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Iran-Israel war: रस्ते का माल सस्ते में! तेहरान में भी फेल हुआ चीन का Air Defence System HQ-9B

Iran-Israel war: ईरान पर अमेरिका-इजराइल हमलों के बाद चीन के HQ-9B एयर डिफेंस सिस्टम की क्षमता पर सवाल उठ रहे हैं. क्या कम कीमत में लिया गया यह सिस्टम असली जंग में उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाया?

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( Image Source:  X/@tdefenceagency )
प्रवीण सिंह
Edited By: प्रवीण सिंह6 Mins Read

Updated on: 2 March 2026 11:48 AM IST

Iran-Israel war: चले तो चांद तक, ना चले तो शाम तक, चाइनीज माल को लेकर ये कहावत आपने भी जरूर सुनी होगी. लेकिन पाकिस्‍तान के बाद अब ईरान को भी चीनी सामान पर भरोसा करना महंगा पड़ गया है. जी हां, हम बात कर रहे हैं चीनी एयर डिफेंस सिस्‍टम HQ-9B की. पाकिस्‍तान के खिलाफ भारत के ऑपरेशन सिंदूर के दौरान बुरी तरह फेल हुए HQ-9B एयर डिफेंस सिस्‍टम ने ईरान की सुरक्षा में भी पलीता लगा दिया. ईरान ने हवाई हमलों से बचने के लिए जिस चीनी हथियार यानी एयर डिफेंस सिस्‍टम पर भरोसा किया, उसी ने अमेरिका और इजरायल के हमलों के दौरान उसकी लुटिया डुबो दी. कम से कम ऑपरेशन सिंदूर के बाद तो ईरान को सबक लेना ही चाहिए था.

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और तेज होते हवाई हमलों के बीच सवाल उठ रहे हैं कि क्या चीन का यह बहुचर्चित सिस्टम असल युद्ध परिस्थितियों में उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पा रहा? क्या कम कीमत में सौदा करने की रणनीति ईरान को महंगी पड़ गई? और क्या पाकिस्तान के अनुभव से भी तेहरान ने कोई सबक नहीं लिया? HQ-9B की कथित विफलता ने न सिर्फ ईरान की सुरक्षा तैयारियों पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि वैश्विक हथियार बाजार में चीनी तकनीक की विश्वसनीयता पर भी नई बहस छेड़ दी है.

क्या तेहरान की सुरक्षा ढाल टूट गई?

अमेरिका और इज़राइल के संयुक्त हमलों ने ईरान के 31 में से 20 से अधिक प्रांतों को प्रभावित किया. राजधानी तेहरान समेत इस्फहान और अन्य रणनीतिक शहरों में बड़े विस्फोटों की खबरें सामने आईं. इन हमलों ने ईरान की वायु रक्षा क्षमता पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है. हाल ही में चीन से खरीदा गया HQ-9B एयर डिफेंस सिस्टम मिसाइलों और ड्रोन को रोकने में नाकाम दिखा. यही सिस्टम ईरान की लंबी दूरी की सुरक्षा ढाल का मुख्य आधार माना जा रहा था.

क्‍यों पहले भी सवालों में रहा है HQ-9B?

HQ-9B की यह पहली परीक्षा नहीं थी. इससे पहले पाकिस्तान में भी यह सिस्टम आलोचना के घेरे में आया था, जब भारत ने पहलगाम आतंकी हमले के बाद ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के तहत जवाबी कार्रवाई की थी. उस दौरान भी चीनी एयर डिफेंस की क्षमता पर सवाल उठे थे. अब ईरान में हुए ताज़ा हमलों के बाद रक्षा विश्लेषक पूछ रहे हैं - क्या HQ-9B तकनीकी रूप से कमजोर है या इसे जिस तरह तैनात किया गया, उसमें रणनीतिक चूक रही?

HQ-9B आखिर है क्या और इसकी ताकत कितनी मानी जाती है?

HQ-9B को चीन की सरकारी रक्षा कंपनी China Aerospace Science and Industry Corporation ने विकसित किया है. यह रूसी S-300PMU और अमेरिकी पैट्रियट PAC-2 सिस्टम से प्रेरित माना जाता है, लेकिन चीन इसे पूरी तरह स्वदेशी बताता है. रिपोर्ट्स के मुताबिक इसकी मारक क्षमता 260 किलोमीटर तक है और यह 50 किलोमीटर ऊंचाई तक लक्ष्य को भेद सकता है. इसमें एक्टिव रडार होमिंग और पैसिव इंफ्रारेड सीकर जैसी तकनीक शामिल है, जिससे इसे स्टेल्थ विमान और हाई-एल्टीट्यूड टारगेट्स के खिलाफ प्रभावी बताया जाता है. यह एक साथ 6 से 8 लक्ष्यों को निशाना बना सकता है और 100 तक टारगेट ट्रैक करने की क्षमता रखता है. चीन ने इसे बीजिंग, तिब्बत और दक्षिण चीन सागर जैसे संवेदनशील इलाकों में तैनात कर रखा है.

ईरान के डिफेंस में HQ-9B की भूमिका क्या थी?

खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच ईरान ने अपनी वायु रक्षा क्षमता को मजबूत करने के लिए चीन के साथ कथित तौर पर ‘ऑयल-फॉर-वेपन’ समझौता किया. HQ-9B को ईरान की लंबी दूरी की डिफेंस लेयर के रूप में शामिल किया गया. यह रूसी S-300PMU-2 और ईरान के स्वदेशी Bavar-373 के साथ मिलकर मल्टी-लेयर डिफेंस सिस्टम का हिस्सा था. मध्यम दूरी के लिए Khordad-15 और Raad, जबकि शॉर्ट-रेंज के लिए Tor-M2 और Pantsir-S1 जैसे सिस्टम तैनात थे. माना जा रहा है कि HQ-9B को नतांज न्यूक्लियर कॉम्प्लेक्स, फोर्डो एनरिचमेंट फैसिलिटी और तेहरान के पास मौजूद सैन्य ठिकानों की सुरक्षा के लिए लगाया गया था.

क्या अमेरिकी-इज़राइली हमलों के आगे सिस्टम फुस्‍स हो गया?

कुछ एक्‍सपर्ट्स का यह भी मानना है कि HQ-9B की विफलता का मतलब तकनीकी कमी नहीं, बल्कि जबरदस्त एयरपावर का दबाव हो सकता है. अमेरिका और इज़राइल ने कथित तौर पर स्टेल्थ फाइटर जेट्स, क्रूज़ मिसाइलों और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर का संयुक्त इस्तेमाल किया. यदि एक साथ कई दिशाओं से हाई-प्रिसीजन हमले किए जाएं, तो किसी भी एयर डिफेंस नेटवर्क पर अत्यधिक दबाव पड़ सकता है. संभव है कि ईरान ने जल्दबाजी में इस सिस्टम को तैनात किया हो और पूरी इंटीग्रेशन प्रक्रिया मजबूत न रही हो.

क्या संघर्ष और गहरा सकता है?

हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर अयतुल्‍ला अली खामेनेई की मौत की खबर ने हालात और विस्फोटक बना दिए हैं. ईरान ने “इतिहास का सबसे भीषण जवाबी अभियान” चलाने की कसम खाई है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप ने कहा है कि अभियान “मध्य पूर्व में शांति स्थापित होने तक” जारी रहेगा. इस टकराव ने दुबई एयरपोर्ट जैसे बड़े हब को बंद करने पर मजबूर कर दिया और कतर-यूएई तक तनाव फैल गया. यदि यह युद्ध लंबा खिंचता है, तो न केवल क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन भी बदल सकता है.

क्या चीन की साख पर असर पड़ेगा?

HQ-9B की कथित विफलता ने चीन के रक्षा निर्यात मॉडल पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं. यदि यह सिस्टम बार-बार वास्तविक युद्ध स्थितियों में उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में उसकी विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है. फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या HQ-9B सच में “रस्ते का माल सस्ते में” साबित हुआ, या फिर यह युद्ध आधुनिक एयरपावर की नई हकीकत दिखा रहा है?

ईरान इजरायल युद्ध
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