SIR : 'आ बैल मुझे मार', ममता बनर्जी का मास्टरस्ट्रोक या सेल्फ गोल? सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर जज निभाएंगे एडमिन रोल!
‘आ बैल मुझे मार’ या मास्टरस्ट्रोक? Mamata Banerjee के फैसले पर घमासान. पश्चिम बंगाल में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद जज निभाएंगे एडमिन रोल. जानिए पूरा विवाद और असर.
पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक ऐसा मोड़ आया है, जिसने पूरे सिस्टम पर नई बहस छेड़ दी है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का सुप्रीम कोर्ट जाना क्या रणनीतिक मास्टरस्ट्रोक था या फिर वही ‘आ बैल मुझे मार’ वाली बात? क्योंकि जिस लड़ाई को वह अपने पक्ष में मोड़ना चाहती थीं, उसी ने अब हालात को पूरी तरह बदल दिया है.
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक आदेश के बाद अब पश्चिम बंगाल में जज सीधे प्रशासनिक जिम्मेदारी निभाएंगे. वोटर लिस्ट जैसे अहम काम की कमान कोलकाता हाईकोर्ट के हाथ में होगी. आजाद भारत में पहली बार ऐसा हुआ है, जब 'न्याय' और 'प्रशासन' की सीमाएं इस तरह धुंधली होती दिख रही हैं. सवाल यही है - क्या यह निष्पक्षता की नई शुरुआत है या राजनीति का ऐसा दांव, जो खुद पर ही भारी पड़ गया? ऐसा आजाद भारत में पहली बार हो रहा है कि चुनाव आयोग का काम जज पूरा कराएंगे.
‘आ बैल मुझे मार’ - इस मुहावरे से क्यों जोड़ा जा रहा है मामला?
“आ बैल मुझे मार” का मतलब होता है, खुद ही मुसीबत को न्योता देना. ममता बनर्जी के सुप्रीम कोर्ट जाने के फैसले को इसी नजर से देखा जा रहा है, जहां उनका कदम उल्टा पड़ता नजर आया.
ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट क्यों पहुंचीं?
मुख्यमंत्री ने प्रवर्तन निदेशालय और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो की कार्रवाई को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया- उनका मकसद था खुद को राजनीतिक दबाव का शिकार दिखाना और समर्थकों को मजबूत संदेश देना.
सुप्रीम कोर्ट में क्या कहा था?
बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट में दायर अपनी याचिका में केंद्र सरकार और जांच एजेंसियों की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए थे. उन्होंने सु्प्रीम कोर्ट में खुद जिरह कर कहा था कि यह राजनीतिक बदले की कार्रवाई है. ईडी और सीबीआई का इस्तेमाल उनकी सरकार और टीएमसी के नेताओं को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है. यह संघीय ढांचे पर हमला है. ममता बनर्जी ने ये भी कहा था कि राज्य सरकार की अनुमति के एजेंसियों की कार्रवाई संविधान की भावना के विपरीत है. उन्होंने कोर्ट से मांग की थी कि एजेंसियों की “मनमानी” पर रोक लगे. ताकि आम लोगों और राज्य प्रशासन के अधिकार सुरक्षित रह सकें.
सुप्रीम कोर्ट का ‘असाधारण आदेश’ क्या है?
20 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने एक अनोखा फैसला सुनाते हुए पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट रिविजन के लिए न्यायिक अधिकारियों को प्रशासनिक भूमिका सौंप दी. यह स्वतंत्र भारत में पहली बार हुआ है.
जज अब कौन-कौन से प्रशासनिक काम करेंगे?
सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पंश्चिम बंगाल में 294 न्यायिक अधिकारी हर विधानसभा क्षेत्र में एक तैनात किए जाएंगे. निर्वाचक रजिस्ट्रेशन अधिकारी (ERO) की भूमिका निभाएंगे. करीब 45 लाख दावों और आपत्तियों का निपटारा करेंगे. यानी चुनाव आयोग से भी ज्यादा टफ मुश्किलों का ममता बनर्जी को चुनाव प्रक्रिया के दौरान सामना करना होगा.
क्या है इस फैसले की बड़ी वजह?
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि राज्य सरकार और चुनाव आयोग के बीच विश्वास की कमी (trust deficit) है. इसी वजह से निष्पक्षता बनाए रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने यह कदम उठाया है.
क्या ममता का दांव उल्टा पड़ गया?
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार खुद सुप्रीम कोर्ट जाकर मामला उठाना ममता बनर्जी के लिए “सेल्फ गोल” साबित हो सकता है. अब पूरी प्रक्रिया न्यायपालिका की निगरानी में है, जिससे राज्य सरकार की भूमिका सीमित हो गई है.
विपक्ष और सियासत में क्या प्रतिक्रिया है?
विपक्ष इसे ममता की “हार” बता रहा है और कह रहा है कि अब चुनावी प्रक्रिया में किसी तरह की गड़बड़ी की गुंजाइश नहीं बचेगी.
क्या पहले कभी जजों को प्रशासनिक काम दिया गया था?
भारत में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 50 के तहत न्यायपालिका और कार्यपालिका को अलग रखने की बात कही गई है. देश को आजादी मिलने से पहले ही अंग्रेजी हुकूमत ने ही जज और प्रशासनिक अधिकारियों के काम को अलग-अलग कर दिया था. 1950 के बाद धीरे-धीरे यह अलगाव लागू हुआ और1960-70 के दशक तक पूरी तरह स्थापित हो गया. ऐसे में जजों को प्रशासनिक काम देना एक असाधारण और दुर्लभ कदम माना जा रहा है.
अब SIR में आगे क्या होगा?
28 फरवरी 2026 को ड्राफ्ट वोटर लिस्ट जारी होगी. जजों की निगरानी में विवादित मामलों का निपटारा जारी रहेगा. यह मॉडल भविष्य की चुनावी प्रक्रियाओं के लिए मिसाल बन सकता है.




