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बांग्लादेश में ISI की साइलेंट एंट्री! जुलाई 2024 से भी खतरनाक है ये बवाल, चुनाव रोकने का है खुफिया प्लान

बांग्लादेश में आम चुनाव से पहले माहौल तेजी से अस्थिर होता जा रहा है. छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की मौत के बाद हिंसक प्रदर्शन, मीडिया दफ्तरों पर हमले और अवामी लीग के कार्यालयों में आगजनी ने हालात और बिगाड़ दिए हैं. खुफिया संकेत बताते हैं कि पाकिस्तान की ISI सीधे सामने आए बिना जमात और कट्टर नेटवर्क के जरिए आंदोलन को पीछे से हवा दे रही है. सोशल मीडिया पर भारत-विरोधी नैरेटिव, पाकिस्तानी अकाउंट्स से फैलाया जा रहा कंटेंट और दूतावासों पर हमले इस रणनीति की ओर इशारा करते हैं.

बांग्लादेश में ISI की साइलेंट एंट्री! जुलाई 2024 से भी खतरनाक है ये बवाल, चुनाव रोकने का है खुफिया प्लान
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( Image Source:  X/kaankit & ANI )
नवनीत कुमार
Edited By: नवनीत कुमार5 Mins Read

Updated on: 19 Dec 2025 3:46 PM IST

बांग्लादेश में चुनाव से पहले जो उथल-पुथल दिख रही है, वह सिर्फ घरेलू असंतोष का नतीजा नहीं लगती. सड़कों पर गुस्सा, सोशल मीडिया पर उन्माद और अचानक भड़की हिंसा इन सबके बीच एक अदृश्य लेकिन बेहद सटीक रणनीति काम कर रही है. यह रणनीति खुलकर नेतृत्व नहीं करती, बल्कि माहौल को इस तरह मोड़ती है कि आग अपने-आप भड़कती दिखे.

न्यूज़ 18 की रिपोर्ट के अनुसार, सुरक्षा एजेंसियों ने बताया कि मौजूदा हालात जुलाई 2024 के उग्र दौर से भी ज्यादा खतरनाक हैं. फर्क बस इतना है कि इस बार कोई एक चेहरा या संगठन सामने नहीं है. हर विरोध “स्वतःस्फूर्त” दिखता है, लेकिन इसके पीछे एक संगठित, अंतरराष्ट्रीय और बेहद अनुभवी दिमाग काम कर रहा है- पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI).

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चिंगारी कैसे बनी आग?

छात्र नेता शरिफ उस्मान हादी की मौत ने पहले से सुलग रहे माहौल में चिंगारी का काम किया. ढाका में चुनावी अभियान के दौरान सिर में गोली लगने, फिर सिंगापुर में इलाज के दौरान मौत. इन घटनाओं ने समर्थकों को हिंसक गुस्से में बदल दिया.

सड़कों पर विस्फोट

हादी की मौत के बाद ढाका समेत कई शहरों में प्रदर्शन हिंसक हो गए. ‘प्रोथोम आलो’ और ‘डेली स्टार’ जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के दफ्तरों पर हमले हुए, राजशाही में अवामी लीग के कार्यालय जलाए गए. यह संकेत था कि निशाना सिर्फ सरकार नहीं, बल्कि विचारधारा भी है.

ISI की बैकिंग

इस बार ISI खुद को आगे नहीं रख रही. उसने जमात-ए-इस्लामी और उससे जुड़े छात्र-मदरसा नेटवर्क को साफ निर्देश दिए हैं कि वे आंदोलन का चेहरा न बनें, बल्कि पीछे रहकर उसे ईंधन दें. इससे हिंसा ‘स्थानीय’ और ‘स्वतःस्फूर्त’ दिखाई देती है.

भीड़ स्थानीय, नैरेटिव बाहरी

सड़कों पर उतरने वाले चेहरे बांग्लादेशी हैं, लेकिन सोशल मीडिया पर गढ़ी जा रही कहानियां, हैशटैग और वीडियो अक्सर पाकिस्तान से संचालित अकाउंट्स से आ रहे हैं. यहीं से भारत-विरोधी और कट्टर इस्लामी नैरेटिव को हवा दी जा रही है.

पैसा, डिजिटल सपोर्ट और मीडिया मैनेजमेंट

खुफिया इनपुट्स के मुताबिक कुछ बांग्लादेशी डिजिटल प्लेटफॉर्म और प्रभावशाली सोशल मीडिया वॉयस को पाकिस्तान-समर्थित चैनलों से फंडिंग मिली है. इनका मकसद हिंसा को ‘जनआक्रोश’ और भारत को ‘दखलअंदाज ताकत’ के रूप में पेश करना है.

भारत को खलनायक बनाने की कोशिश

हर बड़े उग्र प्रदर्शन के बाद भारत-विरोधी नारे, भारतीय दूतावासों पर हमले और ‘दिल्ली ने साजिश रची’ जैसे आरोप सामने आ रहे हैं. यह संयोग नहीं, बल्कि ISI की उस रणनीति का हिस्सा है, जिसमें भारत को चुनावी मुद्दा बनाया जा रहा है.

जमात और कट्टर नेटवर्क की नियंत्रित एंट्री

जमात-ए-इस्लामी और उससे जुड़े संगठनों की भूमिका सीमित लेकिन निर्णायक रखी गई है. वे भीड़ को उग्र करते हैं, लेकिन कैमरे के सामने नहीं आते ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन पर प्रतिबंध या कार्रवाई न हो.

चुनावी अस्थिरता ISI के लिए क्यों फायदेमंद?

बांग्लादेश में अस्थिरता भारत के पूर्वी मोर्चे पर दबाव बढ़ाती है. यही कारण है कि चुनाव से ठीक पहले माहौल को अस्थिर रखना ISI के दीर्घकालिक रणनीतिक हितों के अनुरूप है.

भारतीय ठिकानों पर हमले

भारतीय राजनयिक परिसरों पर हमलों को सोशल मीडिया पर ‘सफल प्रतिरोध’ के रूप में पेश किया जा रहा है. यह ISI के उस लक्ष्य से मेल खाता है, जिसमें भारत की छवि को कमजोर और शेख हसीना के संरक्षक के रूप में दिखाया जाता है.

नैरेटिव वॉर में बदला माहौल

बांग्लादेश में यह संकट अब सिर्फ कानून-व्यवस्था का नहीं रहा. यह एक नैरेटिव वॉर में बदल चुका है, जहां गोलियां कम और कहानियां ज्यादा चलाई जा रही हैं. अगर इस अदृश्य हस्तक्षेप को समय रहते रोका नहीं गया, तो इसका असर सिर्फ ढाका नहीं, पूरे दक्षिण एशिया पर पड़ेगा.

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