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‘Rarest of Rare’: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- मुंबई ब्लास्ट केस में बरी पर रोक दुर्लभ, CJI गवई ने कहा, 'इतनी जल्दी क्‍या है?'

सुप्रीम कोर्ट ने 2006 मुंबई ट्रेन ब्लास्ट केस में बॉम्बे हाईकोर्ट के हालिया फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर कहा कि बरी पर रोक लगाना बेहद दुर्लभ (Rarest of Rare) मामला है. हाईकोर्ट ने साक्ष्यों और गवाहियों में खामियां पाते हुए 12 आरोपियों को बरी कर दिया था, जिन्हें 2009 में ट्रायल कोर्ट ने फांसी और उम्रकैद की सजा सुनाई थी. महाराष्ट्र सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है और गुरुवार को इस पर सुनवाई होगी.

‘Rarest of Rare’: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- मुंबई ब्लास्ट केस में बरी पर रोक दुर्लभ, CJI गवई ने कहा, इतनी जल्दी क्‍या है?
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( Image Source:  sci.gov.in )
प्रवीण सिंह
Edited By: प्रवीण सिंह4 Mins Read

Updated on: 24 July 2025 10:24 AM IST

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को 2006 मुंबई लोकल ट्रेन ब्लास्ट केस में बरी किए गए 12 आरोपियों के खिलाफ महाराष्ट्र सरकार की अर्जी पर अहम टिप्पणी की. कोर्ट ने कहा कि किसी बरी के फैसले पर रोक लगाना “Rarest of Rare” यानी बेहद दुर्लभ मामला होता है. यह टिप्पणी चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) बी.आर. गवई ने तब की जब राज्य सरकार ने दूसरी बार केस का ज़िक्र किया. इस बीच, ATS और राज्य सरकार जोर दे रही है कि यह मामला इतना गंभीर है कि कोर्ट को हस्तक्षेप करना चाहिए. गुरुवार को इस पर बड़ी सुनवाई होगी.

2006 के मुंबई लोकल ट्रेन धमाकों का नाम आज भी देश के सबसे बड़े आतंकी हमलों में शुमार किया जाता है. 11 जुलाई 2006 को वेस्टर्न रेलवे की लोकल ट्रेनों के फर्स्ट क्लास डिब्बों में सात सिलसिलेवार धमाके हुए थे, जिनमें 180 से ज्यादा लोगों की मौत और 800 से अधिक लोग घायल हुए थे. इस हमले ने पूरे देश को दहला दिया था और जांच एजेंसियों पर तुरंत नतीजे देने का भारी दबाव था. 2009 में ट्रायल कोर्ट ने इस मामले में 12 आरोपियों को दोषी ठहराते हुए पांच को फांसी और सात को उम्रकैद की सजा सुनाई थी. लेकिन इसी हफ्ते बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस फैसले को पलटते हुए सभी 12 को बरी कर दिया. कोर्ट ने कहा कि अभियोजन आरोप साबित करने में पूरी तरह विफल रहा, गवाहों के बयान अविश्वसनीय थे और जांच में गंभीर खामियां थीं. अब महाराष्ट्र सरकार ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की है.

क्या है मामला?

महाराष्ट्र एंटी-टेररिज्म स्क्वॉड (ATS) की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मंगलवार को मामले की तुरंत सुनवाई की मांग की थी. इसके बाद कोर्ट ने इसे गुरुवार को लिस्ट करने पर सहमति जताई. बुधवार को फिर से राज्य की ओर से केस का ज़िक्र हुआ, जिसमें याचिका में एक तकनीकी खामी की बात सामने आई. राज्य के वकील ने कहा कि बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले में कुछ उद्धरण हिंदी में हैं, जिसे दुरुस्त किया जाएगा. वकील ने कहा, “हम कोर्ट को यकीन दिला सकते हैं कि यह केस Rarest of Rare है.”

बॉम्बे हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

इस हफ्ते की शुरुआत में बॉम्बे हाईकोर्ट ने 2009 के ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटते हुए 12 आरोपियों को बरी कर दिया. ट्रायल कोर्ट ने इनमें से पांच आरोपियों (जिनमें से एक की मौत हो चुकी है) को फांसी और सात को उम्रकैद की सजा दी थी. जस्टिस अनिल किलोर और जस्टिस श्याम चंदक की डिविजन बेंच ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में 'पूरी तरह नाकाम' रहा. कोर्ट ने माना कि आरोपियों द्वारा अपराध किया गया यह मानना मुश्किल है.

ATS पर गंभीर आरोप और जांच में खामियां

हाईकोर्ट ने कहा कि ATS पर तेजी से नतीजे देने का दबाव था. बचाव पक्ष ने गवाहों की पहचान पर गंभीर सवाल उठाए. कई गवाहों ने चार साल तक चुप्पी साधी और अचानक पहचान की. एक गवाह का नाम कई अन्य बम धमाकों के मामलों में भी आया था. कई अहम गवाहों से जिरह ही नहीं हुई. RDX और विस्फोटक बरामदगी पर भी संदेह जताया गया. कोर्ट ने कहा कि अभियोजन यह साबित नहीं कर पाया कि बरामद साक्ष्य सुरक्षित थे.

2006 का ब्लास्ट: भारत का सबसे बड़ा आतंकी हमला

11 जुलाई 2006 को मुंबई की वेस्टर्न रेलवे लाइन की लोकल ट्रेनों के फर्स्ट क्लास डिब्बों में सात बम धमाके हुए थे. ये धमाके पीक ऑवर में हुए और सैकड़ों लोगों की मौत हो गई.

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