MT Jalveer से Settebello तक: खाड़ी में अमेरिकी 'मिसाइल' की मार- क्या India-US दोस्ती में आएगी दरार?
MT Settebello पर अमेरिकी कार्रवाई में तीन भारतीय नाविकों की मौत के बाद भारत ने कड़ा विरोध दर्ज कराया. जानिए क्या इससे भारत-अमेरिका रिश्तों में तनाव बढ़ेगा.
होर्मुज जलडमरूमध्य के पास अमेरिकी सैन्य कार्रवाई में तीन भारतीय नाविकों की मौत ने भारत-अमेरिका संबंधों में एक नया कूटनीतिक सवाल खड़ा कर दिया है. यह मामला ऐसे समय सामने आया है, जब पीएम नरेंद्र मोदी की G7 शिखर सम्मेलन के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात होने की संभावना है. एक तरफ भारत ने व्यावसायिक जहाज पर हुई सैन्य कार्रवाई को लेकर कड़ा विरोध दर्ज कराया है, तो दूसरी तरफ अमेरिका अपनी कार्रवाई को सुरक्षा और प्रतिबंधों से जोड़कर सही ठहरा रहा है.
विदेश मंत्री एस. जयशंकर के स्टैंड के विरोध में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के बयानों ने इस विवाद को और सुर्खियों में ला दिया है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने भी अमेरिकी रुख को "Deeply shocking" करार देते हुए कई सवाल खड़े किए हैं.
MT Jalveer से Settebello तक, मामला क्या?
पिछले कुछ दिनों में दो जहाजों के नाम चर्चा में रहे हैं- MT Jalveer और MT Settebello. शुरुआत में खबरें आईं कि भारतीय चालक दल वाले जहाज MT Jalveer पर हमला हुआ है. हालांकि, बाद में विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि उस जहाज के सभी भारतीय चालक दल सुरक्षित हैं और किसी नए हमले की पुष्टि नहीं हुई है. इसके बाद ध्यान MT Settebello पर केंद्रित हुआ, जो पालाऊ ध्वज वाला तेल टैंकर था. इसी जहाज पर अमेरिकी कार्रवाई हुई और इसमें तीन भारतीय नाविकों की मौत हुई. यही वजह है कि MT Jalveer से लेकर MT Settebello तक का घटनाक्रम इस पूरे विवाद का प्रतीक बन गया है.
10-11 जून: हमला और तीन भारतीयों की मौत
घटनाक्रम की शुरुआत 10 और 11 जून के बीच उस समय हुई जब ओमान तट के पास होर्मुज क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के दौरान MT Settebello निशाने पर आया. जहाज पर मौजूद भारतीय चालक दल के तीन सदस्य (सुरेश पटनाला, आदित्य शर्मा और शिवानंद चौरसिया) पहले लापता बताए गए और बाद में उनकी मौत की पुष्टि हुई. जहाज पर मौजूद 21 अन्य भारतीय नाविकों को सुरक्षित बचा लिया गया. अमेरिका का दावा था कि जहाज ईरानी तेल से जुड़े प्रतिबंधों का उल्लंघन कर रहा था और अमेरिकी चेतावनियों का पालन नहीं कर रहा था. वहीं, जहाज प्रबंधन ने इन आरोपों पर सवाल उठाए.
11 जून: भारत ने दर्ज कराया कड़ा विरोध
तीन भारतीय नागरिकों की मौत की पुष्टि होते ही भारत सरकार ने कड़ा रुख अपनाया. नई दिल्ली ने अमेरिकी दूतावास के वरिष्ठ अधिकारी को तलब किया और औपचारिक विरोध दर्ज कराया. विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि नागरिक जहाजों के खिलाफ ऐसी सैन्य कार्रवाई गंभीर चिंता का विषय है. भारत ने घटना की पूरी जानकारी और जवाबदेही की मांग की तथा समुद्री मार्गों पर नागरिक जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर जोर दिया.
12 जून: राजनीतिक दबाव और अंतरराष्ट्रीय चिंता
मामला केवल कूटनीति तक सीमित नहीं रहा. नाविक संगठनों, विपक्षी दलों और समुद्री विशेषज्ञों ने सरकार से अमेरिका के सामने यह मुद्दा मजबूती से उठाने की मांग की. अंतरराष्ट्रीय समुद्री समुदाय में भी यह सवाल उठा कि यदि किसी जहाज पर संदेह था तो क्या घातक सैन्य कार्रवाई ही एकमात्र विकल्प था.
13 जून: जयशंकर ने रुबियो से क्या कहा?
मामले ने नया मोड़ तब लिया जब विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से सीधे बातचीत की. जयशंकर ने साफ शब्दों में कहा कि व्यावसायिक जहाजों के खिलाफ ऐसी घातक कार्रवाई को उचित नहीं ठहराया जा सकता. उन्होंने नागरिक नाविकों की मौत को अस्वीकार्य बताया और अमेरिका से जवाबदेही तथा भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की. भारत का संदेश साफ था कि यह केवल एक समुद्री घटना नहीं बल्कि भारतीय नागरिकों की सुरक्षा का मामला है.
जवाब में रुबियो के बयान से और बढ़ा विवाद
जयशंकर के विरोध के बाद अमेरिकी पक्ष की प्रतिक्रिया ने विवाद को और गहरा कर दिया. अमेरिकी विदेश विभाग के अनुसार, मार्को रुबियो ने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य में चलने वाले सभी व्यावसायिक जहाजों को अमेरिकी बलों के निर्देशों का तुरंत पालन करना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिकी नाकेबंदी के उल्लंघन और ईरानी तेल के अवैध परिवहन को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. विवाद की बड़ी वजह यह रही कि अमेरिकी बयान में तीन भारतीय नाविकों की मौत पर सार्वजनिक रूप से संवेदना या खेद का उल्लेख तक नहीं किया. विपक्षी दलों ने इसको लेकर सरकार पर कई सवाल उठाए हैं.
शशि थरूर क्यों भड़के? 'Deeply Shocking' और 'Deeply Insensitive' बयान का मतलब क्या
होर्मुज जलडमरूमध्य के पास अमेरिकी सैन्य कार्रवाई में तीन भारतीय नाविकों की मौत के बाद कांग्रेस सांसद Shashi Tharoor ने अमेरिकी प्रतिक्रिया पर तीखी नाराजगी जताई है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक- थरूर ने कहा कि अमेरिकी विदेश विभाग का आधिकारिक बयान पढ़कर उन्हें "Deeply shocking" यानी "बेहद चौंकाने वाला" लगा, क्योंकि उसमें भारतीय नागरिकों की मौत पर न तो खेद व्यक्त किया गया और न ही संवेदना जताई गई.
थरूर ने सवाल उठाया कि भारत को अपना मित्र और रणनीतिक साझेदार बताने वाला अमेरिका इतनी बड़ी घटना के बाद मानवीय संवेदनशीलता क्यों नहीं दिखा पाया. उन्होंने कहा, "एक मित्र और रणनीतिक साझेदार इतना "deeply insensitive" (बेहद असंवेदनशील) कैसे हो सकता है?"
उनके मुताबिक तीन भारतीय नागरिकों की मौत के बाद सबसे पहली प्रतिक्रिया संवेदना और दुख की होनी चाहिए थी, लेकिन अमेरिकी बयान में जहाजों को अमेरिकी बलों के आदेशों का पालन करने की चेतावनी ज्यादा प्रमुख दिखाई दी.
थरूर ने अमेरिकी कार्रवाई की प्रकृति पर भी सवाल खड़े किए. उनका कहना था कि यदि किसी जहाज पर संदेह था या वह अमेरिकी निर्देशों का पालन नहीं कर रहा था, तो क्या उसे रोकने के लिए "non-lethal means" यानी गैर-घातक तरीकों का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता था?
भारत और अमेरिका की दलीलें क्या हैं?
भारत का तर्क है कि किसी भी परिस्थिति में नागरिक जहाजों और नाविकों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए. नई दिल्ली जवाबदेही, जांच और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए स्पष्ट प्रोटोकॉल की मांग कर रही है. दूसरी ओर अमेरिका अपनी कार्रवाई को सुरक्षा अभियान बता रहा है. वॉशिंगटन का कहना है कि होर्मुज क्षेत्र में अमेरिकी बल प्रतिबंधों और समुद्री सुरक्षा नियमों को लागू कर रहे हैं तथा सभी जहाजों को उनके निर्देशों का पालन करना चाहिए.
क्या बढ़ेगी भारत-अमेरिका के बीच तनातनी?
फिलहाल, इसे पूर्ण कूटनीतिक संकट कहना जल्दबाजी होगी. हालांकि, यह घटना गंभीर है और दोनों देशों के बीच असहजता बढ़ी है. भारत ने विरोध दर्ज कराया है और अमेरिका ने अपनी कार्रवाई का बचाव किया है. लेकिन रक्षा सहयोग, क्वाड, इंडो-पैसिफिक रणनीति, व्यापार, तकनीक और चीन को लेकर दोनों देशों के साझा हित इतने बड़े हैं कि एक घटना के कारण रिश्तों में बड़ी टूट की संभावना कम मानी जा रही है. फिर भी यह मामला आने वाले समय में द्विपक्षीय वार्ताओं का अहम हिस्सा बना रहेगा.
क्या मोदी ट्रंप से यह मुद्दा उठाएंगे?
सबसे बड़ा सवाल यही है. G7 सम्मेलन में मोदी और ट्रंप की संभावित मुलाकात से पहले यह मुद्दा तेजी से चर्चा में है. आधिकारिक एजेंडा सार्वजनिक नहीं है, लेकिन कूटनीतिक संकेत बताते हैं कि भारतीय नाविकों की मौत, समुद्री सुरक्षा और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के उपाय बातचीत का हिस्सा बन सकते हैं. भारत संभवतः मुआवजे, जवाबदेही और नागरिक जहाजों की सुरक्षा को लेकर अमेरिकी आश्वासन चाहेगा. सार्वजनिक मंच पर दोनों नेता रणनीतिक साझेदारी की बात कर सकते हैं, लेकिन बंद कमरे की बातचीत में होर्मुज का यह विवाद प्रमुख मुद्दों में शामिल हो सकता है.
अब आगे क्या?
फिलहाल, तीन भारतीय नाविकों की मौत का मामला केवल एक समुद्री हादसा नहीं रह गया है. यह भारत-अमेरिका संबंधों, वैश्विक समुद्री सुरक्षा और नागरिक जहाजों की सुरक्षा से जुड़ा बड़ा कूटनीतिक प्रश्न बन चुका है. आने वाले दिनों में जांच, अमेरिकी प्रतिक्रिया और मोदी-ट्रंप वार्ता यह तय करेगी कि यह विवाद केवल विरोध दर्ज कराने तक सीमित रहता है या दोनों देशों के रिश्तों में किसी नई बहस और दबाव का कारण बनता है.




