China का 'डूम्सडे प्लान'? रेगिस्तान में न्यूक्लियर साइट, 80 लॉन्च पैड और गुप्त ठिकानों ने बढ़ाई Trump की बेचैनी
चीन के रेगिस्तान में 80 लॉन्च पैड, न्यूक्लियर साइट और गुप्त सैन्य ठिकानों ने नई बहस छेड़ दी है. क्या बीजिंग अपनी परमाणु प्रतिरोधक क्षमता को नए स्तर पर ले जा रहा है?
चीन के नॉर्थ वेस्ट रेगिस्तानी इलाके में चल रही एक विशाल सैन्य निर्माण परियोजना ने दुनिया के रक्षा विशेषज्ञों का ध्यान अपनी ओर खींचते हुए टेंशन में डाल दिया है. ऐसा इसलिए कि ड्रैगन अमेरिकी की ओर से पहले न्यूक्लियर हमले का जवाब देने के लिए एक ऐसे प्लान पर काम कर रहा है, जिसने ट्रंप को टेंशन में डाल दिया है. हाल ही में सामने आई सैटेलाइट तस्वीरों से संकेत मिलता है कि बीजिंग अपने परमाणु ढांचे को पहले के मुकाबले कहीं अधिक मजबूत और टिकाऊ बनाने में जुटा है. डिफेंस एक्सपर्ट का कहना है कि पूरी परियोजना का मुख्य मकसद यह सुनिश्चित करना है कि यदि किसी संघर्ष की स्थिति में अमेरिका चीन की परमाणु सुविधाओं पर पहला हमला भी कर दे, तब भी चीन जवाबी परमाणु कार्रवाई कर सके
चीन के पास पहले से ऐसी अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलें (ICBM) मौजूद हैं जो अमेरिका के किसी भी हिस्से तक पहुंच सकती हैं. लेकिन अब बीजिंग केवल मिसाइलों की संख्या पर नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षित रखने और हर परिस्थिति में संचालित करने वाले नेटवर्क पर भी भारी निवेश करता दिखाई दे रहा है.
80 लॉन्च पैड और रहस्यमयी अष्टकोणीय बिल्डिंग का राज क्या?
टीओआई ने रॉयटर्स के हवाले से बताया है कि सैटेलाइट इमेज के अनुसार, चीन ने हामी परमाणु मिसाइल साइलो क्षेत्र के आसपास 80 से अधिक लॉन्च पैड विकसित किए हैं. इसके अलावा, तीन बड़ी अष्टकोणीय संरचनाएं भी बनाई गई हैं, जिनका मकसद अभी आधिकारिक रूप से स्पष्ट नहीं है.
डिफेंस एक्सपर्ट के मुताबिक इन लॉन्च पैड का इस्तेमाल मोबाइल मिसाइल लॉन्चर, वायु रक्षा प्रणालियों और सामरिक सैन्य अभियानों के लिए किया जा सकता है. वहीं अष्टकोणीय संरचनाएं सैन्य संचार, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, कमांड एंड कंट्रोल और मिसाइल संचालन से जुड़े महत्वपूर्ण कार्यों के लिए बनाई गई हो सकती हैं.
इन निर्माणों का सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे चीन के परमाणु ढांचे को एक ही स्थान पर निर्भर रहने के बजाय कई स्तरों पर फैला और सुरक्षित बना सकते हैं.
पहले न्यूक्लियर हमले के बाद भी जवाब देने की क्षमता
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार यह परियोजना केवल नए ठिकाने बनाने की कवायद नहीं है, बल्कि चीन की "सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी" को मजबूत करने का प्रयास है. यानी यदि दुश्मन पहले हमला कर चीन के कुछ परमाणु ठिकानों को नष्ट भी कर दे, तब भी चीन के पास इतना परमाणु ढांचा और हथियार मौजूद रहें कि वह प्रभावी जवाबी हमला कर सके.
हवाई स्थित पैसिफिक फोरम के एडजंक्ट फेलो अलेक्जेंडर नील के अनुसार यह निर्माण कार्य हजारों वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ दिखाई देता है. उनके मुताबिक चीन अपनी रणनीतिक परमाणु प्रतिरोधक क्षमता को नई ऊंचाई पर ले जाने की कोशिश कर रहा है, जिससे उसकी परमाणु ताकत अधिक विविध और टिकाऊ बन सके.
अमेरिकी सुपरमैन बेचैन क्यों?
अमेरिका के रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने हाल ही में सिंगापुर में आयोजित शांगरी-ला डायलॉग के दौरान चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों पर चिंता जताई. उन्होंने कहा कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र के कई देश चीन की सैन्य तैयारियों को लेकर चिंतित हैं और उसकी गतिविधियों पर लगातार नजर रखे हुए हैं.
हेगसेथ ने कहा कि चीन की सैन्य क्षमताओं में तेजी से हो रहा विस्तार केवल एशिया ही नहीं बल्कि वैश्विक रणनीतिक संतुलन के लिए भी चिंता का विषय बन रहा है. हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका चीन के साथ किसी अनावश्यक टकराव की स्थिति नहीं चाहता और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने के पक्ष में है.
इसके बावजूद अमेरिकी रणनीतिक समुदाय में यह चिंता बढ़ रही है कि चीन अपनी सैन्य और परमाणु क्षमताओं को जितनी तेजी से विकसित कर रहा है, उससे भविष्य में शक्ति संतुलन बदल सकता है.
क्यों अलग है चीन का मॉडल?
अमेरिका और रूस आज भी दुनिया की दो सबसे बड़ी परमाणु शक्तियां हैं. उनके पास चीन की तुलना में कहीं अधिक परमाणु वॉरहेड और तैनात हथियार मौजूद हैं. लेकिन आम तौर पर वे अपने परमाणु ठिकानों के आसपास इतने बड़े पैमाने पर रक्षा ढांचे का निर्माण नहीं करते.
दोनों देश मुख्य रूप से बड़ी संख्या में मिसाइल साइलो, मजबूत बंकरों और दूरस्थ ठिकानों पर निर्भर रहते हैं. इसके मुकाबले चीन मिसाइल साइलो, मोबाइल लॉन्चर, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमता और बहुस्तरीय रक्षा नेटवर्क को एक साथ विकसित करता दिखाई दे रहा है. यही वजह है कि कई विशेषज्ञ इस परियोजना को अन्य परमाणु शक्तियों के मॉडल से अलग और कहीं अधिक महत्वाकांक्षी मान रहे हैं.
एक्सपर्ट भी हैरान, बोले- पहले कभी नहीं देखा ऐसा
परमाणु कार्यक्रमों पर लंबे समय से नजर रखने वाले एनालिस्ट हंस क्रिस्टेंसन ने चीन के इस विस्तारवादी नीति को असाधारण करार दिया है. उनके मुताबिक लॉन्च साइटों, सहायक सुविधाओं और रक्षा ढांचे का जिस गति से विस्तार हो रहा है, वह अभूतपूर्व है.
क्रिस्टेंसन ने कहा कि उन्होंने अपने करियर में पहले कभी इतनी व्यापक और महत्वाकांक्षी परियोजना नहीं देखी. उनके अनुसार यह केवल बुनियादी ढांचा नहीं बल्कि चीन की दीर्घकालिक सामरिक सोच का संकेत है.
क्या सचमुच 'डूम्सडे प्लान' पर काम कर रहा है चीन?
हालांकि, पश्चिमी मीडिया में इस परियोजना को कई जगह "डूम्सडे प्लान" जैसे शब्दों से जोड़ा जा रहा है, लेकिन चीन आधिकारिक रूप से खुद को एक रक्षात्मक परमाणु शक्ति बताता है. बीजिंग लगातार कहता रहा है कि उसकी परमाणु नीति आक्रामक नहीं बल्कि प्रतिरोध आधारित है.
चीन की घोषित नीति "नो फर्स्ट यूज" यानी पहले परमाणु हथियार का इस्तेमाल न करने की है. इसका मतलब है कि चीन दावा करता है कि वह केवल तब परमाणु जवाब देगा जब उस पर पहले हमला किया जाएगा.
यही कारण है कि कई विशेषज्ञ इस पूरे निर्माण अभियान को परमाणु युद्ध शुरू करने की तैयारी के बजाय परमाणु हमले के बाद भी जवाब देने की क्षमता को मजबूत करने वाली रणनीति के रूप में देखते हैं.
ताइवान बना सबसे बड़ा टेंशन सेंटर
चीन और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के केंद्र में ताइवान का मुद्दा है. बीजिंग ताइवान को अपने क्षेत्र का हिस्सा मानता है, जबकि ताइवान की लोकतांत्रिक सरकार इस दावे को खारिज करती है.
पश्चिमी देशों को आशंका है कि यदि भविष्य में ताइवान को लेकर कोई बड़ा सैन्य टकराव होता है तो चीन अपनी बढ़ती परमाणु क्षमता का इस्तेमाल रणनीतिक दबाव बनाने के लिए कर सकता है. इसी वजह से चीन के परमाणु विस्तार को केवल सैन्य आधुनिकीकरण नहीं बल्कि ताइवान संकट के संदर्भ में भी देखा जा रहा है.
हाल ही में राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को चेतावनी दी थी कि ताइवान मुद्दे को गलत तरीके से संभालने पर दोनों देश एक खतरनाक स्थिति की ओर बढ़ सकते हैं.
क्या बदल रहा है ग्लोबल न्यूक्लियर बैलेंस?
शिनजियांग और गांसु प्रांत में फैले नए मिसाइल साइलो, 80 से अधिक लॉन्च पैड, अष्टकोणीय सैन्य ठिकाने और विशाल रक्षा नेटवर्क इस बात का संकेत हैं कि चीन केवल अपनी सेना का आधुनिकीकरण नहीं कर रहा, बल्कि वह दीर्घकालिक रणनीतिक प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर रहा है.
ऐसे समय में जब अमेरिका और चीन के बीच व्यापार, तकनीक, दक्षिण चीन सागर और ताइवान जैसे मुद्दों पर तनाव लगातार बढ़ रहा है, चीन की यह नई परमाणु तैयारी आने वाले वर्षों में वैश्विक शक्ति संतुलन और सुरक्षा ढांचे को गहराई से प्रभावित कर सकती है. यही वजह है कि बीजिंग के रेगिस्तान में बन रहा यह नेटवर्क अब केवल चीन का सैन्य प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी सामरिक बहसों में से एक बन चुका है.




