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Iran जंग के बाद क्या चीन ने बदल दी वर्ल्ड पॉलिटिक्स? ट्रंप-पुतिन के बाद शरीफ भी करेंगे Jinping से मुलाकात

मिडिल ईस्ट तनाव के बीच Xi Jinping दुनिया की राजनीति का बड़ा चेहरा बनकर उभरे हैं. जानिए क्यों ट्रंप, पुतिन और शरीफ की नजरें बीजिंग पर हैं.

Iran जंग के बाद क्या चीन ने बदल दी वर्ल्ड पॉलिटिक्स? ट्रंप-पुतिन के बाद शरीफ भी करेंगे Jinping से मुलाकात
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मिडिल ईस्ट में बढ़ते युद्ध जैसे हालात, ईरान संकट, तेल सप्लाई पर खतरे और अमेरिका-रूस की वैश्विक खींचतान के बीच अचानक चीन दुनिया की राजनीति का सबसे अहम केंद्र बनकर उभरा है. बीजिंग इस समय सिर्फ एशिया की ताकत नहीं, बल्कि वह जगह बन चुका है जहां दुनिया के बड़े नेता अपने रणनीतिक समीकरण तय करने पहुंच रहे हैं. पहले अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने चीन का दौरा किया, फिर रूसी राष्ट्रपति Vladimir Putin बीजिंग पहुंचे और अब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री Shehbaz Sharif भी चीन के साथ रिश्तों को नई दिशा देने में जुटे हैं. इन घटनाओं ने साफ संकेत दिया है कि राष्ट्रपति Xi Jinping अब सिर्फ चीन के नेता नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक राजनीति के सबसे प्रभावशाली चेहरों में शामिल हो चुके हैं.

दुनिया की पॉलिटिक्स का सेंटर प्वाइंट कैसे बना चीन?

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव, ईरान संकट, तेल सप्लाई पर खतरे और अमेरिका-रूस की खींचतान के बीच अचानक दुनिया की नजरें चीन पर टिक गई हैं. वजह सिर्फ इतनी नहीं कि चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, बल्कि इसलिए भी कि इस समय लगभग हर बड़ा वैश्विक नेता बीजिंग की ओर देख रहा है. पहले अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump का चीन दौरा हुआ, फिर रूसी राष्ट्रपति Vladimir Putin बीजिंग पहुंचे और अब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री Shehbaz Sharif भी चीन के साथ अपने रिश्तों को नई दिशा देने में जुटे हैं. इन सबके केंद्र में हैं चीनी राष्ट्रपति Xi Jinping, जो खुद को एक ऐसे ग्लोबल पावर सेंटर के रूप में स्थापित कर रहे हैं, जिसके बिना अब कोई बड़ा रणनीतिक समीकरण पूरा नहीं होता.

ट्रंप का चीन दौरा क्यों बना इतना अहम?

अमेरिका और चीन के रिश्ते पिछले कई वर्षों से ट्रेड वॉर, ताइवान विवाद और टेक्नोलॉजी प्रतिबंधों के कारण तनावपूर्ण रहे हैं. लेकिन मिडिल ईस्ट संकट ने दोनों देशों को बातचीत की टेबल पर आने के लिए मजबूर किया. रिपोर्ट्स के मुताबिक ट्रंप ने बीजिंग दौरे में व्यापार, ईरान, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और ताइवान जैसे मुद्दों पर सीधे शी जिनपिंग से चर्चा की.

चीन दुनिया का सबसे बड़ा ऊर्जा आयातक है और उसकी बड़ी तेल जरूरतें मिडिल ईस्ट से पूरी होती हैं. ऐसे में अगर ईरान-इजरायल या खाड़ी क्षेत्र में संघर्ष बढ़ता है तो चीन की अर्थव्यवस्था पर सीधा असर पड़ सकता है. यही वजह रही कि ट्रंप प्रशासन ने भी चीन से इस संकट में “जिम्मेदार भूमिका” निभाने की उम्मीद जताई.

हालांकि, ट्रंप और शी जिनपिंग की मुलाकात में गर्मजोशी दिखाई गई, लेकिन अंदरूनी मतभेद कायम रहे. ताइवान को लेकर शी जिनपिंग ने साफ चेतावनी दी कि अगर इस मुद्दे को ठीक से नहीं संभाला गया तो “संघर्ष और टकराव” की स्थिति बन सकती है.

चीन क्या मैसेज देना चाहता है?

बीजिंग इस समय खुद को “स्थिर वैश्विक शक्ति” के रूप में पेश कर रहा है. जब पश्चिमी देश युद्ध और राजनीतिक ध्रुवीकरण में उलझे हैं, तब चीन यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि वह संवाद, व्यापार और कूटनीति का केंद्र बन सकता है. यही कारण है कि ट्रंप के दौरे के तुरंत बाद पुतिन को भी बीजिंग बुलाया गया.

दरअसल, चीन एक साथ दो मोर्चों पर काम कर रहा है. एक तरफ वह अमेरिका के साथ टकराव को नियंत्रित रखना चाहता है. ताकि व्यापार और निवेश प्रभावित न हों, वहीं दूसरी ओर रूस के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी भी मजबूत बनाए रखना चाहता है. यही “बैलेंसिंग पॉलिटिक्स” शी जिनपिंग को आज की वैश्विक राजनीति का सबसे अहम खिलाड़ी बना रही है.

पुतिन का दौरा और रूस-चीन की नई रणनीति

रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर पश्चिमी प्रतिबंध लगातार बढ़े हैं. ऐसे में चीन रूस का सबसे बड़ा आर्थिक और रणनीतिक सहारा बनकर उभरा है. पुतिन के हालिया चीन दौरे में दोनों देशों ने ऊर्जा, टेक्नोलॉजी और मीडिया समेत कई क्षेत्रों में 40 से ज्यादा समझौते किए.

रूस ने चीन को तेल और गैस सप्लाई बढ़ाई है. जबकि चीन रूस के लिए बड़ा बाजार बन चुका है. मिडिल ईस्ट में अस्थिरता के कारण रूस चीन के लिए और भी महत्वपूर्ण ऊर्जा पार्टनर बन गया है. यही वजह है कि पुतिन और शी जिनपिंग ने अपने रिश्तों को “इतिहास के सबसे मजबूत संबंध” बताया.

हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि इस दोस्ती के पीछे व्यावहारिक मजबूरियां भी हैं. रूस को चीन की जरूरत ज्यादा है, जबकि चीन रूस का इस्तेमाल अमेरिका पर रणनीतिक दबाव बनाने के लिए कर रहा है.

शरीफ के दौरे के पीछे क्या रणनीति?

पाकिस्तान लंबे समय से चीन का करीबी सहयोगी रहा है. आर्थिक संकट, IMF दबाव और क्षेत्रीय अस्थिरता के बीच पाकिस्तान फिर से चीन के और करीब जाने की कोशिश कर रहा है. चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) को दोबारा गति देने, निवेश बढ़ाने और सुरक्षा सहयोग मजबूत करने पर फोकस किया जा रहा है.

शहबाज शरीफ का चीन के साथ बढ़ता संपर्क सिर्फ आर्थिक नहीं बल्कि रणनीतिक भी माना जा रहा है. पाकिस्तान जानता है कि अमेरिका और पश्चिम की प्राथमिकताएं बदल रही हैं, इसलिए बीजिंग उसके लिए सबसे भरोसेमंद साझेदार बना हुआ है. दूसरी तरफ चीन भी दक्षिण एशिया में अपना प्रभाव बनाए रखने के लिए पाकिस्तान को अहम मानता है.

क्यों बदल रहा दुनिया का पावर सेंटर?

दिल्ली विश्वविद्यालय में इंटरनेशनल रिलेशंस के प्रोफेसर विजय वर्मा का कहना है कि चीन एक प्रोफेशनल कंट्री है. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को पता है कि, देश को सुपरपावर बनाना है तो नौटंकी करने से काम नहीं चलेगा. देश को उस लायक बनाने के लिए जो सबसे ज्यादा जरूरी काम सबसे पहले करना होगा. चीन वही करता है. जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप 2026 में दुनिया के देशों को 1960 के दौर की तरह डरा धमका रहे हैं.

उन्होंने कहा कि इस बीच चीजें बहुत बदल चुकी है. आज के दौर में 1960 वाला पॉलिटिक्स आप नहीं कर सकते. इसलिए मिडिल ईस्ट वॉर में अमेरिका ही हार तय है. ट्रंप गाल बजाकर कुछ नहीं कर पाएंगे. जिस देश का नेतृत्व प्रोफेशनली काम करेगा, उसकी दुनिया में चलेगी. चीन वही कर रहा है. यही वजह है कि ट्रंप भी चीन जा रहे हैं और पुतिन भी.

शी जिनपिंग ही क्यों बने सेंटर प्वाइंट?

आज दुनिया का लगभग हर बड़ा संकट किसी न किसी रूप में चीन से जुड़ जाता है. चाहे बात सप्लाई चेन की हो, तेल बाजार की, रूस-यूक्रेन युद्ध की या फिर मिडिल ईस्ट तनाव की- हर जगह चीन की भूमिका महत्वपूर्ण है. चीन अमेरिका का सबसे बड़ा रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी है, रूस का सबसे बड़ा साझेदार है और एशिया-अफ्रीका में तेजी से अपना प्रभाव बढ़ा रहा है.

शी जिनपिंग ने पिछले कुछ वर्षों में चीन की विदेश नीति को बेहद आक्रामक और प्रभावशाली बनाया है. अब चीन सिर्फ “फैक्ट्री ऑफ द वर्ल्ड” नहीं रहना चाहता, बल्कि वह वैश्विक राजनीति का निर्णायक केंद्र बनने की कोशिश कर रहा है. ट्रंप, पुतिन और शरीफ जैसे नेताओं का लगातार बीजिंग पहुंचना, इसी बदलती वैश्विक व्यवस्था का संकेत माना जा रहा है.

डोनाल्ड ट्रंपईरान इजरायल युद्ध
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