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ब्राह्मणों को भी मिले आरक्षण! रिटायर्ड IAS Niyaz Khan की मांग पर बवाल, सोशल पर गाली दे रहे लोग

आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर रिटायर्ड IAS अधिकारी नियाज खान की सोशल मीडिया पोस्ट ने राजनीतिक और सामाजिक हलकों में हलचल मचा दी है.

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IAS Niyaz Khan

( Image Source:  X/ @saifasa )
विशाल पुंडीर
Edited By: विशाल पुंडीर

Published on: 1 Feb 2026 7:48 PM

आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर एक बार फिर देशभर में बहस तेज हो गई है. इस बार चर्चा की वजह बने हैं मध्य प्रदेश कैडर के रिटायर्ड आईएएस अधिकारी नियाज खान, जिनकी सोशल मीडिया पोस्ट ने राजनीतिक और सामाजिक हलकों में हलचल मचा दी है. उनकी मांग ने न सिर्फ आरक्षण की सीमाओं पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि सामान्य वर्ग और EWS को लेकर चल रही बहस को भी नए सिरे से हवा दी है.

नियाज खान ने ब्राह्मण समाज के लिए आबादी के अनुपात में आरक्षण की बात कही है. उनका तर्क है कि यह मांग सिर्फ सम्मान की नहीं, बल्कि संवैधानिक और आर्थिक समर्थन से जुड़ी है. बयान सामने आते ही सोशल मीडिया पर समर्थन और विरोध दोनों की बाढ़ आ गई और मामला एक बार फिर जाति, नीति और संविधान के टकराव तक पहुंच गया.

बयान से शुरू हुई नई बहस

नियाज खान की पोस्ट के बाद आरक्षण को लेकर नई बहस छिड़ गई है. एक तरफ इसे सामाजिक सशक्तिकरण की मांग बताया जा रहा है, तो दूसरी ओर इसे मौजूदा आरक्षण नीति के खिलाफ माना जा रहा है. यह बयान ऐसे समय आया है, जब आरक्षण पर पहले से ही राजनीतिक तापमान ऊंचा है.

क्या है आरक्षण को लेकर उनकी मूल मांग?

नियाज खान के मुताबिक ब्राह्मण समाज को सिर्फ सांस्कृतिक सम्मान नहीं, बल्कि ठोस नीतिगत समर्थन चाहिए. उन्होंने सरकारी योजनाओं, शिक्षा और रोजगार में आबादी के अनुपात में आरक्षण देने की बात कही है, ताकि समाज का “सर्वांगीण विकास” हो सके.

सनातन धर्म से जोड़कर रखा तर्क

अपने बयान में नियाज खान ने ब्राह्मणों को सनातन धर्म का हजारों वर्षों से संरक्षक बताया. उनका कहना है कि अगर यह समाज मजबूत होगा, तो देश, धर्म और आध्यात्मिक व्यवस्था भी मजबूत होगी. इसी आधार पर उन्होंने आरक्षण पर “गंभीरता से विचार” करने की अपील की.

EWS आरक्षण के बीच अलग मांग क्यों अहम?

सामान्य वर्ग के लिए पहले से ही EWS आरक्षण लागू है. ऐसे में ब्राह्मण समाज के लिए अलग से आरक्षण की मांग को कई लोग मौजूदा संवैधानिक ढांचे से जोड़कर देख रहे हैं. यही वजह है कि यह बयान कानूनी और नीतिगत सवालों को जन्म दे रहा है.

सोशल मीडिया पर दो धड़ों में बंटी राय

इस मुद्दे पर सोशल मीडिया साफ तौर पर दो हिस्सों में बंटा दिखा. समर्थकों का कहना है कि ब्राह्मण समाज भी आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है, जबकि विरोधियों ने इसे जातिगत राजनीति और समाज को बांटने वाला कदम बताया.

राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं

नियाज खान के बयान पर भाजपा, कांग्रेस समेत अन्य दलों से भी प्रतिक्रियाएं आई हैं. कुछ नेताओं ने इसे निजी राय बताया, तो कुछ ने इसे सामाजिक सौहार्द के लिए नुकसानदायक करार दिया. फिलहाल किसी दल ने इस मांग को खुला समर्थन नहीं दिया है.

आरक्षण नीति से टकराव का सवाल

भारत में आरक्षण का उद्देश्य सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को मुख्यधारा में लाना रहा है. ब्राह्मण समाज परंपरागत रूप से सामान्य वर्ग में आता है, इसलिए आबादी के आधार पर आरक्षण की मांग मौजूदा नीति से टकराती नजर आती है.

पुराने बयानों से जुड़ता नया विवाद

यह पहली बार नहीं है जब नियाज खान अपने बयानों को लेकर चर्चा में आए हों. इससे पहले भी वे ब्राह्मण समाज की भूमिका पर लिखी अपनी किताब और सोशल मीडिया पोस्ट्स के चलते विवादों में रहे हैं. उनकी नई मांग ने एक बार फिर आरक्षण, सामाजिक संतुलन और संवैधानिक सीमाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

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