मोदी-शाह के खिलाफ आपत्तिजनक नारे, JNU में आधी रात बवाल; BJP बोली- अर्बन नक्सलियों ने भारत विरोधी सोच को दिया बढ़ावा | Video
दिल्ली दंगों से जुड़े UAPA केस में उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत न मिलने के बाद Jawaharlal Nehru University में आधी रात विरोध प्रदर्शन हुआ. वामपंथी छात्र संगठनों और JNUSU ने फैसले को अन्यायपूर्ण बताते हुए सरकार के खिलाफ नारे लगाए. यह विरोध एक बार फिर JNU को न्याय, कानून और राजनीति की राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ले आया.
सोमवार को Supreme Court of India ने दिल्ली दंगों की कथित बड़ी साजिश से जुड़े मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार किया. फैसला आते ही देर रात Jawaharlal Nehru University के कैंपस में हलचल तेज हो गई. यह सिर्फ कानूनी असहमति नहीं थी, बल्कि वर्षों से जमा राजनीतिक आक्रोश का विस्फोट था.
आधी रात के बाद साबरमती हॉस्टल के आसपास बड़ी संख्या में छात्र इकट्ठा हुए. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ उकसाऊ नारे लगे. इन नारों के वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुए, जिससे मामला कैंपस से बाहर राष्ट्रीय बहस में बदल गया.
जमानत न मिलने पर फूटा गुस्सा
प्रदर्शनकारियों का तर्क था कि लंबी हिरासत और ट्रायल में देरी के बीच जमानत न मिलना “न्याय के खिलाफ” है. उनके लिए यह सवाल सिर्फ दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि UAPA जैसे कड़े कानूनों के इस्तेमाल का है. दूसरी ओर, आलोचकों ने कहा कि अदालत का फैसला कानून की कसौटी पर है, न कि राजनीतिक दबाव पर यहीं से बहस दो ध्रुवों में बंट गई.
JNUSU और वाम संगठनों की भूमिका
इस विरोध में JNUSU और वामपंथी छात्र संगठनों की सक्रिय भागीदारी दिखी. ‘न्याय दो, रिहाई दो’ जैसे नारे कैंपस में गूंजते रहे. छात्र नेताओं ने इसे लोकतांत्रिक विरोध बताया और कहा कि विश्वविद्यालय असहमति की जगह है, खामोशी की नहीं.
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बीजेपी नेताओं ने क्या कहा?
बीजेपी प्रवक्ता Pradeep Bhandari ने एक वीडियो शेयर करते हुए आरोप लगाया कि Jawaharlal Nehru University के साबरमती हॉस्टल के बाहर देर रात Umar Khalid और Sharjeel Imam के समर्थन में प्रदर्शन किया गया. भंडारी ने इसे विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि “भारत-विरोधी सोच को बढ़ावा देने की कोशिश” बताया और कहा कि “बौद्धिक आतंकवादी” किसी भी पेशे एकेडमिक्स, डॉक्टर या इंजीनियर से हो सकते हैं.
वीडियो सामने आने के बाद दिल्ली सरकार में मंत्री Kapil Mishra ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर तीखी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने लिखा कि “सांपों के फन कुचले जा रहे हैं, सपोले बिलबिला रहे हैं,” और दावा किया कि JNU में नक्सलियों, आतंकियों और दंगाइयों के समर्थन में नारे लगाने वाले लोग हताश हैं क्योंकि नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई हो रही है, आतंकियों पर शिकंजा कस रहा है और दंगाइयों को अदालतें पहचान चुकी हैं.
पुराना घाव फिर हरा
प्रदर्शन के दौरान 5 जनवरी 2020 की घटनाओं का भी जिक्र हुआ, जब नकाबपोशों द्वारा जेएनयू में हिंसा की गई थी. छात्रों का कहना था कि इतने साल बाद भी उस मामले में जवाबदेही तय नहीं हुई. उनके मुताबिक, यह “न्याय का अधूरापन” आज के विरोध को और तेज करता है.
चयनात्मक राहत पर सवाल
छात्र संगठनों ने इस बात पर भी सवाल उठाए कि उसी फैसले में कुछ अन्य आरोपियों को राहत मिली, लेकिन उमर खालिद और शरजील इमाम को नहीं. इसे उन्होंने “चयनात्मक न्याय” करार दिया. शिक्षकों के एक वर्ग ने भी प्रशासन और जांच एजेंसियों की भूमिका पर सवाल खड़े किए, जिससे बहस का दायरा और बढ़ा.
प्रशासन की चुप्पी
अब तक विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से कोई औपचारिक बयान सामने नहीं आया है. यह चुप्पी भी अपने आप में सवाल खड़े करती है. क्या प्रशासन टकराव से बचना चाहता है या स्थिति को स्वतः शांत होने देना चाहता है? JNU की राजनीति में यह नई बात नहीं, लेकिन हर बार तनाव की लकीर गहरी होती जाती है.
अदालत के बाहर सियासत, कैंपस के भीतर विचार
JNU में हुआ यह विरोध बताता है कि अदालतों के फैसले केवल न्यायिक नहीं रहते; वे सामाजिक और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी जन्म देते हैं. एक पक्ष इसे अभिव्यक्ति की आज़ादी मानता है, दूसरा कानून-व्यवस्था का सवाल. सच यह है कि JNU एक बार फिर भारत की बड़ी बहसों का माइक्रोकोसम बन गया है, जहां कानून, राजनीति और विचारधाराएं आधी रात को भी टकराती रहती हैं.





