Iran-Israel War: कैसे दोस्ती से दुश्मनी में बदले ईरान-इजरायल संबंध? 7 पॉइंट्स में जानें 1948 से 2026 तक क्या-क्या हुआ
आज ईरान और इजरायल आपस में कट्टर विरोधी माने जाते हैं, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब उनके रिश्ते सहयोग और रणनीतिक साझेदारी पर आधारित थे.
Iran-Israel War
(Image Source: X/ @kamaalrkhan, @jacksonhinklle )Iran-Israel War: मिडिल ईस्ट में तनाव एक बार फिर खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है. हफ्तों से जारी अमेरिकी सैन्य तैयारियों के बाद शनिवार 28 फरवरी को इजरायल और अमेरिका ने संयुक्त अभियान "ऑपरेशन एपिक फ्यूरी" के तहत ईरान पर हवाई हमले किए. इस हमले में ईरान के 200 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं. दूसरी तरफ ईरान भी पलटवार कर रहा है. यह कार्रवाई ऐसे समय हुई जब जिनेवा में अमेरिका और ईरान के बीच ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर कूटनीतिक बातचीत जारी थी.
इन हमलों ने न केवल क्षेत्रीय स्थिरता पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि दशकों पुराने ईरान-इजरायल संबंधों के जटिल इतिहास को भी फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है. हालांकि आज दोनों देश कट्टर विरोधी माने जाते हैं, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब उनके रिश्ते सहयोग और रणनीतिक साझेदारी पर आधारित थे. आइए समझते हैं कि कैसे यह संबंध मित्रता से दुश्मनी तक पहुंचे?
इन 7 पॉइंट्स में समझें दोस्ती और दुश्मनी
1. 1948 के बाद की शुरुआत
साल 1948 में इजरायल की स्थापना के बाद पहला अरब-इजरायल युद्ध छिड़ा. अधिकांश अरब देशों ने इजरायल का विरोध किया, लेकिन ईरान इस संघर्ष का हिस्सा नहीं बना. इजरायल की जीत के बाद ईरान ने उसके साथ औपचारिक संबंध स्थापित किए और तुर्की के बाद ऐसा करने वाला दूसरा मुस्लिम-बहुसंख्यक देश बना.
उस समय इजरायल ने अपने पहले प्रधानमंत्री डेविड बेन गुरियन के नेतृत्व में "परिधि सिद्धांत" को अपनाया. इस रणनीति के तहत इजरायल ने अरब देशों की शत्रुता का संतुलन बनाने के लिए गैर-अरब, लेकिन अधिकतर मुस्लिम देशों से गठबंधन बनाने की कोशिश की. तुर्की और क्रांति-पूर्व ईरान इस नीति के प्रमुख साझेदार बने. शाह मोहम्मद रजा पहलवी के शासनकाल में ईरान, अमेरिका और इजरायल के साथ करीबी संबंध बनाए हुए था. अरब देशों द्वारा इजरायल के आर्थिक बहिष्कार के बावजूद ईरान उसे तेल की आपूर्ति करता रहा.
2. साल 1970 में कैसे बदले समीकरण?
मिस्र के नेता गमाल अब्देल नासिर लंबे समय तक "अखिल-अरबवाद" के समर्थक रहे. उनका उद्देश्य अरब देशों के बीच सांस्कृतिक और राजनीतिक एकता स्थापित करना था. एक गैर-अरब राष्ट्र होने के कारण ईरान इस विचारधारा से असहमत था. 1970 में नासिर की मृत्यु के बाद क्षेत्रीय समीकरण बदले और मिस्र जैसे देशों के साथ ईरान के संबंध बेहतर हुए. 1975 में ईरान-इराक समझौते के बाद, जिसमें ईरान ने कुर्द अलगाववादियों को समर्थन बंद करने पर सहमति जताई, क्षेत्र में तनाव अस्थायी रूप से कम हुआ. इससे इजरायल का ईरान के लिए रणनीतिक महत्व भी घटने लगा.
3. 1979 की इस्लामी क्रांति
साल 1979 की इस्लामी क्रांति ने दोनों देशों के रिश्तों की दिशा बदल दी. शाह को सत्ता से हटाकर ईरान में एक धार्मिक शासन स्थापित हुआ. नए नेतृत्व ने इजरायल को फिलिस्तीनी भूमि पर कब्जा करने वाला राष्ट्र माना. ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खुमैनी ने इजरायल को "छोटा शैतान" और अमेरिका को "बड़ा शैतान" कहा. इस बयानबाजी ने दोनों देशों के संबंधों को टकराव में बदल दिया. ईरान ने क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने और अमेरिका समर्थित देशों विशेषकर सऊदी अरब और इजरायल को चुनौती देने की रणनीति अपनाई.
4. इजरायल का साइबर अटैक
क्रांति के बाद दशकों तक ईरान और इजरायल के बीच सीधा सैन्य संघर्ष नहीं हुआ, लेकिन दोनों देशों ने एक-दूसरे को कमजोर करने के लिए परोक्ष रणनीतियां अपनाईं. इजरायल पर आरोप है कि उसने 2010 के दशक की शुरुआत में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को निशाना बनाते हुए कई परमाणु वैज्ञानिकों और ठिकानों पर हमले किए. 2010 में सामने आए "स्टक्सनेट" साइबर हमले को आधुनिक इतिहास का पहला बड़े पैमाने का औद्योगिक साइबर हमला माना जाता है. यह वायरस ईरान के नतान्ज परमाणु संयंत्र की यूरेनियम संवर्धन प्रणाली को नुकसान पहुंचाने के लिए इस्तेमाल किया गया था.
5. ईरान का हिजबुल्लाह और हमास को समर्थन
ईरान पर लेबनान में हिजबुल्लाह और गाजा पट्टी में हमास जैसे संगठनों को समर्थन देने के आरोप लगते रहे हैं. इन समूहों को इजरायल-विरोधी और अमेरिका-विरोधी माना जाता है. 7 अक्टूबर, 2023 को इजरायल पर हमास के हमले के बाद पूरे मिडिल ईस्ट में युद्ध की आशंकाएं तेज हो गईं. इसके बाद इजरायल ने इन संगठनों के कई शीर्ष नेताओं को निशाना बनाया, जिससे ईरान को बड़ा झटका लगा.
6. 2024 में ईरान-इजरायल का सीधा टकराव
अप्रैल 2024 में पहली बार ईरान और इजरायल के बीच सीधा टकराव हुआ. सीरिया की राजधानी दमिश्क में स्थित ईरानी वाणिज्य दूतावास पर संदिग्ध हमले के जवाब में ईरान ने हमला किया. इस घटना में एक वरिष्ठ जनरल सहित 12 लोगों की मौत हुई थी. इसके बाद इजरायल ने भी जवाबी कार्रवाई की. जून 2025 में इजरायल ने ईरान के कई परमाणु और सैन्य ठिकानों पर हवाई हमले किए. प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इस अभियान को "ऑपरेशन राइजिंग लायन" नाम दिया. उन्होंने इसे इजरायल के लिए परमाणु खतरे को समाप्त करने की दिशा में बड़ा कदम बताया.
7. बातचीत से नहीं बनी बात
पिछले साल ईरान में आर्थिक मुद्दों को लेकर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए. पश्चिमी देशों ने प्रदर्शनकारियों के प्रति ईरानी शासन के रवैये की आलोचना की. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी इस मुद्दे पर दबाव बनाया और ईरान को बातचीत की मेज पर लाने की कोशिश की. हालांकि, परमाणु समझौते पर सहमति न बनने और इजरायल के कड़े रुख के चलते वार्ता एक बार फिर विफल हो गई. जिसके चलते अब फिर से युद्ध देखने को मिल रहा है.