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ईरान के 3 तिगाड़े, अमेरिका-इजराइल की हालत बिगाड़े, वो ताकत जिससे बैकफुट पर ट्रंप और नेतन्याहू

ईरान की मिसाइल, ड्रोन और हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर पकड़ ने अमेरिका-इजराइल की रणनीति को चुनौती दी, जिससे ट्रंप और नेतन्याहू को बैकफुट पर आना पड़ा.

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मिडिल ईस्ट की जटिल भू-राजनीति में ईरान एक ऐसा खिलाड़ी बन चुका है, जो सीधे युद्ध से ज्यादा “रणनीतिक घेराबंदी” के जरिए अपने विरोधियों को चुनौती देता है. यही वजह है कि डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू जैसे नेता भी ईरान को लेकर बेहद सतर्क और कई बार आक्रामक नजर आए. ईरान की ताकत तीन बड़े स्तंभों पर टिकी है. वो स्तंभ हैं, मिसाइल क्षमता, ड्रोन नेटवर्क और हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर पकड़. यही “3 तिगाड़े” अमेरिका और इजराइल की रणनीति को बार-बार चुनौती देते हैं. इसका असर यह है कि डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू उसकी काट नहीं निकाल पा रहे हैं. समझें ईरान के तीन तिगाड़े में कितना है दम?

मिसाइल ताकत: कितनी दूर तक मार?

ईरान ने विगत दो दशकों में अपनी बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को तेजी से विकसित किया है. “शाहाब-3”, “सीजिल” और “खोर्रमशहर” जैसी मिसाइलें 1000 से 2000 किलोमीटर तक मार करने में सक्षम मानी जाती हैं. इसका मतलब है कि इजराइल ही नहीं, बल्कि खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकाने भी इनकी रेंज में आते हैं. न केवल आते हैं, बल्कि ईरान ने अमेरिकी सैन्य अड्डों पर मिसाइल और ड्रोन से हमला बोलकर साबित किया है कि, अमेरिका भले खुद को तीस मारखान समझे और इजरायल मॉडर्न वॉर का खिलाड़ी, वो ईरान को वेनेजुएला की तरह हाल नहीं कर सकता.

ईरान की रणनीति साफ है, अगर उस पर हमला होता है, तो वह “मल्टी-लेयर रिटालिएशन” कर सकता है. मिसाइलों की संख्या और विविधता उसे “डिटरेंस पावर” देती है, यानी दुश्मन हमला करने से पहले कई बार सोचे. यही कारण है कि इजराइल का “आयरन डोम” और अमेरिका के एयर डिफेंस सिस्टम हमेशा हाई अलर्ट पर रहते हैं.

ड्रोन वॉरफेयर: सस्ता लेकिन घातक हथियार

अगर मिसाइल ईरान की “हार्ड पावर” है, तो ड्रोन उसकी “स्मार्ट पावर” है. “शाहेद-136” जैसे आत्मघाती ड्रोन कम लागत में लंबी दूरी तक जाकर सटीक हमला करने में सक्षम हैं. इन ड्रोन का इस्तेमाल सिर्फ ईरान ही नहीं, बल्कि उसके सहयोगी समूह भी करते हैं.

यमन में हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी तेल ठिकानों पर ड्रोन हमले और इराक-सिरिया में अमेरिकी बेस पर हमले इस रणनीति का उदाहरण हैं. इससे ईरान सीधे युद्ध में शामिल हुए बिना अपने विरोधियों को नुकसान पहुंचा सकता है.

ड्रोन की सबसे बड़ी खासियत है - इन्हें रोकना मुश्किल और खर्चीला है. एक सस्ता ड्रोन महंगे एयर डिफेंस सिस्टम को चुनौती दे सकता है. यही “असिमेट्रिक वॉरफेयर” अमेरिका और इजराइल के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है.

हॉर्मुज जलडमरूमध्य: दुनिया की ऊर्जा पर पकड़

ईरान की तीसरी और सबसे रणनीतिक ताकत है उसका भूगोल. हॉर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक है. वैश्विक तेल सप्लाई का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है.

ईरान इस जलडमरूमध्य के उत्तरी किनारे पर स्थित है, जिससे उसे यहां “नेचुरल कंट्रोल” मिलता है. अगर तनाव बढ़ता है, तो ईरान जहाजों की आवाजाही बाधित कर सकता है या हमले कर सकता है. ऐसा होने पर वैश्विक तेल कीमतें आसमान छू सकती हैं और पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है.

अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए यह सिर्फ सैन्य नहीं, बल्कि आर्थिक खतरा भी है. यही वजह है कि हॉर्मुज पर किसी भी तनाव को लेकर वाशिंगटन तुरंत सक्रिय हो जाता है.

ट्रंप-नेतन्याहू बैकफुट पर क्यों?

डोनाल्ड ट्रंप ने अपने कार्यकाल में “मैक्सिमम प्रेशर” नीति अपनाई- कड़े आर्थिक प्रतिबंध और ईरान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करने की कोशिश. वहीं बेंजामिन नेतन्याहू लगातार ईरान को इजराइल के लिए अस्तित्वगत खतरा बताते रहे.

लेकिन ईरान की इन तीन ताकतों ने सीधे युद्ध को बेहद जोखिम भरा बना दिया. 2020 में ईरानी जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या के बाद भी ईरान ने सीमित लेकिन सटीक जवाब दिया, जिससे यह साफ हो गया कि वह “कैलिब्रेटेड रिटालिएशन” में सक्षम है. यानी ईरान ऐसा प्रतिरोध करता है, जिससे तनाव बना रहे लेकिन पूर्ण युद्ध की स्थिति न बने और यही रणनीति अमेरिका-इजराइल को बैकफुट पर लाती है.

ईरान की ताकत सिर्फ उसके हथियारों में नहीं, बल्कि उसकी रणनीति में छिपी है. मिसाइल उसकी “मारक शक्ति” है, ड्रोन उसकी “लचीलापन” और हॉर्मुज उसकी “वैश्विक पकड़”. यही तीनों मिलकर उसे एक ऐसा खिलाड़ी बनाते हैं, जिसे नजरअंदाज करना किसी भी महाशक्ति के लिए आसान नहीं. इसीलिए, चाहे ट्रंप हों या नेतन्याहू, ईरान के खिलाफ हर कदम बेहद सोच-समझकर उठाना पड़ता है, क्योंकि यहां छोटी गलती भी बड़े क्षेत्रीय संकट में बदल सकती है.

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