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Nitish के बाद बिहार: BJP के 10 बड़े वादों पर कितना खरे उतरे सम्राट चौधरी? 49 दिनों में कितना आगे बढ़ी सरकार?

सम्राट चौधरी सरकार के 49 दिनों का रिपोर्ट कार्ड. बीजेपी के रोजगार, मुफ्त बिजली, महिला सशक्तिकरण, आवास और विकास के वादों पर कितना हुआ काम?

Samrat Choudhary 49 Days Bihar BJP Government Bihar CM Report Card
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15 अप्रैल 2026 को सम्राट चौधरी ने बिहार के पहले भाजपा मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली. यह सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि बिहार की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत भी थी. करीब दो दशकों तक राज्य की राजनीति का केंद्र रहे नीतीश कुमार के बाद अब विकास, कानून-व्यवस्था, रोजगार और प्रशासनिक सुधारों की जिम्मेदारी सीधे भाजपा के नेतृत्व पर आ गई है. आइए, जानते हैं ​कि पिछले 49 दिनों में कितना बदला बिहार?

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के दौरान बीजेपी और एनडीए ने रोजगार, मुफ्त बिजली, महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण, किसानों की आय बढ़ाने, गरीबों के लिए आवास और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं जैसे कई बड़े वादे किए थे. मुख्यमंत्री बनने के बाद सम्राट चौधरी के शुरुआती 49 दिन इसी कसौटी पर परखे जा रहे हैं कि सरकार ने इन वादों को जमीन पर उतारने की दिशा में कितनी प्रगति की है, हालांकि, यह अवधि किसी भी सरकार के मूल्यांकन के लिए बहुत लंबी नहीं मानी जाती, लेकिन शुरुआती फैसले सरकार की प्राथमिकताओं और दिशा का संकेत जरूर देते हैं.

क्या थे बीजेपी के 10 बड़े चुनावी वादे?

  • 1 करोड़ से अधिक युवाओं को नौकरी और रोजगार के अवसर.
  • हर परिवार को 125 यूनिट मुफ्त बिजली.
  • 1 करोड़ महिलाओं को ‘लखपति दीदी’ बनाना.
  • 50 लाख गरीब परिवारों को पक्का मकान.
  • 5 लाख रुपये तक का मुफ्त और कैशलेस इलाज.
  • ग्रेजुएट युवाओं को दो साल तक बेरोजगारी भत्ता.
  • बड़े पैमाने पर स्किल डेवलपमेंट अभियान.
  • किसानों को अतिरिक्त आर्थिक सहायता.
  • बुजुर्ग, विधवा और दिव्यांग पेंशन को बढ़ाकर 1100 रुपये करना.
  • बिहार को आधुनिक बनाने के लिए नए एक्सप्रेसवे और रेल नेटवर्क का विस्तार.

अब तक सम्राट सरकार ने क्या किया?

मुख्यमंत्री बनने के बाद सम्राट चौधरी सरकार ने कई प्रशासनिक और विकास संबंधी फैसले लिए हैं. इनमें 10 जिलों में 11 सैटेलाइट टाउनशिप विकसित करने की योजना, हर ब्लॉक में एक मॉडल स्कूल, छात्राओं की सुरक्षा के लिए ‘पुलिस दीदी’ योजना, निजी स्कूलों की फीस पर निगरानी, बिहार के ठेकेदारों को प्राथमिकता, ई-रजिस्ट्रेशन व्यवस्था और ‘सहयोग की त्रिवेणी’ शिकायत निवारण तंत्र जैसी पहल शामिल हैं.

सरकार का दावा है कि ये फैसले बिहार को बेहतर प्रशासन, बेहतर शिक्षा और बेहतर शहरी विकास की दिशा में ले जाएंगे. हालांकि, इनमें से अधिकांश योजनाएं अभी शुरुआती चरण में हैं.

शिक्षा सुधार पर कितना काम हुआ?

हर ब्लॉक में एक उच्च माध्यमिक विद्यालय को आदर्श संस्थान बनाने की योजना और निजी स्कूलों की फीस में पारदर्शिता लाने की पहल शिक्षा क्षेत्र में सरकार के सबसे सक्रिय कदम माने जा रहे हैं. इससे ग्रामीण क्षेत्रों के छात्रों को बेहतर शैक्षणिक सुविधाएं मिलने की उम्मीद है.

महिला सुरक्षा पर सरकार कितनी गंभीर?

‘पुलिस दीदी’ योजना के जरिए छात्राओं और महिलाओं की सुरक्षा को मजबूत करने की कोशिश की गई है. सरकार इसे महिला सशक्तिकरण की दिशा में शुरुआती लेकिन महत्वपूर्ण कदम बता रही है.

प्रशासनिक सुधारों में क्या बदलाव दिखे?

‘सहयोग की त्रिवेणी’ और ई-गवर्नेंस से जुड़े कदम प्रशासनिक जवाबदेही बढ़ाने की कोशिश के रूप में देखे जा रहे हैं. यदि ये प्रभावी ढंग से लागू होते हैं तो आम लोगों को सरकारी सेवाओं तक पहुंच आसान हो सकती है.

शहरी विकास की दिशा में क्या हुआ?

10 जिलों में 11 सैटेलाइट टाउनशिप विकसित करने की योजना को सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में गिना जा रहा है. इसका उद्देश्य भविष्य में निवेश, रोजगार और शहरी बुनियादी ढांचे को मजबूत करना है.

किन वादों पर अब भी सबसे ज्यादा सवाल हैं?

रोजगार कब मिलेगा?

सरकार ने रोजगार सृजन का बड़ा वादा किया था, लेकिन शुरुआती 49 दिनों में ऐसी कोई बड़ी घोषणा या भर्ती अभियान सामने नहीं आया जिससे बड़े पैमाने पर रोजगार मिलने की तस्वीर साफ हो सके.

उद्योग और निवेश पर क्या प्रगति हुई?

बिहार में निवेश आकर्षित करने की बात जरूर हो रही है, लेकिन अभी तक कोई बड़ा औद्योगिक निवेश या नई उद्योग नीति चर्चा का केंद्र नहीं बनी है.

पलायन रोकने की रणनीति क्या?

बिहार से बाहर रोजगार के लिए जाने वाले युवाओं की संख्या अभी भी बड़ी चुनौती है. विपक्ष का कहना है कि जब तक स्थानीय स्तर पर रोजगार नहीं बढ़ेगा, तब तक पलायन की समस्या बनी रहेगी.

गरीबों को नई राहत कब मिलेगी?

आवास, पेंशन और आर्थिक सहायता जैसे वादों पर अभी तक कोई ऐसा बड़ा फैसला नहीं दिखा है जिससे गरीब वर्ग को तत्काल राहत मिलती नजर आए.

विकास की जरूरत, लेकिन रफ्तार पर सवाल क्यों?

बिहार आज भी देश के सबसे गरीब राज्यों में शामिल है. उद्योग, रोजगार, शहरीकरण और निवेश के क्षेत्र में राज्य को तेज गति से आगे बढ़ने की जरूरत है. ऐसे में भाजपा समर्थकों का एक वर्ग उम्मीद कर रहा था कि सम्राट चौधरी शुरुआत में ही कुछ बड़े और आक्रामक आर्थिक फैसले लेंगे. लेकिन अब तक सरकार का जोर प्रशासनिक सुधारों और संस्थागत बदलावों पर अधिक दिखाई देता है.

आखिर "सुस्त" क्यों दिख रही है सरकार?

इसके पीछे कई राजनीतिक और प्रशासनिक कारण बताए जा रहे हैं. इनमें :

  • पहला, भाजपा अभी भी एनडीए गठबंधन के साथ सरकार चला रही है, इसलिए बड़े फैसलों में राजनीतिक संतुलन जरूरी है.
  • दूसरा, आने वाले चुनावों को देखते हुए सरकार जोखिम लेने के बजाय स्थिरता और सुशासन का संदेश देना चाहती है.
  • तीसरा, सम्राट चौधरी ने शुरुआत से ही विकास की निरंतरता पर जोर दिया है. यानी पूरी तरह नया मॉडल पेश करने के बजाय मौजूदा योजनाओं को आगे बढ़ाने की रणनीति अपनाई गई है.

बीजेपी की प्रशासनिक विश्वसनीयता साबित करना?

पहली बार बिहार में मुख्यमंत्री पद भाजपा के पास है. ऐसे में अब सफलता और असफलता दोनों का राजनीतिक असर सीधे भाजपा पर पड़ेगा. यही कारण है कि सरकार अपनी प्रशासनिक क्षमता साबित करने पर विशेष जोर देती दिखाई दे रही है.

विपक्ष बोला- काम कहां हुआ?

विपक्ष का आरोप है कि सम्राट चौधरी सरकार ने बड़े-बड़े ऐलान तो किए हैं, लेकिन रोजगार, महंगाई, उद्योग और पलायन जैसे मूल मुद्दों पर अब तक कोई बड़ा और ठोस कदम नहीं उठाया है. विपक्षी दलों का कहना है कि सैटेलाइट टाउनशिप, आदर्श स्कूल और शिकायत निवारण जैसी योजनाएं लंबी अवधि की हैं, जबकि बिहार के युवाओं को तत्काल नौकरियों और निवेश की जरूरत है.

विपक्ष का यह भी दावा है कि चुनाव के दौरान किए गए रोजगार, निवेश और आय बढ़ाने के वादों पर अभी तक जमीन पर दिखने वाला असर नजर नहीं आता. उनके अनुसार सरकार फिलहाल घोषणाओं और प्रशासनिक सुधारों तक सीमित है, जबकि जनता आर्थिक बदलाव के ठोस परिणाम देखना चाहती है.

शुरुआत हुई, लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी

सम्राट चौधरी सरकार के पहले 49 दिन यह संकेत जरूर देते हैं कि सरकार शिक्षा, प्रशासनिक सुधार, महिला सुरक्षा और शहरी विकास पर फोकस कर रही है. लेकिन जिन मुद्दों पर जनता सबसे तेजी से परिणाम चाहती है. रोजगार, उद्योग, निवेश और आय वृद्धि पर अभी ठोस उपलब्धियां सामने नहीं आई हैं.

फिलहाल, यह दौर उपलब्धियों से ज्यादा तैयारी और दिशा तय करने का माना जा सकता है. आने वाले छह से बारह महीने यह तय करेंगे कि सम्राट चौधरी सरकार चुनावी वादों को वास्तविक उपलब्धियों में बदल पाती है या नहीं.

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