तुर्कमान गेट: 950 साल पुराना इतिहास, डिमोलिशन ने की इमरजेंसी की 'कसक' ताजा, जानें किन-किन पलों से जुड़ी हैं इसकी कहानी?

Turkman Gate Delhi: दिल्ली का तुर्कमान गेट करीब 950 साल पुराने इतिहास का गवाह है. मुगल काल में आगरा से राजधानी दिल्ली शिफ्ट होने के दौरान शाहजहां ने यह गेट बनवाया था. आज भी 1975 की इमरजेंसी की दर्दनाक घटना की यादें यहां के लोगों के दिलों में सिहरन पैदा कर देती है. इतिहासकारों के मुताबिक तुर्कमान गेट मुगल वास्तुकला का नायाब उदाहरण है.;

( Image Source:  Delhi Archaeology Department website )
By :  धीरेंद्र कुमार मिश्रा
Updated On : 7 Jan 2026 1:43 PM IST

Turkman Gate Delhi: दिल्ली का तुर्कमान गेट एक बार फिर सुर्खियों में है. करीब 950 साल पुराना यह गेट इतिहास के गई पहलुओं का गवाह है. मुगल काल में आगरा से राजधानी दिल्ली शिफ्ट होने के दौरान शाहजहां ने यह गेट बनवाया था, लेकिन छह जनवरी 2026 को तुर्कमान गेट इलाके के फैज-ए-इलाही मस्जिद के पास 'रूटीन डिमोलिशन' कार्रवाई ने हंगामा मच और कई घंटों तक बवाल मचा रहा.

हालांकि, दिल्ली नगर निगम ने हाईकोर्ट के आदेश पर अवैध निर्माण हटाने का फैसला लिया और इसके लिए सुविधा के लिहाज से आधी रात का समय चुना. प्रशासन का तर्क था कि रात में कार्रवाई से ट्रैफिक और आम जनजीवन पर असर कम पड़ेगा, लेकिन यही टाइमिंग ही बवाल की जड़ बन गई. आइए, जानते हैं क्या है, पूरा मामला और तुर्कमान गेट की कहानी.

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जब आप कनॉट प्लेस से से पुरानी दिल्ली जाते हैं, तो आपको राम लीला मैदान के पास एक पुराने ऐतिहासिक गेट जैसी आकृति दिखाई देगी. यह गेट मशहूर तुर्कमान गेट है. यह गेट दिल्ली के 7 किलों और 52 गेटों के शहर में से माना जाता है, लेकिन आज सिर्फ कुछ ही बचे हैं.पुरानी दिल्ली में स्थित तुर्कमान असल में शहर के एक हिस्से का रास्ता हैं, जिसे एक जिला कहा जाता है. तुर्कमान गेट ऐसा ही एक गेट है, जिसने समय के कहर को झेला है और कई पुराने ऐतिहासिक बदलावों का गवाह रहा है. इस गेट का नाम एक सूफी संत, शाह तुर्कमान बयाबानी के नाम पर रखा गया है, जिनकी कब्र आज भी इस स्मारक के अंदर है. 

इमरजेंसी की याद 

दिल्ली का तुर्कमान गेट भारत में इमरजेंसी के दौर की एक कड़वी याद दिलाता है. यह साल आजाद भारत के इतिहास की उस घटना से इसके जुड़े होने के 50 साल पूरे हो रहे हैं. 1975 में इमरजेंसी के समय इंदिरा गांधी ने अधिकारियों को दिल्ली में अवैध रूप से बनी झुग्गियों को हटाने और लोगों को दिल्ली के दूसरे हिस्सों में बसाने की सलाह दी थी.

ऐसे मिली राष्ट्रीय पहचान

साल 1976 जब देशभर में इंदिरा गांधी की इमरजेंसी लगी थी, तो अमानवीय घटना हुई. पुलिस और स्थानीय लोगों के बीच झड़पें हुईं, जिसमें कई लोगों की जानें गईं. हालांकि, इमरजेंसी के समय ही तुर्कमान गेट को राष्ट्रीय पहचान मिली. इमरजेंसी के समय चले यहां की झुग्गियों पर चले बुल्डोजर और पुलिस का स्थानीय लोगों ने विरोध किया था. कुछ लोग इसे सरकारी नरसंहार भी कहते हैं. उसका जख्म आज भी आस-पास रहने वाले स्थानीय लोगों के बीच ताजा है.

सदियों पुराना है इतिहास

8वीं सदी से ही चर्चा में है. यहां पर बता दें कि शासकों ने एक जिले या छोटे शहर को चिह्नित करने के लिए कई गेट बनवाए. इन गेटों को शहर का प्रवेश द्वार माना जाता था. माना जाता है कि तुर्कमान गेट 12वीं सदी में बनाया गया था. इसका नाम सूफी संत शाह तुर्कमान बयाबानी के नाम पर रखा गया है. उनकी कब्र आज भी इसके अंदर है.

शाहजहां ने बनवाए थे गेट

दिल्ली में ऐसे 50 से ज्यादा गेट थे, लेकिन आज सिर्फ कुछ ही गेट सही-सलामत बचे हैं. माना जाता है कि तुर्कमान गेट सातवें शहर, शाहजहानाबाद में बनाया गया था, जिसे मुगल शासक शाहजहां ने बनवाया था, जो कश्मीरी गेट के पास है, दिल्ली गेट और अजमेरी गेट भी उसी समय के बने माने जाते हैं. तुर्कमान गेट मुगल वास्तुकला के अद्वितीय नमूना है.

घूमने के लिए आसपास क्या है?

चाबड़ी बाजार: तुर्कमान गेट के सबसे पास के मेट्रो स्टेशन दिल्ली मेट्रो की येलो लाइन पर चांदनी चौक और चावड़ी बाजार है. इन दोनों मेट्रो स्टेशनों से चाबड़ी बाजार पैदल जाया जा सकते हैं. यह गेट पुरानी दिल्ली और नई दिल्ली के किनारे पर स्थित है. आप पुरानी दिल्ली की विरासत घूम सकते हैं.

चांदनी चौक : चांदनी चौक में चांदनी चौक और जामा मस्जिद जैसे स्मारक हैं. आप चांदनी चौक के मशहूर बाजारों में घूम सकते हैं. मशहूर कनॉट प्लेस पास में ही है, तुर्कमान गेट से सिर्फ 10 मिनट की ड्राइव पर है. दिल्ली के अजमेरी गेट और दिल्ली गेट जैसे मशहूर गेट भी हैं जहां आप जा सकते हैं.

 खुलने और बंद होने का समय

यह गेट पूरे दिन खुला रहता है. हालांकि, गेट कॉम्प्लेक्स में जाना मना है और आप इसके अंदर नहीं जा सकते. तुर्कमान गेट के लिए कोई एंट्री फीस नहीं लगती.

 

 

घूमने का सबसे अच्छा समय

आप साल भर कभी भी जा सकते हैं. हालांकि, दिल्ली घूमने का सबसे अच्छा समय सर्दियां हैं. जब तापमान दिन भर घूमने के लिए अच्छा होता है. दोपहर 1 बजे के आसपास जाएं, जब वहां गार्ड मौजूद होगा, जो आपको पूरी जगह घूमने देगा.

तुर्कमान गेट को लेकर पैट्रिक फ्रेंच एक पुस्तक लिखी थी. उनका एक लेख हिन्दुस्तान अंग्रेजी में प्रकाशित हुआ था. अपनी पुस्तक में भारत पर लिखी किताब में 1976 में हुई उन घटनाओं का वर्णन किया है: "दिल्ली के पुराने शहर में तुर्कमान गेट के पास खड़े होकर, उन्होंने (संजय गांधी) एक सरकारी अधिकारी से कहा कि वह जामा मस्जिद, जो मुख्य मस्जिद है, उसे देखना चाहते हैं. छह दिनों के अंदर इस आदेश को लागू किया गया और... 150,000 झुग्गियों को गिरा दिया गया. (19 अप्रैल 1976 को) पुलिस ने तुर्कमान गेट के पास बेघर प्रदर्शनकारियों के एक समूह पर गोली चलाई, जिसमें कई लोग मारे गए."

इस अभियान को अंजाम देने के लिए कर्फ़्यू लगाया गया था, जो 13 मई, 1976 तक चला. जगमोहन ने बाद में प्रकाशित होने वाली अपनी आत्मकथा 'आईलैंड ऑफ ट्रुथ' में फायरिंग में मरने वालों की संख्या छह बताई. शाह कमीशन की रिपोर्ट में भी इतने ही लोगों के मारे जाने का जिक्र हुआ.

बिपिन चंद्रा ने अपनी किताब 'इन द नेम ऑफ डेमॉक्रेसी' में मरने वालों की संख्या 20 बताई जबकि वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर ने अपनी किताब 'द जजमेंट' में लिखा कि इस फायरिंग में 150 लोग मारे गए.

शेख अब्दुल्लाह ने किया था विरोध

केवल एक राजनेता व तत्कालीन जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री शेख अब्दुल्लाह ने इन पीड़ित लोगों का मामला ऊपर तक उठाने की जुर्रत की. उन्होंने तुर्कमान गेट और नई बनाई गई कॉलनियों का दौरा किया. उनके साथ इंदिरा गांधी के नजदीकी मोहम्मद यूनुस भी गए.

जनार्दन ठाकुर ने अपनी किताब 'ऑल द प्राइम मिनिस्टर्स मेन' में लिखा, "श्रीनगर लौट कर अब्दुल्लाह ने इंदिरा गांधी को एक लंबा पत्र लिखा जिसमें उन्होंने यमुना पार की नई कॉलनियों की दयनीय स्थिति और उनके 'प्रिय बेटे' द्वारा उनकी नाक के नीचे 'धर्मनिर्पेक्षता' पर किए गए हमले का ज़िक्र किया."

आधे सदी बाद यानी 6 जनवरी 2026 की दोपहर फिर एमसीडी ने कार्रवाई की और घ्वस्तीकरण अभियान चलाया. इसके इतिहास के इस महत्वपूर्ण साल में, यह पेज तुर्कमान गेट को कई अलग-अलग नजरियों से देखेगा. यह पत्थर का दरवाजा मुगल-काल का है, और यह उन 14 दरवाजों में से एक है जो दिल्ली के चारदीवारी वाले शहर की लगभग गायब हो चुकी पत्थर की दीवार का हिस्सा थे.

1940 के दशक के आखिर तक ट्रैफिक तुर्कमान गेट से होकर गुजरता था, लेकिन आसफ अली रोड बनने के बाद दीवार गिरा दी गई और ट्रैफिक गेट के चारों ओर से शुरू हो गया. समय के साथ, गेट से आवाजाही बंद हो गई! बाड़ लगाना बहुत बाद की बात है.

आगरा से दिल्ली शिफ्ट होने पर बना तुर्कमान गेट

दिल्ली सरकार आर्कियोलॉजिकल डिपार्टमेंट के मुताबिक शाहजहांनाबाद नाम के मशहूर शहर के दरवाजों में से एक है, जिसे मुगल बादशाह शाहजहां ने 1683 ईस्वी में बनवाया था. जब उन्होंने अपनी राजधानी आगरा से दिल्ली शिफ्ट की थी. इस गेट को तुर्कमान गेट कहा जाता है क्योंकि यह मुगल काल के एक संत शाह तुर्कमान की कब्र के पास है. हर साल उनकी पुण्यतिथि पर पास में एक मेला लगता है.

मुगल वास्तुकला का नायाब नमूना

मुर्कमान गेट आयताकार आकार का है. यह दो बे गहरा है. पहले बे पर सपाट छत है जबकि दूसरे बे पर गुंबद वाली छत है. सबसे दक्षिणी ओपनिंग के दोनों तरफ अर्ध-अष्टकोणीय दो मंजिला बुर्ज हैं. गेट में तीन मेहराबदार ओपनिंग हैं, जिनके बाहरी सिरों पर दोहरी मेहराबें हैं. फिलहाल शहर की दीवार के कोई अवशेष नहीं हैं.

संजय गांधी की चाह ने बदल दी तस्वीर

बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी जब तुर्कमान गेट से देखना चाहते थे. बता दें कि अप्रैल, 1976 की शुरुआत में जगमोहन और संजय गांधी तुर्कमान गेट के दौरे पर गए थे. कैथरीन फ्रैंक त्फ़्रैंक इंदिरा गांधी की जीवनी में लिखती हैं, "उसी समय संजय ने इच्छा प्रकट की थी कि वो चाहते हैं कि उन्हें तुर्कमान गेट से जामा मस्जिद साफ साफ दिखाई दे. जगमोहन ने संजय गांधी के इन शब्दों को आदेश की तरह लिया."

तभी तय हुआ कि तुर्कमान गेट से जामा मस्जिद के रास्ते को बाधित करने वाली हर चीज को मिटा दिया जाएगा. कुछ ही दिनों में ये तय हो गया कि यहां रहने वाले लाखों लोगों को बीस मील दूर यमुना पार खाली पड़ी जमीन पर बसा दिया जाएगा.

7 अप्रैल को जगमोहन ने एक विशेष संदेशवाहक के जरिए डीआईजी पीएस भिंडर को एक संदेश भिजवाया कि वो 10 अप्रैल से तुर्कमान गेट में सफाई अभियान शुरू कर रहे हैं. उन्हें वहां पुलिस और मैजिस्ट्रेट की मदद की जरूरत होगी.

तुर्कमान गेट के आसपास क्या है?

तुर्कमान गेट के सबसे पास कॉलेज जाकिर हुसैन कॉलेज है जो दिल्ली विश्वविद्यालय के अधीन है. एक तरफ अम्बेडकर स्टेडियम, राजघाट, गांधी शांति प्रतिष्ठान, इंदिरा, राजीव गांधी, संजय गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी, लाल बहादुर शास्त्री, जगजीवन राम की समाधि स्थल है.

इसके अलावा रामलीला मैदान, जामा मस्जिद, सुभाष पार्क, चांदनी चौक, लाल किला, पुस्तक के लिए फेमस मार्केट नई सड़क, संडे पुस्तक बाजार दरियागंज आदि इसी क्षेत्र में स्थित है. यह क्षेत्र आज बल्लीमारान विधानसभा क्षेत्र में आता है. मार्डर्न और भव्य सरकारी दफ्तर में शुमार एमसीडी हेडक्वार्टर, दिल्ली गेट मेट्रो स्टेशन, नई दिल्ली रेलवे स्टेशन, कनॉट प्लेस, दिल्ली गेट बस स्टैंड, अम्बेडकर स्टैडियम बस डिपो, जीबी पंत अस्पताल आदि इसी के इर्दगिर्द हैं.

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