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आवारा कुत्ते किसी की निजी संपत्ति नहीं! डॉग बाइट और मौत पर राज्यों को देना होगा भारी जुर्माना: सुप्रीम कोर्ट

आवारा कुत्तों के बढ़ते हमलों पर Supreme Court of India ने सख्त रुख अपनाया है. शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि हर डॉग बाइट, चोट या मौत के मामले में राज्य सरकारों पर भारी मुआवजा तय किया जा सकता है. कोर्ट ने इसे प्रशासनिक लापरवाही बताते हुए कहा कि कानून के बावजूद ज़मीनी अमल नहीं हो रहा है. साथ ही सार्वजनिक जगहों पर कुत्तों को खाना खिलाने वालों की जवाबदेही तय करने के संकेत भी दिए गए हैं. अदालत का जोर साफ है सहानुभूति जरूरी है, लेकिन बच्चों, बुजुर्गों और आम नागरिकों की सुरक्षा सर्वोपरि है.

आवारा कुत्ते किसी की निजी संपत्ति नहीं! डॉग बाइट और मौत पर राज्यों को देना होगा भारी जुर्माना: सुप्रीम कोर्ट
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( Image Source:  sora ai )
नवनीत कुमार
Edited By: नवनीत कुमार

Published on: 13 Jan 2026 1:58 PM

आवारा कुत्तों के बढ़ते हमलों पर सुनवाई करते हुए Supreme Court of India ने बेहद कड़ा संदेश दिया है. शीर्ष अदालत ने साफ किया कि अगर कुत्ते के काटने, घायल होने या किसी की मौत जैसी घटनाएं होती हैं, तो इसके लिए राज्यों पर भारी मुआवजा तय किया जा सकता है. कोर्ट का मानना है कि यह केवल कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि प्रशासनिक निष्क्रियता का मामला है. खासतौर पर बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा को लेकर अदालत ने चिंता जताई है. संकेत साफ है कि अब लापरवाही की कीमत चुकानी होगी.

सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ ने टिप्पणी की कि यह केस अब न्यायिक बहस से ज्यादा सार्वजनिक मंच जैसा बन गया है. उन्होंने कहा कि अदालत को भावनाओं के बजाय कानून के अमल पर ध्यान देना है. कोर्ट ने केंद्र और राज्यों के साथ लंबी बैठक कर ठोस एक्शन प्लान देखने की बात कही. मकसद साफ है कि मौजूदा कानूनों को जमीन पर लागू कराना.

डॉग फीडर्स की जवाबदेही पर बड़ा संकेत

अदालत ने केवल सरकारों को ही नहीं, बल्कि कुत्तों को खाना खिलाने वालों की जिम्मेदारी भी तय करने के संकेत दिए. बेंच ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति सार्वजनिक जगहों पर कुत्तों को पालने जैसा व्यवहार करता है, तो उसकी जवाबदेही भी बनती है. यह टिप्पणी उस तर्क के जवाब में आई, जिसमें इसे “भावनात्मक मुद्दा” बताया गया था. कोर्ट का सवाल सीधा था- भावनाएं इंसानों की सुरक्षा से ऊपर नहीं हो सकतीं.

घर ले जाइए, सड़कों पर क्यों?

जब यह कहा गया कि कुत्तों के लिए सहानुभूति जरूरी है, तो बेंच ने तीखे लहजे में प्रतिक्रिया दी. जस्टिस नाथ ने पूछा कि अगर इतना ही लगाव है, तो उन्हें अपने घर क्यों नहीं ले जाया जाता? उन्होंने कहा कि सड़कों पर घूमते कुत्ते डर और खतरे का कारण बन रहे हैं. यह टिप्पणी दर्शाती है कि अदालत सार्वजनिक सुरक्षा को प्राथमिकता दे रही है.

संस्थानों से हटाने का आदेश पहले ही

इससे पहले अदालत ने स्कूलों, अस्पतालों, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन और खेल परिसरों से आवारा कुत्तों को हटाने का आदेश दिया था. स्पष्ट निर्देश थे कि कुत्तों को शेल्टर होम में भेजा जाए और उन्हें उसी जगह वापस न छोड़ा जाए. कोर्ट ने कहा कि इन जगहों पर कुत्तों की मौजूदगी ‘सिस्टमिक फेल्योर’ को दिखाती है. यह आदेश अब भी सख्ती से लागू करने को कहा गया है.

नगर निकायों की भूमिका पर सवाल

अदालत ने स्थानीय नगर निकायों को नियमित निरीक्षण करने के निर्देश दिए थे. कहा गया कि अगर किसी परिसर में बार-बार डॉग बाइट की घटनाएं होती हैं, तो यह प्रशासनिक उदासीनता है. कोर्ट ने इसे “रोकथाम योग्य खतरा” बताया, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. यानी अब नगरपालिकाओं की जवाबदेही तय होगी.

दिल्ली पर पहले ही ‘गंभीर’ टिप्पणी

पिछले साल जुलाई में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली और आसपास के इलाकों में आवारा कुत्तों की स्थिति को “बेहद गंभीर” बताया था. अदालत ने निर्देश दिया था कि सभी आवारा कुत्तों को रिहायशी इलाकों से हटाकर शेल्टर में भेजा जाए. जो व्यक्ति या संगठन इस प्रक्रिया में बाधा डालेंगे, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई. यह फैसला अब मिसाल के तौर पर देखा जा रहा है.

फीडिंग ज़ोन और सख्त नियम

कोर्ट ने यह भी साफ किया कि सार्वजनिक स्थानों पर कुत्तों को खाना खिलाने की अनुमति नहीं होगी. नगर निकायों को अलग से फीडिंग ज़ोन बनाने के निर्देश दिए गए हैं. रेबीज से संक्रमित या आक्रामक कुत्तों को दोबारा छोड़ने की अनुमति नहीं होगी. कुल मिलाकर, अदालत का संदेश स्पष्ट है कि सहानुभूति जरूरी है, लेकिन इंसानी जान से ऊपर कुछ नहीं.

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