया 50 रुपये से बढ़ाकर 60 रुपये तक पहुंच गया. 2025 में भी किराए में बढ़ोतरी हुई, जब अधिकतम किराया 63 रुपये कर दिया गया. वर्तमान में दिल्ली मेट्रो का किराया लगभग इसी संरचना पर आधारित है, जहां न्यूनतम किराया 10 रुपये (कुछ दूरी के लिए) और अधिकतम किराया 63 रुपये तक है. किराया बढ़ोतरी का मुख्य कारण संचालन खर्च, बिजली लागत, कर्मचारियों का वेतन और नेटवर्क विस्तार को बताया जाता रहा है. हालांकि, हर बढ़ोतरी के समय यात्रियों की ओर से विरोध और बहस भी देखने को मिली.

4. कब बने एक दिन में करीब 82 लाख लोगों के सफर का रिकॉर्ड?

दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन में यात्रियों की संख्या लगातार बढ़ती रही है और कई बार रिकॉर्ड भी बने हैं. अब यह दिल्ली-एनसीआर की सबसे व्यस्त सार्वजनिक परिवहन सेवा बन चुकी है.

दिल्ली मेट्रो में सबसे ज्यादा यात्रियों का रिकॉर्ड 8 अगस्त 2025 को बना, जब एक ही दिन में 81,87,674 यात्राओं का आंकड़ा दर्ज किया गया. यह रिकॉर्ड रक्षाबंधन से एक दिन पहले बना, जब त्योहार के कारण यात्रियों की संख्या अचानक बढ़ गई थी.

इससे पहले भी कई बार रिकॉर्ड बने हैं. 18 नवंबर 2024 को लगभग 78.67 लाख लोगों ने यात्राएं की. 20 अगस्त 2024 को लगभग 77.48 लाख लोगों ने एक दिन में मेट्रो सेवा का लाभ उठाया. इसी तरह 13 फरवरी 2024 को करीब 71 लाख लोगों ने मेट्रो में सफर का लाभ उठाया. आम दिनों में दिल्ली मेट्रो में प्रतिदिन लगभग 60 से 70 लाख लोग सफर करते हैं. ऑफिस टाइम (सुबह 8-11 बजे और शाम 5-9 बजे) में सबसे ज्यादा भीड़ होती है.

त्योहारों, सोमवार जैसे वर्किंग डे, बारिश या सड़क ट्रैफिक ज्यादा होने के समय भी मेट्रो में यात्रियों की संख्या बढ़ जाती है. यही वजह है कि कई बार मेट्रो में भीड़ इतनी बढ़ जाती है कि प्लेटफॉर्म और कोच दोनों जगह भारी दबाव दिखाई देता है.

5. स्मार्ट कार्ड से डिजिटल टिकट तक: तकनीक में कितना बदलाव आया?

पिछले 24 वर्षों में मेट्रो सिस्टम में कई तकनीकी और सुविधाजनक बदलाव हुए. टोकन से स्मार्ट कार्ड और डिजिटल टिकटिंग, सेल्फ टिकट वेंडिंग मशीन, मोबाइल ऐप और लाइव ट्रेन जानकारी, ऑटोमेटेड फेयर कलेक्शन, नए एस्केलेटर और लिफ्ट, डिजिटल स्क्रीन और रूट गाइडेंस आदि शामिल हैं. इन सुधारों का मकसद यात्रियों को तेज और सुविधाजनक यात्रा अनुभव देना था.

6. भीड़ क्यों बनी दिल्ली मेट्रो की सबसे बड़ी चुनौती?

मेट्रो की लोकप्रियता इतनी तेजी से बढ़ी कि कई लाइनों पर क्षमता से अधिक भीड़ होने लगी. खासकर पीक आवर्स में ट्रेनों और प्लेटफॉर्म पर भारी दबाव दिखाई देता है. शहर की तेज़ आबादी वृद्धि, सीमित वैकल्पिक सार्वजनिक परिवहन और लंबी दूरी की यात्रा ने मेट्रो पर निर्भरता और बढ़ा दी. यही वजह है कि कई यात्रियों को यात्रा आरामदायक नहीं लगती.

7. सफाई, स्टॉल और कचरे को लेकर क्यों उठते हैं सवाल?

मेट्रो स्टेशन और कोच में सफाई की जिम्मेदारी मुख्य रूप से DMRC और उसकी आउटसोर्स एजेंसियों के पास होती है, जबकि स्टेशन के बाहर की जिम्मेदारी नगर निगम की होती है. फिर भी कई जगह कचरा दिखने की शिकायतें आती हैं. इसका एक कारण स्टेशन पर मौजूद स्टॉल और खाने-पीने की वस्तुएं हैं, लेकिन बड़ा कारण यात्रियों का व्यवहार और निगरानी की कमी भी माना जाता है.

8. सुरक्षा जांच और CISF: यात्रियों का अनुभव कैसा?

मेट्रो की सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी सीआईएसएफ के पास है. सुरक्षा जांच सख्त होने के कारण कभी-कभी यात्रियों को लंबी कतारों या जांच प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है. कुछ यात्रियों को सुरक्षा कर्मियों का व्यवहार कठोर लगता है, जबकि सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि यह सख्ती यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है. इसी तरह एस्केलेटर और लिफ्ट ठीक होनें एक दो दिन नहीं बल्कि दो दो सप्ताह लग जाते हैं. टायलेट की साफ सफाई भी अब ठीक नहीं होती.

9. मेट्रो का बजट और कमाई का मॉडल

मेट्रो का संचालन सिर्फ टिकट किराए से नहीं चलता. हाल के वित्तीय आंकड़ों के अनुसार कुल वार्षिक राजस्व लगभग ₹4600 करोड़ है. ऑपरेटिंग खर्च करीब ₹4187 करोड़ है. करीब ₹412 करोड़ ऑपरेटिंग सरप्लस है. कमाई के मुख्य स्रोतों में टिकट/यात्री किराया लगभग 80 से 90 प्रतिशत, विज्ञापन, स्टेशन दुकानों का किराया, पार्किंग लगभग 10 से 20 प्रतिशत रेवेन्यू आता है. नॉन-फेयर रेवेन्यू के जरिए मेट्रो सिस्टम आर्थिक रूप से संतुलन बनाए रखने की कोशिश करता है.

10. नई मेट्रो लाइन बनाने का पैसा कहां से आता है?

मेट्रो का संचालन और निर्माण दो अलग वित्तीय मॉडल पर चलते हैं. नई लाइन बनाने के लिए आमतौर पर कई स्रोतों से फंड आता है. केंद्र सरकार – लगभग 20 से 25 प्रतिशत, राज्य सरकार – लगभग 20 से 25 प्रतिशत, विदेशी कर्ज (जैसे जापान की एजेंसियां) – लगभग 40 से 50 प्रतिशत. बाकी हिस्सा प्रॉपर्टी डेवलपमेंट और अन्य स्रोतों से आता है. इसलिए मेट्रो सिस्टम पूरी तरह किराए पर निर्भर नहीं रहता.

11. पब्लिक ट्रांसपोर्ट से रेवेन्यू मॉडल कैसे बना दिल्ली मेट्रो?

डीएमआरसी की शुरुआत 2002 में मुख्य रूप से एक सार्वजनिक परिवहन सेवा के रूप में हुई थी, जिसका उद्देश्य दिल्ली में ट्रैफिक और प्रदूषण कम करना था. शुरुआती वर्षों में मेट्रो की आय का लगभग पूरा हिस्सा यात्रियों के किराये यानी फेयर बॉक्स रेवेन्यू से आता था. लेकिन जैसे-जैसे नेटवर्क बढ़ा और संचालन खर्च (बिजली, रख-रखाव और कर्मचारियों का वेतन) बढ़ता गया, केवल टिकट से खर्च निकालना मुश्किल होने लगा.

इसी वजह से 2008-09 के बाद मेट्रो ने धीरे-धीरे नॉन-फेयर रेवेन्यू मॉडल अपनाना शुरू किया. इसके तहत स्टेशन परिसर में दुकानों और स्टॉल्स को किराये पर देना, ट्रेनों और स्टेशनों पर विज्ञापन लगाना, पार्किंग शुल्क और रियल एस्टेट डेवलपमेंट जैसे स्रोतों से कमाई बढ़ाई गई.

आज स्थिति यह है कि मेट्रो की कुल आय का लगभग 80–90 प्रतिशत हिस्सा टिकट से और 10–20 प्रतिशत हिस्सा विज्ञापन, दुकानों, पार्किंग और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों से आता है. इस मॉडल ने मेट्रो को केवल परिवहन सेवा नहीं बल्कि एक टिकाऊ शहरी रेवेन्यू सिस्टम में बदल दिया है.

12. दिल्ली मेट्रो में कब-कब सामने आए भ्रष्टाचार के मामले?

दिल्ली मेट्रो को आमतौर पर देश की सबसे व्यवस्थित सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था माना जाता है, फिर भी समय-समय पर इससे जुड़े कुछ भ्रष्टाचार और अनियमितता के मामले सामने आए हैं. इन मामलों में आमतौर पर ठेके, जमीन, या छोटे स्तर की रिश्वतखोरी से जुड़े आरोप शामिल रहे हैं. सबसे चर्चित मामलों में 2016 का रिश्वत मामला शामिल है. उस समय डीएमआरसी के एक मैनेजर को सीबीआई ने ने गिरफ्तार किया था. आरोप था कि बदरपुर मेट्रो स्टेशन पर दो दुकानों के अलॉटमेंट लेटर जारी करने के बदले उसने 20 हजार रुपये की रिश्वत मांगी थी और 10 हजार रुपये लेते हुए रंगे हाथ पकड़ा गया.

इसके अलावा, 2022 में ठेका घोटाले का मामला सामने आया. CBI ने दिल्ली मेट्रो के दो पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों (एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर और डिप्टी जनरल मैनेजर) के खिलाफ केस दर्ज किया. आरोप था कि फेज-3 प्रोजेक्ट में फाइबर ऑप्टिक ट्रांसमिशन सिस्टम का ठेका एक निजी कंपनी को देने में कथित रूप से अवैध लाभ और कमीशन लिया गया.

एक अन्य मामला मेट्रो और डीटीसी की जमीन से जुड़ी अनियमितता का भी सामने आया, जिसमें अधिकारियों पर सरकारी जमीन को निजी लोगों के नाम कराने और बेचने की साजिश का आरोप लगा. जांच एजेंसियों ने इस मामले में कुछ अधिकारियों को गिरफ्तार भी किया था.

13. लाइफलाइन के बाद भी “गुड फील” क्यों नहीं करा पाती DMRC?

दिल्ली मेट्रो तकनीकी रूप से आधुनिक और प्रभावी परिवहन व्यवस्था मानी जाती है, लेकिन रोजमर्रा के अनुभव में कई यात्रियों को कुछ समस्याएं महसूस होती हैं. मुख्य वजहें पीक आवर्स में भारी भीड़, कुछ स्टेशनों पर सफाई संबंधी शिकायतें, सुरक्षा जांच में लगने वाला समय, कभी-कभी लिफ्ट/एस्केलेटर खराब होना और. यही कारण है कि सुविधाओं के बावजूद कुछ यात्रियों को यात्रा अनुभव पूरी तरह संतोषजनक नहीं लगता.

14. सिस्टम सिर्फ DMRC का नहीं, यात्रियों का भी

दिल्ली मेट्रो एक जटिल सार्वजनिक व्यवस्था है, जिसमें कई एजेंसियां शामिल हैं. DMRC, CISF, नगर निगम और निजी एजेंसियां आदि, लेकिन इसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा यात्री भी हैं. सफाई बनाए रखना, नियमों का पालन करना और सार्वजनिक संपत्ति का सम्मान करना, मेट्रो अनुभव को बेहतर बनाने में अहम भूमिका निभाता है.

15. आखिर ‘गुड फील’ का मतलब क्या ?

यहां पर 'गुड फील' का मतलब मेट्रो की सेवा से सुकून फील होना है. यानी किसी सेवा का उपयोग करते समय व्यक्ति को यह महसूस होना कि व्यवस्था सुविधाजनक, सुरक्षित, पारदर्शी और सम्मानजनक लगे. सरकारी या सार्वजनिक सेवाओं के संदर्भ में “गुड फील” मोटो तौर पर बातों से जुड़ा

पहला, जब नागरिक को सेवा समय पर, व्यवस्थित और बिना अनावश्यक परेशानी के मिलती है. उदाहरण के लिए परिवहन, स्वास्थ्य या सरकारी दफ्तरों में कम इंतजार, साफ-सफाई और व्यवस्थित व्यवस्था.

दूसरा, प्रशासनिक तंत्र के कर्मचारियों का व्यवहार, सुरक्षा व्यवस्था, सूचना की उपलब्धता और शिकायतों का समाधान, ये सभी नागरिक के अनुभव को प्रभावित करते हैं. यदि व्यवस्था सख्त हो लेकिन व्यवहार सहयोगी हो, तो लोगों में सकारात्मक भावना बनती है.

तीसरा, जब नागरिक को लगता है कि व्यवस्था उनके हित में काम कर रही है, नियम समान रूप से लागू हो रहे हैं और समस्याओं का समाधान संभव है, तब प्रशासन के प्रति विश्वास और “गुड फील” पैदा होता है. यही वो सवाल है, जिसका जवाब मेट्रो के पास नहीं है. ऐसा इसलिए कि अधिकांश लोग मानते तो हैं कि मेट्रो का सफर अन्य पब्लिक ट्रांसपोर्ट से बहुत अच्छा है, लेकिन उन्हें इस बात का मलाल होता है कि इस सफर में सुकून नहीं है.

DELHI NEWSस्टेट मिरर स्पेशल
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