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बॉक्स ऑफिस या कैश ऑफिस! फिल्मों के ज़रिए कैसे होती है ब्लैक मनी व्हाइट?

सोचिए एक चमचमाते स्टूडियो को, जहां प्रोड्यूसर वाशु भगनानी जैसा शख्स बैठा है. बाहर दुनिया को चिल्ला रहा है हमारी नई फिल्म 350 करोड़ की! लेकिन अंदर का सच? एक ऐसी कहानी जहां बॉक्स ऑफिस कलेक्शन फ्लॉप होते हैं, लॉस के पहाड़ खड़े हो जाते हैं, फिर भी अगली फिल्म का ऐलान हो जाता है.

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( Image Source:  AI SORA )
हेमा पंत
Edited By: हेमा पंत10 Mins Read

Updated on: 6 March 2026 3:43 PM IST

बॉलीवुड में हर साल सैकड़ों करोड़ रुपये के बजट वाली फिल्में बनती हैं. हैरानी की बात यह है कि इनमें से कई फिल्में बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह फ्लॉप हो जाती हैं, फिर भी वही प्रोड्यूसर कुछ ही महीनों बाद नई बड़ी फिल्म का ऐलान कर देते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि जब फिल्मों से इतना बड़ा नुकसान हो रहा है, तो आखिर पैसा आता कहां से है और लगातार बड़े बजट की फिल्में बन कैसे रही हैं?

यहीं से शुरू होती है एक दिलचस्प कहानी, जिसमें बॉक्स ऑफिस के साथ-साथ “कैश ऑफिस” की भी चर्चा होती है. कई बार दावा किया जाता है कि फिल्मों का इस्तेमाल सिर्फ एंटरटेनमेंट के लिए नहीं, बल्कि पैसे के खेल के लिए भी किया जाता है. आखिर फिल्मों के बजट, कलेक्शन और निवेश के पीछे ऐसा क्या गणित है, जो फ्लॉप के बाद भी इंडस्ट्री को चलाए रखता है? इसी सवाल के जवाब में सामने आती हैं कई चौंकाने वाली थ्योरी और पुराने खुलासे.

फ्लॉप्स की बाढ़

कहानी की शुरुआत साल 2023 से होती है. इसी साल पूजा एंटरटेनमेंट ने बड़े दावों के साथ फिल्म ‘गणपत’ लॉन्च की. रिपोर्ट्स के मुताबिक फिल्म का बजट करीब 190 करोड़ रुपये बताया गया था, जिसमें एक्टर टाइगर श्रॉफ को ही लगभग 40 करोड़ रुपये फीस दी गई थी. मेकर्स को उम्मीद थी कि फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बड़ा धमाका करेगी. लेकिन जब फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज हुई तो नतीजे उम्मीद से बिल्कुल उलट रहे. बॉक्स ऑफिस पर फिल्म खास कमाल नहीं दिखा पाई और भारत में इसका नेट कलेक्शन सिर्फ करीब 13 करोड़ रुपये तक ही सीमित रह गया. ऐसे में अंदाजा लगाया गया कि फिल्म को लगभग 173 करोड़ रुपये का भारी नुकसान हुआ.

‘बड़े मियां छोटे मियां’ एक और डिजास्टर

इसके बाद बारी आई फिल्म ‘बड़े मियां छोटे मियां’ की. अक्षय कुमार और टाइगर श्रॉफ स्टारर इस फिल्म को बड़े पैमाने पर बनाया गया था और इसका बजट करीब 350 करोड़ रुपये बताया गया. मेकर्स ने दावा किया कि फिल्म के विजुअल इफेक्ट्स (VFX) पर ही लगभग 100 करोड़ रुपये खर्च किए गए. हालांकि, इतनी बड़ी लागत के बावजूद फिल्म बॉक्स ऑफिस पर धमाल नहीं मचा पाई. रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत में इसका कलेक्शन करीब 65 करोड़ रुपये ही रहा, जिससे फिल्म को लगभग 285 करोड़ रुपये का भारी नुकसान हुआ. इन फिल्मों के कमजोर प्रदर्शन के बाद अनुमान लगाया गया कि पूजा एंटरटेनमेंट को कुल मिलाकर 500 करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान हुआ. हालात इतने बिगड़े कि कंपनी का ऑफिस बेचना पड़ा और करीब 80 प्रतिशत स्टाफ भी कम हो गया. इसके बावजूद निर्माता वाशु भगनानी ने हार नहीं मानी और आगे नई फिल्मों की योजना बनाने में जुटे हुए हैं.

मेरे हस्बैंड की बीवी

इसके बाद ‘मेरे हस्बैंड की बीवी’ भी रिलीज हुई, जिसमें अर्जुन कपूर और भूमि पेडनेकर नजर आए. करीब 60 करोड़ रुपये के बजट में बनी इस फिल्म की शुरुआत भी कमजोर रही. फिल्म ने पहले दिन करीब 1.5 करोड़ रुपये की ओपनिंग ली और कुल मिलाकर इसका कलेक्शन लगभग 12 करोड़ रुपये तक ही पहुंच पाया. इस तरह फिल्म को करीब 48 करोड़ रुपये का नुकसान झेलना पड़ा.

वाशु भगनानी का कबूलनामा

अब जरा साल 2012 की तरफ चलते हैं. उस समय एक स्टिंग ऑपरेशन ने फिल्म इंडस्ट्री में हलचल मचा दी थी. कैमरे के सामने फिल्म प्रोड्यूसर वाशु भगनानी नजर आए थे और बातचीत के दौरान उन्होंने कथित तौर पर ब्लैक मनी को सफेद करने का एक तरीका समझाया था. स्टिंग में वाशु भगनानी कहते सुनाई देते हैं कि अगर किसी के पास काला धन है तो उसे फिल्म डिस्ट्रीब्यूशन राइट्स के जरिए सफेद किया जा सकता है. उनके मुताबिक, वह 18 फिल्मों के इंडिया डिस्ट्रीब्यूशन राइट्स देने की बात करते हैं. दावा किया जाता है कि करीब 9 करोड़ रुपये की कीमत वाले राइट्स को 100 करोड़ में दिखाया जा सकता है और बाद में होने वाले मुनाफे को 50-50 में बांटा जा सकता है. बातचीत में कैश और चेक के जरिए पैसे के लेन-देन का जिक्र भी सामने आया था.

ये दो बड़े नाम भी आए थे सामने

इस स्टिंग ऑपरेशन में सिर्फ वाशु भगनानी ही नहीं, बल्कि फिल्ममेकर अनीस बज्मी का नाम भी सामने आया था. वीडियो में वह कथित तौर पर कैश और चेक के मिश्रण से डील करने की बात करते नजर आए थे. इसी तरह फिल्म निर्देशक अनुभव सिन्हा भी एक क्लिप में कैश डील का एडवाइस देते दिखाई दिए थे. यह कोई फिल्मी सीन नहीं था, बल्कि स्टिंग कैमरे में रिकॉर्ड हुई असली बातचीत बताई गई थी. उस समय यह वीडियो वायरल हो गया था और फिल्म इंडस्ट्री में पैसों के लेन-देन के तरीकों को लेकर काफी चर्चा छिड़ गई थी.

पेपर्स लीक: ग्लोबल साजिश का खुलासा

कहानी में एक और बड़ा मोड़ तब आया जब साल 2016 में पनामा पेपर्स का खुलासा हुआ. इस लीक में दुनिया भर के करीब 24 हजार ऑफशोर अकाउंट्स से जुड़ी जानकारी सामने आई थी. भारत में भी कई बड़े नाम चर्चा में आए, जिनमें बॉलीवुड से जुड़े कुछ सितारों के नाम भी शामिल बताए गए. रिपोर्ट्स के मुताबिक अमिताभ बच्चन, ऐश्वर्या राय बच्चन और अजय देवगन जैसे नाम सुर्खियों में रहे. बताया गया कि अजय देवगन ने साल 2013 में ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स की एक कंपनी मैरीलेबोन एंटरटेनमेंट के शेयर खरीदे थे. इस मामले में ईडी ने यह भी जांच की कि क्या 2004 में लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (LRS) के तहत कोई नियमों के खिलाफ लेन-देन हुआ था.

क्या था पेंडोरा पेपर्स मामला?

इसके बाद 2021 में पेंडोरा पेपर्स ने भी ऑफशोर फाइनेंस की दुनिया पर एक और बड़ा खुलासा किया. इस लीक में एक्टर जैकी श्रॉफ से जुड़ा एक न्यूजीलैंड ट्रस्ट फंड चर्चा में आया, जो कथित तौर पर उनके ससुर के नाम पर बताया गया था. रिपोर्ट्स में स्विस बैंक से जुड़े निवेशों का भी जिक्र किया गया, लेकिन जांच एजेंसियों को ठोस सबूतों की पुष्टि करना आसान नहीं रहा और मामला आगे ज्यादा साफ नहीं हो सका.

फिल्मों में कैसे की जाती है ब्लैक मनी व्हाइट?

अब आते हैं इस कहानी के मेन क्लाइमेक्स पर, जिसे अक्सर एक काल्पनिक उदाहरण के तौर पर समझाया जाता है. मान लीजिए किसी प्रोड्यूसर के पास 100 करोड़ रुपये का ब्लैक मनी है. सबसे पहले इस पैसे को हवाला के जरिए किसी टैक्स हेवन देश में भेजा जाता है, जहां शेल कंपनियों के माध्यम से इसे घुमाया जाता है. वहां फर्जी कंसल्टेंसी या सर्विस बिल तैयार किए जाते हैं और उसी पैसे का लगभग 70–80 करोड़ हिस्सा व्हाइट मनी के रूप में वापस दिखाया जाता है. इसके बाद भारत में फिल्म का बजट घोषित कर दिया जाता है. मान लीजिए 500 करोड़ रुपये.

ये रूल भी समझना है जरूरी

ऐसे काल्पनिक मॉडल को समझाने के लिए यह भी कहा जाता है कि अगर किसी फिल्म की असली लागत 50 करोड़ हो और उसे 100 करोड़ बताया जाए, जबकि बॉक्स ऑफिस पर 70 करोड़ की कमाई हो जाए, तो बाहरी तौर पर फिल्म घाटे में दिख सकती है. लेकिन अंदरूनी हिसाब-किताब अलग हो सकता है. हालांकि यह समझना जरूरी है कि ये उदाहरण अक्सर इंडस्ट्री में चलने वाली चर्चाओं या थ्योरी के रूप में बताए जाते हैं. असलियत में हर फिल्म का फाइनेंशियल ढांचा अलग होता है और फिल्म बनाने के प्रोसेस में कई कानूनी और फाइनेंशियल रूल्स भी लागू होते हैं.

जो दिखता है वो होता नहीं है

फिल्म इंडस्ट्री में कई बार बजट बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने के आरोप भी लगते रहे हैं. उदाहरण के तौर पर, कुछ फिल्मों में भारी-भरकम VFX खर्च का दावा किया जाता है, लेकिन स्क्रीन पर उसका असर उतना बड़ा नहीं दिखता. इसी तरह स्टार फीस को लेकर भी अक्सर अलग-अलग आंकड़े सामने आते हैं. कहा जाता है कि किसी एक्टर को असल में कम फीस मिली हो, लेकिन प्रमोशन के दौरान उससे कहीं ज्यादा अमाउंट बताया जाता है. इसके अलावा प्रोडक्शन के अलग-अलग खर्चों, जैसे लोकेशन, टेक्निकल काम या क्रू के खर्च को भी कई बार बढ़ाकर दिखाए जाने की चर्चाएं होती रही हैं. कुछ मामलों में फिल्म के क्रेडिट्स में ऐसे इंवेस्टर्स का जिक्र होता है जिनके बारे में ज्यादा जानकारी पब्लिक नहीं होती है.

​साउथ इंडस्ट्री भी नहीं है पीछे

फिल्म इंडस्ट्री में अक्सर यह माना जाता है कि अगर कोई फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह फ्लॉप हो जाए तो प्रोड्यूसर को बड़ा नुकसान झेलना पड़ता है और वह लंबे समय तक नए प्रोजेक्ट से दूर रहता है. लेकिन हाल के समय में बॉलीवुड ही नहीं, साउथ फिल्म इंडस्ट्री में भी एक अलग ही ट्रेंड देखने को मिल रहा है. कई बड़ी फिल्मों के उदाहरण सामने हैं. ‘गेम चेंजर’ करीब 350 करोड़ के भारी-भरकम बजट में बनी, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर लगभग 131 करोड़ ही कमा सकी. इसी तरह ‘हरी हर वीर मल्लू’ का बजट करीब 300 करोड़ बताया गया, जबकि इसकी कमाई 90 करोड़ से भी कम रही. वहीं ‘गोट’ जैसी फिल्म 400 करोड़ के बजट के बावजूद लगभग 292 करोड़ तक ही पहुंच पाई, और ‘गंगूबा’ भी 300 करोड़ के खर्च के मुकाबले करीब 70 करोड़ की कमाई पर सिमट गई. इतना बड़ा नुकसान देखने के बाद आम तौर पर यह उम्मीद की जाती है कि निर्माता कुछ समय के लिए पीछे हट जाएंगे. लेकिन हैरानी की बात यह है कि ऐसा हो नहीं रह.। नुकसान झेलने के बावजूद वही प्रोड्यूसर कुछ समय बाद नई फिल्मों की घोषणा करते नजर आते हैं.

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