US Iran Ceasefire Talks: क्या छोटे देश रोक सकते हैं बड़े युद्ध, ईरान-अमेरिका वॉर में कहां खड़ा है Pakistan?
ईरान-अमेरिका तनाव के बीच पाकिस्तान की मध्यस्थता, सीजफायर बढ़ा, बातचीत जारी, लेकिन दोनों पक्ष अपनी शर्तों पर अड़े, समाधान की राह अभी भी चुनौतीपूर्ण.
ईरान–अमेरिका तनाव के बीच यह सवाल तेजी से उभर रहा है कि क्या छोटे देश बड़े युद्धों को रोक सकते हैंध् क्या पाकिस्तान भी इसी भूमिका में आने की कोशिश कर रहा है. इतिहास बताता है कि छोटे देश सीधे सैन्य ताकत से नहीं, बल्कि कूटनीति, बैकचैनल बातचीत और भरोसे के जरिए असर डालते हैं. लेकिन पाकिस्तान की मध्यस्थता के मामले में स्थिति जटिल है. न तो अमेरिका उस पर पूरी तरह भरोसा करता दिख रहा है और न ही ईरान. ऐसे में उसकी भूमिका एक संतुलित मध्यस्थ से ज्यादा एक रणनीतिक खिलाड़ी की लगती है. फिर भी, अगर बातचीत के रास्ते खुले रहते हैं, तो यह संभावना बनी रहती है कि तनाव को कम करने में पाकिस्तान की कोशिशें किसी बड़े टकराव को टाल सकती हैं.
क्या छोटे देश बड़े युद्ध रोक सकते हैं?
ईरान जैसे संभावित बड़े संघर्षों के संदर्भ में यह सवाल अहम हो जाता है कि क्या छोटे देश ऐसी लड़ाइयों को रोक सकते हैं. सीधा जवाब है - कभी-कभी हां, लेकिन यह उनकी सैन्य ताकत नहीं, बल्कि कूटनीतिक कौशल, भरोसे और सही समय पर उठाए गए कदमों पर निर्भर करता है.
तटस्थ मध्यस्थ की भूमिका
कतर और नॉर्वे जैसे देश अक्सर तटस्थ मध्यस्थ बनकर सामने आते हैं. ये देश शांति वार्ता की मेजबानी करते हैं और ऐसे समय में संवाद का पुल बनते हैं, जब बड़े देश सीधे बातचीत से बचते हैं. बड़ी ताकतें एक-दूसरे पर भरोसा नहीं करतीं, लेकिन एक निष्पक्ष तीसरे पक्ष पर भरोसा कर सकती हैं.
बैकचैनल कूटनीति का असर
जब आधिकारिक बातचीत विफल हो जाती है, तब छोटे देश पर्दे के पीछे अहम भूमिका निभाते हैं. गुप्त वार्ताओं, कैदियों की अदला-बदली और तनाव कम करने के संकेतों के जरिए वे हालात को बिगड़ने से रोकते हैं. यह ‘साइलेंट डिप्लोमेसी’ कई बार बड़े टकराव को टाल देती है.
रणनीतिक स्थिति का फायदा
ओमान जैसे देशों की भौगोलिक स्थिति उन्हें खास ताकत देती है. होर्मुज जलडमरूमध्य के पास स्थित होने के कारण ओमान दोनों पक्षों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखता है, जिससे उसका प्रभाव उसकी सैन्य क्षमता से कहीं अधिक हो जाता है.
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दबाव
संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों के जरिए छोटे देश युद्धविराम की मांग, प्रस्तावों पर वोटिंग और वैश्विक जनमत को प्रभावित कर सकते हैं. अकेले भले उनका असर सीमित हो, लेकिन सामूहिक रूप से वे बड़ा दबाव बना सकते हैं. हालांकि, छोटे देशों की भूमिका की अपनी सीमाएं भी हैं. वे बड़ी ताकतों को युद्ध रोकने के लिए मजबूर नहीं कर सकते. अगर शक्तिशाली देश संघर्ष के लिए प्रतिबद्ध हों, तो छोटे देश केवल उसे टाल सकते हैं या उसके प्रभाव को कम कर सकते हैं. उनका प्रभाव इस बात पर भी निर्भर करता है कि उन्हें कितना निष्पक्ष और भरोसेमंद माना जाता है.
कूटनीति की असली ताकत
छोटे देश अपनी सेना से नहीं, बल्कि भरोसे, संतुलन और कूटनीति से युद्धों को प्रभावित करते हैं. वे भले ही अकेले संघर्ष खत्म न कर पाएं, लेकिन तनाव कम करने और शांति का रास्ता खोलने में उनकी भूमिका बेहद अहम होती है. “बड़ी लड़ाइयां ताकतवर देशों के बीच लड़ी जाती हैं, लेकिन कभी-कभी उन्हें छोटे देशों की शांत कूटनीति रोक देती है.” तो क्या पाकिस्तान भी अमेरिका ईरान वॉर में यही करना चाहता है.
जहां तक ईरान और अमेरिका वॉर में पाकिस्तान की भूमिका की बात है तो वह अभी तक के प्रयास में उस पर न तो अमेरिका पूरा भरोसा कर रहा है, न ही ईरान. अमेरिका पाकिस्तान को डिप्लोमैटिक टूल के रूप में इस्तेमाल करना चाहता है, जबकि युद्ध की आग में झुलसे ईरान उसी की आड़ में इससे बाहर निकलना चाहता है, वो भी अपनी शर्तों पर. यही वजह है कि शांति वार्ता जारी रही तो मामले का हल निकलने की बात को अभी आप पूरी तरह से खारिज भी नहीं कर सकते.
जंग या बातचीत: पाकिस्तान की पहल, शर्तों में उलझा समाधान
दिल्ली विश्वविद्यालय में इंटरनेशनल रिलेशन के प्रोफेसर विजय वर्मा का कहना है कि ईरान और अमेरिका के बीच 'वॉर' रोकने में या शांति समझौता कराने में पाकिस्तान सफल होगा या नहीं, यह कई फैक्टर्स पर निर्भर करता है. अहम सवाल यह है कि दोनों पक्ष युद्ध क्यों लड़ रहे हैं? क्या दोनों का मकसद पूरा हो गया. पाकिस्तान के प्रयास से इतना तो तय हो गया है कि दोनों पक्ष बातचीत के जरिए मामले का समाधान चाहते हैं. दोनों की अपनी शर्तें हैं.
पाकिस्तान ने दूसरे राउंड की बातचीत कराने का भी प्रयास किया, पर दोनों पक्ष सहमत नहीं हुए. हालांकि, दोनों में से किसी ने बातचीत समाप्त करने की घोषणा नहीं की. इसका नतीजा यह हुआ कि सीजफायर की अवधि ट्रंप ने बढ़ा दिया गया है. ट्रंप के जिद्दी रुख की वजह से दूसरे दौर में बातचीतसंभव नहीं पाया.
अब मसला यह है कि ईरान के दिमाग में एक ही चीज है कि वो अमेरिका को यह अहसास करा दे कि वो वेनेजुएला या मेक्सिको नहीं है. वो इस मसले को वहां तक ले जाना चाहेगा, जिससे अमेरिका अगले 50 साल तक ईरान पर पर हमला करने की सोच भी न सके. दूसरी तरफ अमेरिका की चाहता है कि उसकी दुनिया में दादागिरी, हेजमनी और कमांड की ताकत बरकरार रहे.
श्रीलंका में जब तमिल विवाद हुआ था तो नॉर्वे ने मध्यस्थता कर समस्या का समाधान निकाला था. अगर दो डेमोक्रेटिक कंट्री हों तो ऐसा करना थोड़ा आसान होता है. फिलहाल, दूसरे राउंड की बातचीत को भी संतोषजनक ही माना जा सकता है. आने वाले दिनों में इस दिशा में और प्रगति होने की संभावना है.




