पाकिस्तान कैसे बना आतंक की फैक्ट्री, अमेरिका का ये फैसला है बड़ी वजह?
पाकिस्तान को लेकर अक्सर यह सवाल उठता है कि आखिर यह देश आतंकवाद का गढ़ कैसे बन गया.आचार्य प्रशान्त त्रिपाठी के अनुसार, इसकी जड़ें सोवियत संघ और अफगान वॉर से जुड़ी हैं, जब पाक-अफगान सीमा पर मदरसों में लड़ाकों को हिंसा की शिक्षा दी गई.
पाकिस्तान कैसे बना आतंक की फैक्ट्री
पाकिस्तान को आज आतंकिस्तान कहा जाता है. यह देश अपने सरजमीं पर आतंकियों को पनाह देता है, लेकिन यह मुल्क आतंक की फैक्ट्री कैसे बना यह बड़ा सवाल है. इसके पीछे कई ऐतिहासिक और राजनीतिक कारण जुड़े हुए हैं. खासतौर पर शीत युद्ध के दौर में लिए गए फैसलों ने इस पूरे क्षेत्र की दिशा बदल दी.
उस समय महाशक्तियों के बीच चल रही प्रतिस्पर्धा ने अफगानिस्तान को युद्ध का मैदान बना दिया, जिसका सीधा असर पाकिस्तान पर भी पड़ा. अफगान युद्ध के दौरान अमेरिका द्वारा कट्टरपंथी ताकतों को समर्थन देने की नीति ने हालात को और जटिल बना दिया. इस फैसले के कारण पाकिस्तान में ऐसे ढांचे खड़े हुए, जिन्होंने धीरे-धीरे आतंकवाद को बढ़ावा दिया.
सोवियत-अफगान युद्ध से शुरू हुई कहानी
आध्यात्मिक गुरू आचार्य प्रशांत ने एक वीडियो में बताया कि इस पूरी कहानी की शुरुआत सोवियत-अफगान युद्ध से होती है. सोवियत-अफ़ग़ान युद्ध एक ऐसा युद्ध था जो अफ़ग़ानिस्तान में करीब 10 साल तक चला. इसमें एक तरफ सोवियत संघ (रूस) की सेना थी, जो वहां की कम्युनिस्ट सरकार का समर्थन कर रही थी, और दूसरी तरफ मुजाहिदीन नाम के लड़ाके थे, जो उस सरकार को हटाना चाहते थे. मुजाहिदीन को अमेरिका और पाकिस्तान का समर्थन मिल रहा था, क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि अफ़ग़ानिस्तान पर सोवियत संघ का पूरा नियंत्रण हो जाए. इस खतरे को रोकने के लिए अमेरिका ने एक अलग रणनीति अपनाई.
अमेरिका ने कट्टरपंथ को दिया बढ़ावा
फिलॉसफर आचार्य प्रशांत के अनुसार, अमेरिका ने उस समय इस्लाम के कट्टर रूप को बढ़ावा दिया. इसके तहत दुनिया भर से कट्टरपंथी लड़ाकों को पाकिस्तान में इकट्ठा किया गया.
मदरसों में सिखाई गई हिंसा
सऊदी अरब की आर्थिक मदद और अमेरिकी राजनीतिक समर्थन से अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा पर बड़ी संख्या में मदरसों की स्थापना की गई. इन मदरसों में धार्मिक नहीं, बल्कि सिर्फ हिंसा और हत्या की शिक्षा दी गई. इसका मकसद था सोवियत संघ के खिलाफ लड़ाई को मजबूत करना.
ऐसे बना पाकिस्तान आतंकियों की फैक्टरी
आईआईटियन आचार्य प्रशांत ने आगे बताया कि जब सोवियत-अफगान युद्ध खत्म हुआ, तब एक नई समस्या सामने आई. जिन लड़ाकों को तैयार किया गया था, वे वापस अपने देशों को नहीं लौटे. इसके बजाय वे अलग-अलग क्षेत्रों में सक्रिय हो गए, जैसे कश्मीर, पश्चिम एशिया और अन्य संघर्ष वाले इलाके. आचार्य प्रशांत के मुताबिक, यही वह मोड़ था जब पाकिस्तान धीरे-धीरे आतंकवाद का केंद्र बनता चला गया. यहां तैयार हुए नेटवर्क ने आगे चलकर बड़े आतंकी संगठनों को जन्म दिया, जिनमें इस्लामिक स्टेट जैसे नाम भी शामिल हैं.
अज्ञान और विनाश का चक्र
आचार्य प्रशांत इस पूरे मुद्दे को केवल राजनीति तक सीमित नहीं मानते. उनका कहना है कि अज्ञानता और गलत सोच भी इसका बड़ा कारण है. जब इंसान दूसरों को नुकसान पहुंचाने की सोच में उलझ जाता है, तो वह खुद अपने ही भविष्य को नुकसान पहुंचाता है. इस तरह पाकिस्तान का आतंकवाद से जुड़ाव किसी एक घटना का परिणाम नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति, युद्ध रणनीतियों और सामाजिक परिस्थितियों का मिला-जुला असर है.




