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‘12 साल लगातार हिरासत में रहना जमानत का आधार नहीं’, अर्जी खारिज; आतंकियों को हाईकोर्ट का कानूनी झटका!

दिल्ली हाईकोर्ट ने साफ कहा है कि सिर्फ लंबे समय तक जेल में रहना जमानत का आधार नहीं बन सकता. वो भी तब, जब जब मामला आतंकवाद और देशविरोधी गतिविधियों से जुड़ा हो. कोर्ट ने पाकिस्तान से जुड़े नेटवर्क और ठोस सबूतों का हवाला देते हुए दो आरोपियों की जमानत अर्जी खारिज कर दी.

Delhi High Court
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दिल्ली हाई कोर्ट
( Image Source:  ANI )
संजीव चौहान
By: संजीव चौहान6 Mins Read

Updated on: 2 May 2026 3:42 PM IST

“चूंकि हमें लगातार 12 साल से भी ज्यादा समय हिरासत में जेल के भीतर बंद हुए गुजर चुका है. इसलिए अब हाईकोर्ट हमें जमानत दे.” आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त और 12 साल से जेल में बंद दो आरोपियों की अर्जी रद्द करते हुए उच्च न्यायालय ने ऐसा फैसला दिया है, जो नजीर बन जाएगा. दिल्ली हाईकोर्ट ने जमानत अर्जी खारिज करते हुए फैसला सुनाया, “लगातार 12 साल या लंबे समय से या लंबे समय तक जेल में हिरासत में बंद रहने का मतलब यह नहीं है कि देश विरोधी और आतंकवादी गतिविधियों में शामिल लोगों को भी जमानत देना जरूरी है. वह भी तब जब आरोपियों के पुख्ता लिंक्स पाकिस्तान से मिल चुके हों.”

यह फैसला आतंकवाद और आतंवादियों से जुड़े मामलों की जांच करने वाली पुलिस और भारतीय की केंद्रीय जांच एजेंसी (NIA) के लिए आइंदा मील का पत्थर और मददगार साबित हो सकती है. दिल्ली उच्च न्यायालय की दो सदस्यीय खंडपीठ के इस फैसले ने लंबे समय से जेल में बंद उन आरोपियों की नींद उड़ा दी है, जो कई साल से लगातार जेल में विचाराधीन कैदी के रुप में बंद रहने के चलते जमानत पर जेल से बाहर आने को अपना कानूनी जन्मसिद्ध अधिकार या बपौती समझे बैठे थे.

किस मामले में सुनाया गया फैसला?

यह फैसला दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस मधु जैन और जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह की दो सदस्यीय खंडपीठ ने सुनाया है. फैसला मो. साकिब अंसारी बनाम स्टेट ऑफ दिल्ली व अन्य से संबंधित मामले में सुनाया गया है. मामले को सुन रही दो सदस्यीय बैंच ने इसी दलील के साथ मोहम्मद साकिब अंसारी और वकार अजहर को जमानत पर जेल से बाहर निकाले जाने की अर्जी भी खारिज कर दी.

खंडपीठ ने क्या कहा?

दिल्ली उच्च न्यायालय की दो सदस्यीय खंडपीठ ने मुकदमे के बारे में अदालत के सामने पेश दस्तावेजों में दर्ज सबूतों के आधार पर कहा, “खंडपीठ के सामने जमानत के लिए पेश आरोपियों ने न केवल भारत में, वरन् भारत से बाहर पाकिस्तान में भी इंडियन मुजाहिदीन जैसे खतरनाक आतंकवादी नेटवर्क को बढ़ाने में मदद की है. आरोपी, बम बनाने की ट्रेनिंग लेने-देने से लेकर देश विरोधी सामग्री (जिहादी सामग्री) को भी देश के अंदर प्रचारित-प्रसारित करने तक में शामिल रहे हैं.

आरोपियों के कब्जे से क्या-क्या मिला?

आरोपियों के कब्जे से विस्फोटक सामग्री, IED उपकरण, डेटोनेटर से लेकर हथियार और तमाम डिजिटल डिवाइसेस भी मिले थे. जोकि इनके भारत के खिलाफ षडयंत्र रचने, भारत में अस्थिरता फैलाने और शांति-सुरक्षा व भारत की संप्रभुता को चुनौती देने का मजबूत सबूत रहा है. इतना ही नहीं, जांच एजेंसी ने ऐसे सबूत भी अदालत में दाखिल किए हैं जो आरोपियों के लिंक्स पाकिस्तान से सीधे जुड़े होने की बात को साबित करने के लिए काफी हैं.”

कौन-सी बात चौंकाने वाली रही?

दिल्ली हाईकोर्ट के डबल बैंच के सामने जमानत अर्जी पर सुनवाई के दौरान यह भी देखने में आया कि आरोपियों ने सांकेतिक भाषा (कोडवर्ड) एन्क्रिप्टेड संचार का भी खूब इस्तेमाल किया था. यह सब भी भारत की अखंडता में सेंध लगाने के लिए ही आरोपियों द्वारा किया गया. यह कोडवर्ड वाली भाषा पाकिस्तान में मौजूद आतंकवादी संगठनों के आकाओं से बात करने के लिए तैयार की गई थी.

जांच एजेंसी ने क्या कहा?

आरोपियों की जमानत अर्जी का पुरजोर विरोध कर रही जांच एजेंसी ने कहा कि अगर ऐसे खतरनाक मंसूबों वाले संदिग्धों (संदिग्ध इसलिए क्योंकि दोनों ही अभी अदालत द्वारा दोषी ठहराकर मुजरिम साबित नहीं किए गए हैं) को हाईकोर्ट ने जमानत दे दी तो वे पहले से भी कहीं ज्यादा घातक साबित हो सकते हैं. संभव है कि जमानत पर जेल से बाहर आते ही वे गायब हो जाएं.

“लंबे समय तक लगातार हिरासत में रहना जमानत का आधार नहीं”

मामले की गहन पड़ताल के बाद दिल्ली उच्च न्यायालय की दो सदस्यीय खंडपीठ ने कहा, “केवल लंबे समय तक लगातार हिरासत में रहना किसी आरोपी या संदिग्ध को जमानत देने का आधार नहीं हो सकता है. खासकर उन मामलों में जिनमें आरोपी देशद्रोही गतिविधियों में जब संलिप्त मिले हों.”

हाईकोर्ट के इस अहम फैसले से भले ही भारत के खिलाफ आतंकवाद छेड़ने के आरोपियों को झटका लगा हो, मगर इस फैसले ने यह साबित भी कर दिया है कि जेल में लंबे समय से लगातार बंद रहने की दलील देकर हर किसी को भारत की अदालतें जमानत का कानूनी हकदार नहीं मान सकती हैं. दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला भारतीय जांच एजेंसियों की मदद में नजीर बन सकता है.

दंगों के आरोपियों की भी जमानत अर्जी हो चुकी है खारिज

यहां जिक्र करना जरूरी है कि साल 2020 में उत्तर पूर्वी दिल्ली से सीलमपुर जाफराबाद में हुए सांप्रदायिक दंगों के भी कई आरोपी लंबे समय से दिल्ली की जेलों में विचाराधीन कैदी के रूप में बंद रहे. जिन्होंने बीते 5 साल में जब जब जेल में लगातार हिरासत में बंद रहने की दलील देकर अपनी जमानत अर्जी दाखिल की, उनकी दलीलों को सिरे से अदालतों ने खारिज करके, जमानत देने से साफ इनकार कर दिया.

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