EXCLUSIVE: राघव चड्ढा BJP के किसी काम के नहीं, अगला नंबर मान और पंजाब का, क्या ‘प्रेसीडेंट रूल’ की है तैयारी?
पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा ने AAP और BJP के बीच चल रही राजनीतिक उठापटक पर खास बातचीत की है. उन्होंने केजरीवाल, राघव चड्ढा और पंजाब की राजनीति को लेकर कई अहम बातें कही.
‘भारत में किसी भी पॉलिटिकल पार्टी का पतन करके उसे निपटाना आसान नहीं होता है. जो लोग मान रहे हैं कि अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी (आप) दोनो को भारतीय जनता पार्टी ने एक साथ निपटा दिया है. ऐसा सोचने वाले एकदम गलत हैं. अभी सिर्फ अरविंद केजरीवाल निपटाए जा रहे हैं. उनकी आप पार्टी को निपटाना आसान नहीं होगा. कोई भी पार्टी खत्म करना मुश्किल है. हां, पार्टी के फ्रंट लाइन के लीडरों को निपटाना आसान है.
जहां तक सवाल आम आदमी पार्टी के राघव चड्ढा, मित्तल, गुप्ता या और कुछ नामों सहित 7 राज्यसभा सांसदों का भारतीय जनता पार्टी में जा बैठने का सवाल है. तो यह सब कोई बहुत बड़ी तोप नहीं है. इनके जाने से अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को नुकसान तो हुआ है. इन सातों के बीजेपी में दाखिल होने से भारतीय जनता पार्टी को कोई बहुत बड़ा निजी या राजनीतिक लाभ हाल-फिलहाल या फिर आइंदा भी नहीं मिलने वाला है. राघव चड्ढा का जहां तक सवाल है तो वह अभी भारतीय जनता पार्टी के घाघ प्राइम मिनिस्टर नरेंद्र मोदी व मास्टरमाइंड भाजपाई और प्रधानमंत्री मोदी के राइटहैंड विश्वासपात्र केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के लिए सिर्फ एक नौसिखिया पॉलिटिकल बच्चा भर है. जिसका (राघव चड्ढा) बीजेपी के इन मौजूदा नेता-मंत्रियों की नजर में कोई वजूद नहीं है.
“आप” में बेचैनी क्यों पनप रही
हां, यह जरूर है कि दिल्ली में भाजपा और आम आदमी पार्टी के बीच शुरु “आया राम-गया राम” की भगदड़ कहूं या घुड़दौड़ कहूं, के बीच आम आदमी पार्टी में तो बेचैनी पनपना लाजिमी है. इन सात राज्यसभा सांसदों के दल-बदलने के पीछे बीजेपी और आप पार्टी दोनो का ही नेतृत्व बराबर का साझीदार है. आप पार्टी की फ्रंट लाइन लीडरशिप ने जब ऐसा मौका दिया तो पहले से आप को तबाह करने की ताक में घात लगाए बैठे घाघ भाजपाई नेतृत्व ने उस मौके को ‘कैश’ कर लिया. इस दल-बदल का किसको क्या नफा-नुकसान होगा? इस सवाल का जवाब अभी तत्काल टटोलकर कोई टिप्पणीबाजी करना, मुझ जैसे शख्स के लिए हाल-फिलहाल शोभा नहीं देता है. क्योंकि राजनीति और जंग में हालात बेमौसम की सी बरसात की तरह हर कदम पर बदलते हैं.”
कौन हैं यशवंत सिन्हा?
यह तमाम बेबाक बातें बेखौफ होकर बयान की हैं भारत के पूर्व केंद्रीय विदेश और वित्त मंत्री व कालांतर में भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता यशवंत सिन्हा ने. केंद्र में अटल बिहारी बाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल की हुकूमत में भाजपा की फ्रंट लाइन के टॉप-5 नेताओं में शुमार और इन दिनों हजारीबाग (झारखंड) प्रवास पर मौजूद यशवंत सिन्हा, नई दिल्ली में मौजूद स्टेट मिरर हिंदी के एडिटर इनवेस्टीगेशन संजीव चौहान से, दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी और आम आदमी पार्टी के बीच चल रही राजनीतिक उठा-पटक पर एक्सक्लूसिव बात कर रहे थे. देश के वरिष्ठ और पूर्व ब्यूरोक्रेट से राजनेता बने यशवंत सिन्हा ने बातचीत के दौरान भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व और आम आदमी पार्टी व उसके प्रमुख अरविंद केजरीवाल की इन दिनों हो रही दुर्गति-दुर्दशा पर खुलकर बात की.
अरविंद केजरीवाल मिट रहे या “आप”
स्टेट मिरर हिंदी के एक सवाल के जवाब में पूर्व केंद्रीय विदेश मंत्री ने कहा, “नहीं ऐसा नहीं है. फिलहाल बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व अरविंद केजरीवाल को कमजोर करने का बिगुल बजा रहा है. जहां तक आम आदमी पार्टी के एक साथ 7 राज्यसभा सांसदों को बीजेपी में चले जाने का सवाल है, तो इससे सीधा असर अरविंद केजरीवाल पर तो तुरंत पड़ेगा. आम आदमी पार्टी हो या फिर भारत की आप जैसी कोई कोई अन्य राजनीतिक पार्टी. किसी भी पॉलिटिकल पार्टी को ज़मींदोज करना आसान नहीं होता है. किसी पार्टी को कमजोर तो किया जा सकता है. एकदम मगर किसी राजनीतिक पार्टी का अस्तित्व ही मिटा डालना किसी को आसान नहीं होता है.”
BJP ने ‘आप’ के ऊपर कैसे झपट्टा मारा?
बकौल पूर्व केंद्रीय वित्त और विदेश मंत्री सिन्हा, “अरविंद केजरीवाल चौतरफा घिरे पड़े हैं. इस वक्त केंद्र में भारतीय जनता पार्टी का पीएम मोदी और अमित शाह के जैसों का जो केंद्रीय नेतृत्व है वह देश की हर मजबूत या उभरती हुई राजनीतिक पार्टी को, और उसके टॉप फ्रंट लाइन लीडर्स को खत्म करने पर आमादा है. क्योंकि यही लोग बीजेपी को आने वाले निकट भविष्य में पॉलिटिकल जानलेवा खतरा बन सकते हैं. अरविंद केजरीवाल और उनकी आप पार्टी बीते कई साल से मोदी-शाह और संघ को आंख में करक रही थी.
अब यह कमजोरी आम आदमी पार्टी की भी रही कि वे खुद को मजबूती से एकजुट नहीं रख सके. नतीजा सामने है कि पहले से ही घात लगाए बैठी घाघ बीजेपी ने मौका हाथ आते ही ‘आप’ पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों के ऊपर धीरे से दबे पांव झपट्टा मारकर, उन्हें अपने पाले में खींच-घसीट लिया. अब इसे चाहे तो ‘आप’ पार्टी के अंदर मची आंतरिक घमासान की कमजोरी का आत्मघाती परिणाम समझ लीजिए. या फिर पहले से ही आप पार्टी और अरविंद केजरीवाल जैसों को तहस नहस करके खुद का पॉलिटिकल रास्ता साफ करने की जुगत में दिन-रात भिड़ी पड़ी भारतीय जनता पार्टी का किसी और की ‘आपदा’ को अपने ‘अवसर’ में बदलने की खतरनाक रणनीति समझ लीजिए.”
अन्ना के साथ क्या गद्दारी का फल है?
जब एक साथ 7 राज्यसभा सांसद आम आदमी पार्टी को दुत्कार भारतीय जनता पार्टी से जा मिले हैं, तो क्या माना जाए कि आप पार्टी और अरविंद केजरीवाल ने, साल 2012 में दिल्ली के रामलीला मैदान में अन्ना आंदोलन को कब्जाने के बाद जो दगाबाजी या वादा-खिलाफी अन्ना हजारे के साथ की थी, अब वही सब उसी झूठ-फरेब का हिसाब किताब केजरीवाल के सामने अपनी पार्टी को कमजोर होता देखने के रूप में मौजूद है? स्टेट मिरर हिंदी के सवाल के जवाब में भारत के पूर्व विदेश व वित्त मंत्री और किसी जमाने में भारतीय.
जनता पार्टी की ‘धुरी’ रहे यशवंत सिन्हा बोले, “नहीं ऐसा नहीं है. यह राजनीति है. जब जहां जिसका दांव लगता है वह दूसरे को नीचा दिखाने के लिए उसे पटकनी देने में नहीं शर्माता है. अरविंद केजरीवाल ने अन्ना आंदोलन में जो किया, वह दुनिया ने देखा. हां, अब बीजेपी आज जो आप पार्टी और उसके राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल के साथ जो कर रही है, देश की जनता वह भी देख रही है. अच्छे-बुरे का फल जमाने में सबके सामने सबका आता है. इसमें देर-सबेर हो सकती है अंधेर नहीं. राजनीति में देर तक कोई किसी का दोस्त या दुश्मन नहीं रहता है. अगर राजनीति में भी सकारात्म सरोकार की बातें शुरु हो जाएं तो फिर वह राजनीति ही क्या, रामराज्य हो जाएगा कलियुग में.”
चड्ढा बच्चा, मान पंजाब की क्यों सोचें
दिल्ली में मची राजनीति उठा-पटक का निकट भविष्य में सबसे ज्यादा असर किस पर होगा? पूछने पर यशवंत सिन्हा ने कहा, “चडढा, गुप्ता और मित्तल बीजेपी के लिए कोई मायने नहीं रखते हैं. राघव चड्ढा तो बीजेपी के लिए बच्चा हैं. असली खेल तो अब पंजाब में शुरु होगा. मुझे पूरा अंदेशा है कि हर हाल में हर राज्य को कब्जाने की बदनीयती का शिकार भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व अब अपने पंजे पंजाब के ऊपर गड़ाने का षडयंत्र रच रहा होगा. चड्ढा गुप्ता और मित्तल (आप पार्टी के वे सात राज्यसभा सांसद जो अपनी पार्टी से दगाबाजी करके बीजेपी में शामिल हुए हैं) की छोड़ो. पीएम नरेंद्र मोदी और उनके खास सिपहसलार अमित शाह अब पंजाब में आप पार्टी सरकार को तबाह करके उस पर काबिज होने की तैयारी में होंगे.
क्यों खतरे हैं पंजाब और भगवंत मान?
ऐसे में सबसे बड़ा राजनीतिक संकट पंजाब में मौजूदा आप पार्टी हुकूमत पर आना तय है. संभव है कि बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व पंजाब में पहले राष्ट्रपति शासन लगाए उसके बाद वहां आप पार्टी के तमाम विधायकों को बीजेपी में लेकर सरकार बनाने की कोशिश करे. अगर यह संभव नहीं हुआ तो मोदी और अमित शाह पंजाब में मध्यावधि चुनाव करवा कर वहां हर संभव अपनी हुकूमत काबिज (बीजेपी सरकार) करवाने के लिए साम-दाम-दंड-भेद पर उतरने से भी न शर्माएंगे. अगर ऐसा हुआ तो पंजाब से आम आदमी पार्टी का अस्तित्व तो मिटेगा ही. साथ ही वहां के मौजूदा मुख्यमंत्री भगवंत मान का पॉलिटिकल करियर भी तबाह होने की प्रबल संभावनाएं बनती मुझे नजर आ रही हैं.”
राघव को CM बनाना दूर की कौड़ी क्यों?
अचानक रातों-रात जिस तरह से सात सांसदों ने अरविंद केजरीवाल को हवा या भनक लगाए बिना आप पार्टी छोड़कर बीजेपी ज्वाइन की है, उसमें राघव चड्ढा आम आदमी पार्टी के मुख्य षडयंत्रकारी या भस्मासुर बनकर सामने आए हैं. मतलब, आप की ईंट से ईंट बजवाने में बीजेपी ने अरविंद केजरीवाल के कल तक मुंहलगे राघव चड्ढा का इस्तेमाल किया है. ऐसे में पंजाब में अगर भगवंत मान और आप पार्टी की मौजूदा राज्य सरकार को तबाह करके बीजेपी नई सरकार बनाने में कामयाब होती है, तो क्या राघव चड्ढा पंजाब के नए
मुख्यमंत्री (भाजपा की पंजाब सरकार में) होंगे?
स्टेट मिरर हिंदी के सवाल के जवाब में भारतीय जनता पार्टी के पूर्व कद्दावर नेता यशवंत सिन्हा ने कहा, “भूल जाइए ऐसी किसी संभावना को. यह आज की भारतीय जनता पार्टी है जिसे मोदी और अमित शाह हांक रहे हैं. अटल बिहारी बाजपेयी और मुरली मनोहर जोशी वाली यह भारतीय जनता पार्टी नहीं है. जहां वफादारी का तुरंत इनाम इकराम बांटा जाता था. राघव चड्ढा मोदी और शाह के लिए नौसिखिया बच्चा से ज्यादा कुछ नहीं है. अगर पंजाब में साम दाम दंड भेद अपना भगवंत मान की आप पार्टी वाली हुकूमत को बीजेपी उखाड़ फेंकने में कामयाब हुई तो, वहां बीजेपी का मुख्यमंत्री राघव चड्ढा की जगह कोई और ही बेहद तिकड़मी दिमाग या घाघ बुद्धि वाला होगा.”




