War Pause या Tactical Trap? ऐसे युद्ध रोक ईरान को अंदर ही अंदर कमजोर कर रहे हैं डोनाल्ड ट्रंप
क्या ट्रंप युद्ध टालकर Iran पर अंदरूनी दबाव बढ़ा रहे हैं? Middle East में ceasefire, sanctions और regime pressure के पीछे की पूरी रणनीति समझिए।
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के रिश्तों को लेकर एक बड़ा सवाल उठ रहा है- क्या यह सचमुच “War Pause” है या फिर डोनाल्ड ट्रंप की कोई “Tactical Trap” रणनीति? ट्रंप प्रशासन ने कई बार सीधे युद्ध से पीछे हटते हुए भी ईरान पर आर्थिक, कूटनीतिक और मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ाया. इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय राजनीति में यह बहस तेज है कि क्या अमेरिका जानबूझकर बड़े युद्ध से बचते हुए ईरान को अंदर से कमजोर करना चाहता है. तेल प्रतिबंध, आर्थिक पाबंदियां, क्षेत्रीय घेराबंदी और राजनीतिक दबाव के जरिए ईरान को थकाने की रणनीति को कई विशेषज्ञ “Maximum Pressure Doctrine” कहते हैं. सवाल यही है कि क्या ट्रंप युद्ध रोक रहे हैं, या बिना गोली चलाए लंबी रणनीतिक लड़ाई लड़ रहे हैं.
War Pause और Tactical Trap का मतलब क्या?
War Pause का मतलब ऐसा अस्थायी ठहराव है, जब दो दुश्मन देश सीधे युद्ध से पीछे हटते दिखते हैं, लेकिन तनाव खत्म नहीं होता. अमेरिका और ईरान के मामले में इसे कई एक्सपर्ट Tactical Trap भी मानते हैं. इसका अर्थ है कि युद्ध रोककर विरोधी को सैन्य नहीं बल्कि आर्थिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक दबाव में फंसाना.
डोनाल्ड ट्रंप की रणनीति अक्सर Maximum Pressure मॉडल पर आधारित रही है, जिसमें सीधे बड़े युद्ध की बजाय प्रतिबंध, तेल निर्यात रोकना, डॉलर सिस्टम से अलग करना और अंदरूनी असंतोष बढ़ाने पर फोकस रहता है. वैश्विक मामलों के जानकारों का मानना है कि यह सिर्फ शांति की कोशिश नहीं, बल्कि ईरान को धीरे-धीरे कमजोर करने का तरीका भी हो सकता है. यानी गोलीबारी कम, लेकिन दबाव लगातार जारी.
2. ट्रंप जानबूझकर युद्ध रोक रहे हैं या ये उनकी मजबूरी है?
ट्रंप का युद्ध रोकने का फैसला पूरी तरह शांति प्रेम नहीं माना जाता. इसके पीछे रणनीतिक और राजनीतिक दोनों कारण हो सकते हैं. अमेरिका लंबे युद्धों (इराक और अफगानिस्तान) की भारी आर्थिक और राजनीतिक कीमत चुका चुका है. ऐसे में ट्रंप जानते हैं कि ईरान के खिलाफ बड़ा युद्ध तेल कीमतों, अमेरिकी अर्थव्यवस्था और चुनावी माहौल को नुकसान पहुंचा सकता है.
दूसरी ओर ट्रंप खुद को Strong Negotiator की छवि में पेश करते हैं. इसलिए वे सीधे युद्ध की बजाय दबाव बनाकर ईरान को बातचीत या कमजोर स्थिति में लाना चाहते हैं. इसे मजबूरी और रणनीति दोनों का मिश्रण कहा जा सकता है. यानी ट्रंप युद्ध से बचना चाहते हैं, लेकिन दबाव छोड़ना भी नहीं चाहते. यही उनकी नीति का हिस्सा दिखाई देती है.
3. क्या ईरान को अंदर से कमजोर करने की नीति है?
विदेश मामलों के जानकारों का मानना है कि ट्रंप की ईरान नीति का बड़ा लक्ष्य सीधे सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि ईरान की आर्थिक और राजनीतिक क्षमता को अंदर से कमजोर करना है. ईरान पर ज्यादा से ज्यादा दबाव बनाकर उसके तेल निर्यात, बैंकिंग सिस्टम और विदेशी निवेश पर कठोर प्रतिबंध लगा उसकी अर्थव्यवस्था को पंगु बनाना है. इससे ईरान की मुद्रा और कमजोर होगी, महंगाई बढ़ेगी और जनता में असंतोष पैदा होगा. जब असंतोष चरम पहुंचेगा तो सत्ता परिवर्तन भी खुद ब खुद हो जाएगा.
यानी ट्रंप की रणनीति यह है कि बिना बड़े युद्ध के ईरानी सरकार पर इतना दबाव बनाया जाए कि या तो वह अमेरिकी शर्तों पर बातचीत करे या अंदरूनी संकटों में उलझ जाए. सोशल मीडिया, साइबर दबाव, क्षेत्रीय अलगाव और सहयोगी देशों के जरिए भी ईरान को घेरने की कोशिश की गई. ट्रंप मानते रहे कि आर्थिक टूटन और राजनीतिक दबाव, मिसाइल हमलों से ज्यादा असरदार हो सकते हैं.
4. ईरान को कमजोर करने की रणनीति क्या हो सकती है?
ईरान को कमजोर करने की रणनीति के तहत उस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं. तेल व्यापार पर रोक, अंतरराष्ट्रीय अलगाव और अंदरूनी असंतोष बढ़ाना शामिल है. अमेरिका कोशिश करता है कि ईरान की सरकार के पास कम राजस्व पहुंचे ताकि उसकी सैन्य और क्षेत्रीय ताकत कमजोर पड़े.
इसके अलावा, डॉलर आधारित वैश्विक वित्तीय सिस्टम से दूरी बनाकर ईरान की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाया जाता है. क्षेत्रीय सहयोगियों (इजरायल, सऊदी अरब और खाड़ी देशों) के जरिए भी रणनीतिक घेराबंदी की जाती है. लक्ष्य यह होता है कि बिना बड़े युद्ध के ईरान धीरे-धीरे आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक रूप से थक जाए.
ब्रह्मदीप अलूने: अब घरेलू राजनीति पर फोकस?
विदेश मामलों के जानकार डॉ. ब्रह्मदीप अलूने का कहना है कि मिडिल ईस्ट में ट्रंप बुरी तरह से फंस गए हैं. अब वह रुको और देखो की नीति चल रहे हैं. वह देखना चाहते हैं कि मिडिल ईस्ट की राजनीति किस दिशा में जा सकती है. क्या बदलाव संभव है. इस बात को ध्यान में रखकर वह फिर से वॉर शुरू करने की योजना को टाल रहे हैं.
ट्रंप के साथ मजबूरी यह है कि उन्हें अपने ही देश में कांग्रेस सिनेटर्स की आलोचना का शिकार होना पड़ रहा है. कांग्रेस ने उनकी सीमाएं लगभग तय कर दी है. नाटो और अन्य सहयोग देश ट्रंप की नीतियों से नाराज हैं. उन्हें इस बात का अहसास होने लगा है, अमेरिका के फैसलों से सभी सहयोगी पीछे छूट गए. यही वजह है कि ईरान हावी होने की कोशिश कर रहा है. ऐसे में वह कुछ समय बाद होर्मुज की नाकेबंदी हटा सकते हैं.
फिर ट्रंप जो शर्त ईरान पर थोपना चाहते हैं, उसे वो मानने के लिए तैयार नहीं है. यही ट्रंप की सबसे बड़ी समस्या है. इस बात को ध्यान रखते हुए वो अब घरेलू मसलों और ईरान के साथ विवाद से बच निकलने का रास्ता ढूंढ रहे है.




