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War या Peace? ईरान-अमेरिका बातचीत में फंसे 5 सबसे बड़े पेंच, क्यों नहीं बन पा रही डील?

ईरान–अमेरिका बातचीत क्यों अटकी है? लेबनान संघर्ष, आर्थिक प्रतिबंध, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और परमाणु कार्यक्रम जैसे 5 बड़े मुद्दे शांति की राह में बाधा बने हैं. जानिए कैसे ये विवाद War या Peace का फैसला तय कर सकते हैं.

War या Peace? ईरान-अमेरिका बातचीत में फंसे 5 सबसे बड़े पेंच, क्यों नहीं बन पा रही डील?
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क्या दुनिया वाकई एक बड़े टकराव की ओर धीरे-धीरे बढ़ रही है या फिर आखिरी समय पर शांति का रास्ता निकल आएगा? ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच चल रही बातचीत इसी सवाल पर टिकी है. सतही तौर पर लगता है कि डिप्लोमैटिक तरीके से समाधान जल्द निकल आएगा. लेकिन अंदर कई ऐसे कई मुद्दे हैं, जो इस डील को आगे बढ़ने से रोक रहे हैं. सबसे बड़ा पेंच यह है कि दोनों देश 5 अहम मुद्दों पर पूरी तरह आमने-सामने खड़े हैं और कोई भी पहले झुकने को तैयार नहीं है. ऐसा इसलिए कि दोनों को एक-दूसरे पर भरोसा ही नहीं है. जब क्रेडिट ही नहीं तो समधान कैसे होगा? जानें, समस्या समाधान की राह में पांच सबसे बड़ी बाधा क्या?

1. लेबनान और इजरायल युद्ध क्यों बना ब्रेक?

ईरान और अमेरिका के बीच युद्धविराम के बावजूद गतिरोध की जड़ में Lebanon का संकट सबसे बड़ी चुनौती है. लेबनान के इलाके में Hezbollah और Israel के बीच संघर्ष चल रहा है. Iran की साफ शर्त है कि पहले Israel लेबनान पर अपने हमले रोके, तभी वह आगे किसी भी बातचीत में सकारात्मक कदम उठाएगा. दूसरी तरफ अमेरिका इस मुद्दे को अलग मानता है. ट्रंप प्रशासन का कहना है कि लेबनान विवाद का Iran–US से सीधा संबंध नहीं है. यही वह बिंदु है, जहां सबसे बड़ा टकराव दिखता है. दरअसल, ईरान मिडिल ईस्ट में पूरी तरह से युद्धविराम चाहता है. यानी हर फ्रंट पर शांति. जबकि US सिर्फ अपने साथ तनाव कम करने की बात कर रहा है.

2. जंग में पहले कौन झुके पर रार?

इस जंग से बाहर निकलने की राह में दूसरा सबसे बड़ा पेंच आर्थिक प्रतिबंधों का है. ईरान की मांग है कि US पहले उसके फ्रीज किए गए अरबों डॉलर रिलीज करे और उस पर लगे प्रतिबंध हटाए. इसके उलट मेरिका का कहना है कि जब तक ईरान अपने परमाणु और मिसाइल प्रोग्राम पर ठोस कदम नहीं उठाता, तब तक कोई राहत संभव नहीं है. इस मसले पर 'पहले तुम झुको' वाली स्थिति बन गई है, जहां दोनों पक्ष अपनी-अपनी शर्तों पर अड़े हैं. नतीजा यह है कि बातचीत आगे बढ़ने के बजाय बार-बार उसी बिंदु पर अटक जाती है.

3. तेल की राजनीति का सबसे बड़ा दांव

तीसरा मुद्दा Strait of Hormuz का है, जो दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक है. कुल तेल निर्यात का 20 प्रतिशत इसी राह से दुनिया के देशों तक पहुंचता है. ईरान ने हाल के घटनाक्रम में इस स्ट्रेट पर अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश की है, यहां तक कि कंट्रोल और टोल जैसी बात भी सामने आई है. लेकिन अमेरिका इसे किसी भी हालत में स्वीकार करने को तैयार नहीं है, क्योंकि इससे ग्लोबल आयल सप्लाई और इंटरनेशनल ट्रेड पर सीधा असर पड़ता है. यही कारण है कि यह मुद्दा सिर्फ ईरान यूएस तक तक सीमित न होकर पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बन चुका है.

4. Nuclear Program : सबसे पुराना विवाद

चौथा सबसे बड़ा मसला ईरान का परमाणु कार्यक्रम है. अमेरिका की मांग है कि ईरान यूरेनियम इनरिचमेंट को कम करे या पूरी तरह बंद करे. ताकि उसके न्यूक्लियर हथियार बनाने की क्षमता पर रोक लगे. लेकिन ईरान इस मसले को negotiable नहीं मानता. वह, इसे अपनी संप्रभुता और सुरक्षा से जोड़ता है. यह वही मुद्दा है जो सालों से दोनों देशों के बीच अविश्वास की दीवार खड़ी करता आया है, और आज भी किसी समाधान तक पहुंचना सबसे मुश्किल नजर आता है.

5. मिडिल ईस्ट से यूएस सेना की वापसी

इन मुख्य मुद्दों के अलावा Iran ने कुछ अतिरिक्त मांगें भी रख दी हैं, जिनसे स्थिति और जटिल हो गई है. इनमें मिडिल ईस्ट से अमेरिकी सेना की वापसी और युद्ध से हुए नुकसान का मुआवजा (reparation) शामिल है. अमेरिका इन शर्तों को प्रैक्टिकल नहीं मानता है. वह, इसे बातचीत में बाधा के रूप में देखता है. इससे साफ है कि दोनों पक्षों के बीच सिर्फ मतभेद ही नहीं, बल्कि आपस में भरोसे की कमी की वजह से अपेक्षाओं का अंतर भी बहुत बड़ा है.

अहम सवाल : समस्या का समाधान क्या?

यह मामला इस गतिरोध पर टिका है कि ईरान चाहता है - “पहले US और Israel सब कुछ रोके”, जबकि ट्रंप प्रशासन का कहना है कि, “पहले ईरान न्यूक्लियर और मिलिट्री पर कंट्रोल करके दिखाए.” यही वजह है कि बातचीत जारी होने के बावजूद “trust deficit” बना हुआ है. ऐसे में यह कहना मुश्किल है कि बातचीत शांति की ओर जाएगी या टकराव की ओर, लेकिन इतना तय है कि जब तक कोई एक पक्ष पहले कदम नहीं उठाता, तब तक यह गतिरोध बना रहेगा.

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