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कहानी 2006 मुंबई ट्रेन ब्लास्ट की! 189 लोगों की हुई मौत, 19 साल बाद सभी आरोपी बरी; अभी कहां पहुंचा केस? पीड़ित ने बताया दर्द

11 जुलाई 2006 को मुंबई की लोकल ट्रेनों में सिर्फ 11 मिनट के भीतर हुए 7 धमाकों ने 189 लोगों की जान ले ली और 800 से ज्यादा लोग घायल हो गए. 2025 में हाई कोर्ट ने सबूतों के अभाव में सभी 12 आरोपियों को बरी कर दिया. पीड़ित परिवार आज भी पूछ रहे हैं- अगर ये दोषी नहीं थे, तो असली गुनहगार कौन है?

Mumbai 7/11 Train Blasts Full Story,
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मुंबई ब्लास्ट 2006 की कहानी

11 जुलाई 2006... शाम का समय था. मुंबई में रोज की तरह लाखों लोग ऑफिस से घर लौट रहे थे. किसी के हाथ में टिफिन था, कोई परिवार से फोन पर बात कर रहा था, तो कोई अगले दिन की योजना बना रहा था, लेकिन किसी को अंदाजा नहीं था कि अगले 11 मिनट उनकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल देंगे. शाम करीब 6:24 बजे से 6:35 बजे के बीच मुंबई की वेस्टर्न रेलवे लाइन पर चल रही लोकल ट्रेनों के फर्स्ट क्लास डिब्बों में एक के बाद एक 7 भीषण धमाके हुए. बताया जाता है कि ये धमाके प्रेशर कुकर के अंदर आरडीएक्स (RDX) भरकर किए गए.

महिम, बांद्रा, खार, माटुंगा, जोगेश्वरी, मीरा रोड और बोरीवली के पास हुए इन धमाकों ने देखते ही देखते रेलवे ट्रैक को चीख-पुकार और खून से भर दिया. इस आतंकी हमले में 189 लोगों की मौत हुई, जबकि 800 से अधिक लोग घायल हुए. यह हमला आज भी भारत के सबसे भयावह आतंकी हमलों में गिना जाता है.

जांच, गिरफ्तारी और लंबा ट्रायल

जांच एजेंसियों ने शुरुआती जांच में प्रतिबंधित संगठन SIMI और लश्कर-ए-तैयबा (LeT) पर साजिश रचने का आरोप लगाया. बाद में इंडियन मुजाहिदीन (IM) से जुड़े एक आरोपी के कथित कबूलनामे ने जांच को और उलझा दिया. आखिर इस हमले के पीछे कौन था? लश्कर, सिमी या इंडियन मुजाहिदीन? इस सवाल का स्पष्ट जवाब आज तक नहीं मिल पाया. करीब नौ साल की सुनवाई के बाद 2015 में विशेष मकोका अदालत ने 12 आरोपियों को दोषी ठहराया. इनमें से 5 को फांसी और 7 को उम्रकैद की सजा सुनाई गई.

फिर आया सबसे बड़ा कानूनी मोड़

करीब दस साल बाद 2025 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने पूरे मामले की दोबारा समीक्षा की और कहा कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में विफल रहा. अदालत ने जांच में गंभीर खामियां, कमजोर सबूत और संदिग्ध कबूलनामों का हवाला देते हुए सभी 12 आरोपियों को बरी कर दिया. इसके बाद महाराष्ट्र सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची.

सुप्रीम कोर्ट ने 24 जुलाई 2025 को बॉम्बे हाई कोर्ट के बरी करने वाले आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी, लेकिन उसने तब तक रिहा हो चुके आरोपियों को दोबारा जेल भेजने का आदेश नहीं दिया. अब पूरा मामला सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है. बरी हुए आरोपियों में से एक वाहिद शेख ने 9 साल की गलत कैद के लिए सरकार से 9 करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग की है.

"अगर ये दोषी नहीं थे, तो मेरी बेटी का कातिल कौन था?"

इस केस का सबसे दर्दनाक पहलू अदालत के फैसले से ज्यादा उन परिवारों का दर्द है, जिन्होंने अपने प्रियजनों को खो दिया. धमाके में अपनी 27 वर्षीय बेटी को खोने वाले रमेश नाइक आज भी जवाब तलाश रहे हैं. उनका सवाल है, "20 साल तक हमें बताया गया कि आतंकियों को पकड़ लिया गया है. अगर हाई कोर्ट कहता है कि सबूत ही नहीं थे, तो पुलिस ने आखिर किसे गिरफ्तार किया था? मेरी बेटी के हत्यारे कौन हैं?"

नाइक की उनकी बेटी शादी के सपने देख रही थी, लेकिन एक शाम सब कुछ खत्म हो गया. अदालत में आरोपियों के बरी होने के बाद उनके चेहरे पर मुस्कान देखना पीड़ित परिवारों के लिए सबसे बड़ा मानसिक आघात बन गया.

सिर्फ एक केस नहीं, न्याय व्यवस्था के लिए भी सवाल

7/11 मुंबई ब्लास्ट केस आज सिर्फ एक आतंकी हमले की कहानी नहीं है. यह सवाल भी है कि क्या जल्दबाजी में हुई जांच ने निर्दोष लोगों को सजा दिलाई? और अगर ऐसा हुआ, तो असली आतंकवादी आखिर कहां हैं? करीब दो दशक बाद भी पीड़ित परिवारों के लिए सबसे बड़ा सवाल वही है- क्या उन्हें कभी पूरा इंसाफ मिल पाएगा?

आतंकी हमला
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