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सीजफायर या छलावा : इजरायल की लेबनान हमले के पीछे छिपी 'डबल वॉर स्ट्रेटजी' क्या?

लेबनान के राष्ट्रपति Joseph Aoun जनवरी 2025 में चुने गए. लंबे राजनीतिक गतिरोध के बाद उनका चयन हुआ. वे पूर्व सेना प्रमुख रहे हैं और देश को स्थिरता देने की चुनौती उनके सामने है.

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( Image Source:  Sora AI )

ईरान वॉर में सीजफायर के बाद भी सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वाकई सीजफायर पर अमल होगा या यह सिर्फ एक रणनीतिक विराम है? इजरायल, लेबनान, ईरान और अमेरिका के बीच हालात यह संकेत देते हैं कि जमीन पर शांति नहीं, बल्कि एक नियंत्रित टकराव चल रहा है. सीजफायर की घोषणाएं भले हुई हों, लेकिन हमले पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं, इसलिए सीजफायर को मीडिया जगत में ‘टैक्टिकल सीजफायर’ या ‘छलावा’ माने जा रहे हैं.

सीजफायर क्या, कब और क्यों हुआ?

सीजफायर का मतलब युद्ध को अस्थायी रूप से रोकना है, लेकिन मौजूदा हालात में यह पूर्ण युद्धविराम नहीं बल्कि दबाव में लिया गया एक रणनीतिक फैसला जैसा लगता है. गाजा में संघर्ष के दौरान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवीय संकट को लेकर चिंता बढ़ी, जिस कारण अमेरिका और अन्य देशों ने हस्तक्षेप किया. इसके पीछे एक बड़ी वजह यह भी मानी जा रही है कि इजरायल को अपनी सैन्य स्थिति मजबूत करने और अगले कदम तय करने के लिए समय चाहिए था.

आखिर, इजरायल लेबनान को क्यों निशाना बना रहा है?

लेबनान इजरायल के लिए सिर्फ पड़ोसी देश नहीं, बल्कि एक सक्रिय सैन्य खतरे वाला क्षेत्र है, जहां हिजबुल्लाह जैसे संगठन मौजूद हैं, जिन्हें ईरान का समर्थन प्राप्त है. हिजबुल्लाह के पास बड़ी संख्या में रॉकेट और मिसाइलें हैं, जो इजरायल के उत्तरी हिस्से के लिए गंभीर खतरा बन सकती हैं. ऐसे में इजरायल एक ‘प्रीएम्प्टिव स्ट्राइक’ रणनीति अपना रहा है, यानी संभावित खतरे को पहले ही कमजोर करने की कोशिश.

इजरायल की ‘डबल वॉर स्ट्रेटजी’ क्या?

इस रणनीति का मतलब है, एक साथ दो मोर्चों पर दबाव बनाना, लेकिन पूरी तरह युद्ध में फंसने से बचना. एक तरफ इजरायल गाजा में हमास के खिलाफ व्यापक सैन्य अभियान चला रहा है तो दूसरी तरफ लेबनान में हिज​बुल्लाह के खिलाफ सीमित लेकिन लगातार हमले कर रहा है. इसका मकसद यह है कि दुश्मन ताकतें एकजुट होकर बड़े स्तर पर हमला न कर सकें और हर मोर्चे पर उन्हें अलग-अलग कमजोर किया जा सके.

इस रणनीति के पीछे सोच क्या है?

इजरायल की सुरक्षा नीति हमेशा से मल्टी-फ्रंट खतरे को ध्यान में रखकर बनी है. अगर वह सिर्फ गाजा पर ध्यान केंद्रित करता, तो उत्तरी सीमा पर खतरा बढ़ सकता था. इसलिए वह एक संतुलित दबाव बनाए रखना चाहता है, जिससे विरोधी ताकतें बिखरी रहें और इजरायल की ‘डिटरेंस’ यानी डर पैदा करने की क्षमता बनी रहे.

इसमें ईरान की भूमिका क्या है?

ईरान सीधे युद्ध में शामिल नहीं है, लेकिन वह इस पूरे संघर्ष का अहम खिलाड़ी है. वह, हिजबुल्लाह और हमास जैसे संगठनों को समर्थन देता है और ‘प्रॉक्सी वॉर’ के जरिए इजरायल पर दबाव बनाता है. ईरान की रणनीति है कि वह सीधे टकराव से बचते हुए अपने सहयोगियों के जरिए क्षेत्र में प्रभाव बनाए रखे और इजरायल को कई मोर्चों पर उलझाए रखे.

अमेरिका की भूमिका क्या?

अमेरिका इस पूरे घटनाक्रम में संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है. वह एक तरफ इजरायल को समर्थन देता है, वहीं दूसरी तरफ क्षेत्रीय युद्ध को फैलने से रोकना चाहता है. अमेरिका ने सैन्य तैनाती बढ़ाई है और ईरान को भी चेतावनी दी है कि वह सीधे इस संघर्ष में न कूदे. उसका मकसद साफ है - मिडिल ईस्ट को एक बड़े युद्ध में बदलने से रोकना.

क्या यह सीजफायर टिकेगा या सिर्फ छलावा?

मौजूदा हालात को देखकर यह साफ है कि यह स्थायी शांति नहीं है. छोटे-छोटे हमले जारी हैं और तनाव बना हुआ है. ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि यह सीजफायर असल में एक रणनीतिक विराम है, जिसके पीछे बड़ी सैन्य और कूटनीतिक गणनाएं चल रही हैं. अगर हालात बिगड़ते हैं, तो यह संघर्ष आसानी से बड़े क्षेत्रीय युद्ध में बदल सकता है, लेकिन अगर कूटनीति काम करती है, तो सीमित स्तर पर ही तनाव बना रह सकता है.

इजरायल को किस हद तक US की छूट?

इजरायल की मौजूदा सैन्य कार्रवाइयों के पीछे अमेरिका का अप्रत्यक्ष समर्थन माना जाता है, लेकिन यह पूरी तरह “ओपन ग्रीन सिग्नल” नहीं है. अमेरिका इजरायल को सैन्य, खुफिया और कूटनीतिक मदद देता है, खासकर हमास और हिजबुल्लाह के खिलाफ. हालांकि, वह नहीं चाहता कि युद्ध लेबनान या ईरान तक फैलकर बड़ा क्षेत्रीय संघर्ष बने. इसलिए अमेरिका का रुख “सपोर्ट विद कंट्रोल” का है. समर्थन भी, और सीमा तय करने की कोशिश भी.

लॉन्ग वॉर जर्नल में प्रकाशित एक लेख के मुताबिक लेबनान पर इजराइल के हमलों, विशेष रूप से 2024-2026 में युद्धविराम वार्ता से संबंधित हमलों के पीछे की "दोहरी युद्ध रणनीति" है. इसके रणनीति के तहत इजरायल गुप्त छल और हिजबुल्लाह की क्षमताओं को कमजोर करने के साथ एक बफर जोन बनाने की है.

कहीं मकसद लेबनान का गाजा से लिंक तोड़ना तो नहीं?

इस रणनीति का उद्देश्य लेबनान और गाजा मोर्चों के बीच संबंध तोड़ना है, जिससे हिजबुल्लाह को आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर किया जा सके, जबकि नाममात्र के युद्धविराम समझौतों के बावजूद आगे सैन्य कार्रवाई का विकल्प खुला रहे. इजराइल को पता है कि केवल हवाई हमले के दम पर हिजबुल्लाह को कमजोर नहीं किया नहीं किया जा सकता. पिछले 15 महीनों में इजराइल के निरंतर एयर स्ट्राइक ने हिजबुल्लाह को कमजोर तो किया लेकिन उसे पूरी तरह से रोका नहीं पाया.

तो ये है पूरा मामला?

लॉन्ग वॉर जर्नल में इस बात का भी जिक्र है कि आईडीएफ इजरायली सरकार के सामने एक प्रस्ताव रखने की योजना बना रहा है, जिसमें लेबनान के साथ इजराइल की वास्तविक सीमा रेखा, ब्लू लाइन से लगभग 2 से 3 किलोमीटर दूर दक्षिणी लेबनान में एक "सुरक्षा क्षेत्र" बनाने की है. इस योजना के अनुसार, इस क्षेत्र में कोई इजरायली चौकी नहीं बनाई जाएगी. ताकि स्थानीय लोगों और आईडीएफ सैनिकों के बीच टकराव को रोकने के लिए लेबनानी नागरिकों को इस क्षेत्र से निकाला जाएगा.

मिडिल ईस्ट में जो दिख रहा है, वह पूरी कहानी नहीं है. सीजफायर सिर्फ एक ‘ब्रेक’ हो सकता है. असल खेल रणनीति का है. इजरायल की ‘डबल वॉर स्ट्रेटजी’ यह दिखाती है कि वह एक साथ कई मोर्चों को संभालने की कोशिश कर रहा है. जबकि ईरान अपने प्रॉक्सी नेटवर्क के जरिए दबाव बना रहा है. ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि यह शांति नहीं, बल्कि “तूफान से पहले की खामोशी” भी हो सकती है.

ईरान इजरायल युद्ध
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