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Bengal 2021: 'जब ‘दीदी’ बनी ब्रांड और campaign बना war zone', इस बार नहीं दिख रहा वैसा हाई वोल्टेज कैंपेन, क्यों?

2021 में बंगाल चुनाव ‘दीदी’ ब्रांड और आक्रामक बयानबाज़ी से war zone बन गया था. लेकिन इस बार वैसा हाई-वोल्टेज कैंपेन क्यों नहीं दिख रहा? जानिए बदली रणनीति, कमजोर नैरेटिव और शांत पड़े चुनावी माहौल के पीछे की वजह.

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West Bengal Assembly Elections 2021 सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि बयानबाजी की जंग भी बन गया था. पीएम नरेंद्र मोदी और सीएम ममता बनर्जी के बीच तीखे, भावनात्मक और कई बार विवादित बयान लगातार सुर्खियों में रहे थे. उस समय बंगाल में चुनाव प्रचार एक तरह से बीजेपी और टीएमसी के बीच वॉर जोन में बदल गया था. 2021 का चुनाव प्रचार बंगाल के इतिहास में सबसे तीखा, विवादस्पद और आक्रामक चुनाव प्रचार मना जाता है. “दीदी ओ दीदी” और “जय श्रीराम” से लेकर “बाहरी गुंडे” और “चंडी पाठ” तक, हर बयान ने चुनाव को नया मोड़ दिया. इस हाई-वोल्टेज कैंपेन में विकास, पहचान, धर्म और क्षेत्रीय अस्मिता जैसे मुद्दे खुलकर सामने आए थे.

नतीजा यह हुआ कि बंगाल का चुनाव सिर्फ राजनीतिक मुकाबला नहीं, बल्कि narrative battle में बदल गया, जहां हर बयान वोटरों के मनोविज्ञान को बड़े पैमाने पर प्रभावित किया. लेकिन इस बार अब तक के चुनाव प्रचार में वैसा कुछ नहीं दिखा रहा है. जबकि बंगाल में पहले चरण का मतदान होने में 13 दिन शेष रह गए हैं.

2021 में PM मोदी के 5 विवादित बयान

1. “दीदी, ओ दीदी” : पीएम मोदी ने चुनाव प्रचार में ममता बनर्जी पर तंज कसते हुए कहा था, “दीदी, ओ दीदी”. उसके बाद बार-बार रैलियों में इस्तेमाल हुआ. विपक्ष ने इसे ममता बनर्जी के लिए 'व्यंग्य और अपमानजनक' बताया था.

2 “खेला खत्म होगा” : TMC के नारे का जवाब देते हुए पीएम मोदी ने कहा था, “खेला खत्म होगा, विकास शुरू होगा”. इसे आक्रामक चुनावी बयान माना गया था. उनके इस बयान के बाद ममता की सुरक्षा को लेकर उनके समर्थक चिंता जताने लगे थे.

3. “तोलाबाजी सरकार” : पीएम ने TMC सरकार को “cut-money culture” से जोड़ते हुए कहा था, “यह सरकार तोलाबाजी करती है.” जिसे ममता बनर्जी सरकार पर सबसे बड़ा आपत्तिजनक राजनीतिक आरोप माना गया.

4 “सिंडिकेट राज” : पीएम मोदी ने कहा था बंगाल में “सिंडिकेट राज” चलता है. विपक्ष ने कहा यह राज्य की छवि खराब करना के बराबर है. यह प्रदेश की जनता का अपमान है.

5 “घुसपैठियों को बाहर करेंगे” : NRC-CAA के संदर्भ में पीएम ने कहा था “घुसपैठियों को बाहर निकालेंगे”. उनके इस बयान को चुनाव में हिंदू मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण करना माना गया था.

PM के बयान में जवाब में ममता बनर्जी के 5 आपत्तिजनक बयान

1. “बाहरी गुंडे” : सीएम ममता बनर्जी ने BJP नेताओं/कार्यकर्ताओं को “outsiders” कहा था. साथ ही ये भी कहा था कि बाहरी लोग बंगाल पर कब्जा करना चाहते हैं. ये लोग बाहरी गुंडे हैं.

2. “नरेंद्र मोदी सबसे बड़े दंगाई” : सीएम ममता बनर्जी ने पीएम मोदी पर हमला बोलते हुए उन्हें सबसे बड़ा दंगाई करार दिया था. उनके इस बयान पर काफी विवाद हुआ था. बीजेपी आग बबूला हो गई थी. इसके बाद माहौल ऐसा बन गया, जैसाकि बंगाल में किसी भी समय कुछ भी हो सकता है.

3 “चंडी पाठ” : ममता बनर्जी ने बीजेपी के “जय श्रीराम” नारे के जवाब में मार्च 2021 में, नंदीग्राम में नामांकन दाखिल करने के बाद जनसभा को संबोधित करते हुए दुर्गा सप्तसती का श्लोक “या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता. नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥” का पाठ किया था. उन्होंनरे इसे दुर्गा की शक्ति को समर्पित किया था. ममता के इस रूप को देखकर बड़े-बड़े सियासी खिलाड़ी भौचक्के रह गए ​थे. इसे बीजेपी के हिंदू कार्ड का जवाब माना गया.

4. “चुनाव आयोग पक्षपाती” : ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग पर “BJP के दबाव में काम करने का आरोप लगायाथा.

5 “BJP = दंगा और नफरत” : ममता ने ये भी कहा था कि BJP “नफरत की राजनीति” करती है. इसे तीखा राजनीतिक हमला माना गया था.

इन बयानों के बाद चुनाव प्रचार कितना बदल गया?

टीएमसी और बीजेपी की ओर से दिए गए इन बयानों के बाद बंगाल चुनाव 2021 पूरी तरह high-pitch और aggressive campaign में बदल गया था. उस समय बंगाल में चुनावी कैंपेन 'वार जोन' जैसा हो गया था. दोनों तरफ से personal attacks और identity politics देखने को मिली थी. यही कारण था कि 2021 बंगाल चुनाव सबसे ज्यादा चर्चा में रहा.

पीएम ने बीजेपी के पक्ष में चुनावी नैरेटिव गढ़ने के लिए “तोलाबाजी सरकार” और “घुसपैठियों” जैसे मुद्दों के जरिए कानून-व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा को केंद्र में रखा, जबकि ममता बनर्जी ने ने “बाहरी vs बंगाल” और सांस्कृतिक पहचान को बड़ा मुद्दा बनाया. “चंडी पाठ” जैसे कदमों ने धार्मिक विमर्श को और तेज कर दिया. प्रचार का फोकस विकास से हटकर पहचान, भावनाओं और आरोप-प्रत्यारोप पर आ गया. रैलियों की भाषा ज्यादा तीखी और व्यक्तिगत हो गई.

सोशल मीडिया पर भी नैरेटिव वॉर तेज हुआ, जहां हर बयान को बढ़ा चढ़ाकर पेश किया गया. कुल मिलाकर, चुनावी कैंपेन एक तरह से “वार जोन” जैसा दिखने लगा, जहां हर दिन नया बयान और नया विवाद सामने आ रहा था.

किसका नैरेटिव मजबूत हुआ - मोदी या ममता?

अगर नैरेटिव की बात करें तो पीएम मोदी ने राष्ट्रीय मुद्दों (NRC, CAA, भ्रष्टाचार और कानून-व्यवस्था) को उभारकर चुनाव को “बदलाव” की दिशा देने की कोशिश की. लेकिन ममता ने इसे “बंगाल की अस्मिता बनाम बाहरी ताकत” का रूप दे दिया, जो स्थानीय स्तर पर ज्यादा असरदार साबित हुआ था. “बाहरी गुंडे” और “बंगाल की बेटी” जैसे संदेशों ने भावनात्मक कनेक्ट बनाया. साथ ही “चंडी पाठ” के जरिए उन्होंने धार्मिक आलोचनाओं का जवाब भी दिया.

मोदी का नैरेटिव व्यापक और राष्ट्रीय था, लेकिन ममता का नैरेटिव ज्यादा लोकल और भावनात्मक था, जिसने सीधे वोटर्स के दिल को छुआ. यही कारण रहा कि narrative battle में ममता ने जमीन पर ज्यादा मजबूत पकड़ बनाई.

जहां तक चुनाव प्रचार 2026 की बात है, तो दोनों तरह से अग्रेसिव चुनाव प्रचार इस बार नियंत्रित है. अभी तक पांच साल पहले जैसा बयान किसी ने नहीं दिया है. हालांकि, चुनाव प्रचार जारी है, कभी भी कुछ हो सकता है. नेताओं की इस चुप्पी ने बंगाल चुनाव को पहले से ज्यादा उलझा दिया है. लोग पूछ रहे हैं, इस बार क्या होगा, दीदी पहले की तरह भारी साबित होंगी या बीजेपी सियासी चालबाजी के दम पर खेल होगा को इस अंजाम देगी.

विधानसभा चुनाव 2026ममता बनर्जीनरेंद्र मोदी
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