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किरायेदार की मौत के बाद को-टेनेंट नहीं होगा कानूनी वारिस, जानें राजस्थान HC ने अपने फैसले में क्या कहा

राजस्थान हाई कोर्ट ने किरायेदारी पर एक आदेश पारित किया है. जिसमें उसने साफ किया है कि अहम किरायेदार की मौत के बाद कानूनी वारिस को-टेनेंट नहीं बनते हैं, बल्कि जॉइंट टेनेंट के तौर पर अधिकार प्राप्त करते हैं.

किरायेदार की मौत के बाद को-टेनेंट नहीं होगा कानूनी वारिस, जानें राजस्थान HC ने अपने फैसले में क्या कहा
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( Image Source:  AI GENERATED IMAGE- SORA )
समी सिद्दीकी
Edited By: समी सिद्दीकी

Updated on: 12 Feb 2026 9:17 AM IST

Rajasthan Court on Tenant: राजस्थान हाईकोर्ट ने 77 साल पुराने किरायेदारी विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए साफ किया है कि किसी किरायेदार की मौत के बाद उसके कानूनी वारिस को-टेनेंट नहीं बनते हैं, बल्कि जॉइंट टेनेंट के तौर पर अधिकार प्राप्त करते हैं.

न्यायमूर्ति बिपिन गुप्ता ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि किसी एक ज्वाइंट किरायेदार के खिलाफ बेदखली का डिक्री (आदेश) पारित हो जाती है, तो वह सभी पर लागू होगा. अदालत ने बेदखली डिक्री की तामील (एक्जीक्यूशन) को चुनौती देने वाली याचिका खारिज करते हुए किरायेदारों को बेदखल करने का आदेश बरकरार रखा.

क्या है पूरा मामला?

यह विवाद 15 फरवरी 1949 से जुड़ा है, जब स्वर्गीय बालकिशन (वर्तमान मकान मालिकों के पिता) ने संपत्ति स्वर्गीय जमनालाल और स्वर्गीय बंशीधर को 5 रुपये मासिक किराए पर दी थी. मूल किरायेदारों की मौत के बाद उनके परिवार के सदस्य परिसर में रहना जारी रखे. बाद में मकान मालिकों ने राजस्थान रेंट कंट्रोल एक्ट, 2001 की धारा 9 के तहत बेदखली याचिका दायर की.

16 जनवरी 2016 को रेंट ट्रिब्यूनल ने मकान मालिकों के पक्ष में बेदखली डिक्री पारित की. इस डिक्री को प्रतिवादियों ने चुनौती नहीं दी और यह अंतिम हो गई. डिक्री के पालन करने के दौरान स्वर्गीय विमल कुमार सेठी (मूल किरायेदारों में से एक के पोते) के कानूनी वारिसों ने सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के आदेश 21 नियम 97 और धारा 47 के तहत आपत्ति दाखिल की.

उन्होंने दावा किया कि वे मूल सह-किरायेदारों के उत्तराधिकारी हैं और उन्हें बेदखली कार्यवाही में पक्षकार नहीं बनाया गया है. इसलिए डिक्री उनके खिलाफ लागू नहीं की जा सकती. उन्होंने 2001 अधिनियम की धारा 2(आई) के तहत खुद को 'को-टेनेंट' बताया.

किरायेदारी पर कोर्ट ने क्या कहा?

7 फरवरी को दिए गए आदेश में हाईकोर्ट ने कहा, “याचिकाकर्ताओं की यह आपत्ति कि उन्हें पक्षकार न बनाए जाने के कारण डिक्री लागू नहीं की जा सकती, गलत है. एक ज्वाइंट किरायेदार के खिलाफ बेदखली डिक्री (बेदखली आदेश) पारित होने के बाद वह उन सभी पर लागू होती है, जो उसी किरायेदारी के तहत कब्जा रखते हैं, भले ही उन्हें अलग से पक्षकार न बनाया गया हो."

किरायेदार के मरने के बाद वारिस को क्या मिलेगा अधिकार?

अदालत ने कहा कि किरायेदार की मृत्यु के बाद उसके कानूनी वारिसों को अलग-अलग या स्वतंत्र किरायेदारी अधिकार नहीं मिलते. वे मृत किरायेदार के स्थान पर संयुक्त रूप से अधिकार प्राप्त करते हैं. संयुक्त किरायेदारी अविभाज्य (इंडिविज़िबल) होती है और इससे कई अलग-अलग किरायेदारियां पैदा नहीं होतीं.

  • अदालत ने 'को-टेनेंट' और 'जॉइंट टेनेंट' के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि को-टेनेंट अपने अधिकार स्वतंत्र रूप से प्राप्त करते हैं, जबकि संयुक्त किरायेदार सामूहिक रूप से एक ही किरायेदारी का प्रतिनिधित्व करते हैं.
  • ज्वाइंट किरायेदारी के मामलों में किसी एक संयुक्त किरायेदार को नोटिस देना या उसके खिलाफ बेदखली की कार्यवाही शुरू करना पर्याप्त होता है, और उस पर पारित डिक्री सभी पर बाध्यकारी होती है.
  • अदालत ने यह भी कहा कि मरने वाला किरायेदार का हर वारिस खुद किरायेदार नहीं बन जाता और हर कोई किरायेदारी संरक्षण का दावा नहीं कर सकता.
  • कोर्ट में चल रहे मामले विमल कुमार सेठी के उत्तराधिकारियों के रूप में याचिकाकर्ता 2001 के अधिनियम की धारा 2(आई) में दिए गए 'किरायेदार' की परिभाषा में नहीं आते. इसलिए उन्हें बेदखली कार्यवाही में पक्षकार बनाना जरूरी नहीं था.
  • मूल सह-किरायेदारों (जो मेन किरायदार के साथ रह रहे हैं) के कुछ उत्तराधिकारियों के खिलाफ डिक्री का पालन कानूनी रूप से वैध है. याचिकाकर्ता मूल किरायेदार या पहले से पक्षकार बनाए गए उत्तराधिकारियों से अधिक या स्वतंत्र दर्जा नहीं मांग सकते.

मौखिक बिक्री का दावा खारिज

याचिकाकर्ताओं ने यह भी दावा किया कि मकान मालिक के पिता ने उनके पूर्वजों से लिए गए कर्ज के कारण संपत्ति मौखिक रूप से बेच दी थी. अदालत ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया. अदालत ने कहा कि अचल संपत्ति का ट्रांसफर डॉक्यूमेंट्स के जरिए ही संभव है.

अदालत ने पाया कि इस मामले में न तो कोई साफ कानूनी गलती है और न ही क्षेत्राधिकार संबंधी गलती. निचली अदालतों के निष्कर्ष कानून और तथ्यों के सही मूल्यांकन पर आधारित हैं, इसलिए हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है.

कोर्ट का क्या है आखिरी फैसला?

हाईकोर्ट ने रेंट ट्रिब्यूनल और अपीलीय रेंट ट्रिब्यूनल के निष्कर्षों में कोई गलती न पाते हुए रिट याचिका खारिज कर दी. हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई पहले फैसलों का जिक्र भी किया.

इस मामले में रेंट ट्रिब्यूनल ने 2 दिसंबर 2019 को उनकी आपत्ति खारिज कर दी थी और 24 फरवरी 2020 को अपीलीय रेंट ट्रिब्यूनल ने भी इसे बरकरार रखा था. इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था.

किरायदार के मामले में अदालत ने क्या कहा?

अदालत ने कहा कि जब निचली अदालतों के तथ्यात्मक निष्कर्ष एकसमान हों, तो ऑब्ज़रवेशन के राइट का इस्तेमाल केवल स्पष्ट अवैधता, क्षेत्राधिकार की त्रुटि या मूल सिद्धांतों के गंभीर उल्लंघन की कंडीशन में ही किया जा सकता है. सा

2001 कानून में बदलाव का असर

याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट में पिटीशन दायर करते हुए 1950 के पुराने कानून के एक फैसले का हवाला दिया था. हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि 1950 के राजस्थान प्रिमाइसेस (कंट्रोल ऑफ रेंट एंड एविक्शन) एक्ट में ‘वारिस’ शब्द किरायेदार की परिभाषा में शामिल था. लेकिन राजस्थान रेंट कंट्रोल एक्ट, 2001 में 'वारिस' शब्द जानबूझकर हटा दिया गया था. इससे यह मंशा साफ होती है कि हर वारिस को किरायेदारी का अधिकार नहीं दिया जाए.

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