‘NEP 2020 छलावा!’ जामिया PG छात्रों की मांग - समझ नहीं आती अंग्रेजी, हिंदी-उर्दू में पढ़ाओ, क्या बदलेगी पॉलिसी?
जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में PG छात्रों ने NEP 2020 को लेकर सवाल उठाए. हिंदी-उर्दू में परीक्षा मीडियम के प्रस्ताव पर क्या बदलेगी भाषा नीति? जानें पूरा विवाद.
भारत में नई शिक्षा नीति 2020 से लागू है, लेकिन जामिया में पीजी की पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए पिछले छह सालों से यह सिर्फ छलावा साबित हो रहा है. इससे परेशान छात्रों ने अब हिंदी और उर्दू में भी पढ़ाई कराने के लिए व्यवस्था की जोरदार मांग की है. उसके बाद से जामिया मिलिया इस्लामिया (JMI) विश्वविद्यालय में पोस्टग्रेजुएट स्तर पर पढ़ाई और परीक्षा के माध्यम को लेकर नई बहस शुरू हो गई है. एमए पॉलिटिकल साइंस के छात्रों की शिकायत के बाद यूनिवर्सिटी की एकेडमिक काउंसिल में यह प्रस्ताव रखा गया कि PG स्तर पर हिंदी और उर्दू को औपचारिक रूप से पढ़ाई और परीक्षा का माध्यम बनाया जाए. यह मुद्दा 12 फरवरी की बैठक में चर्चा के लिए आया.
मामला क्या है और विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
जामिया एमए पॉलिटिकल साइंस के फर्स्ट ईयर के छात्र कैफ, जिन्होंने छत्तीसगढ़ की एक सरकारी यूनिवर्सिटी से हिंदी माध्यम में ग्रेजुएशन किया है, ने बताया कि PG में आने के बाद उन्हें अंग्रेजी प्रश्नपत्र समझने में कठिनाई हुई. उनका कहना है कि परीक्षा में सवालों का जवाब देने से अधिक समय उन्हें सवालों को समझने और अनुवाद करने में लग गया.
कैफ अकेले नहीं हैं. हिंदी माध्यम से पढ़कर आए कई छात्रों ने एकेडमिक काउंसिल को प्रतिनिधित्व भेजकर कहा कि अचानक अंग्रेजी को अनिवार्य माध्यम बनाने से उनकी समझ और प्रदर्शन पर असर पड़ रहा है.
छात्रों की मुख्य मांग क्या है?
छात्रों की मांग है कि पोस्टग्रेजुएट स्तर पर हिंदी और उर्दू में भी प्रश्नपत्र उपलब्ध कराए जाएं और उत्तर लिखने की व्यवस्था व्यावहारिक रूप से सुनिश्चित की जाए. प्रस्ताव में कहा गया कि अधिकांश छात्रों ने स्नातक स्तर पर हिंदी में पढ़ाई की है, इसलिए PG में अचानक अंग्रेजी माध्यम लागू होने से उन्हें कठिनाई होती है. भाषा की बाधा उनके आत्मविश्वास और परीक्षा परिणाम दोनों को प्रभावित कर सकती है.
विश्वविद्यालय प्रशासन का क्या कहना है?
सोशल साइंसेज के डीन ने जवाब में माना कि तकनीकी रूप से छात्रों को अंग्रेजी, हिंदी और उर्दू में उत्तर लिखने की इजाजत है, लेकिन व्यावहारिक समस्या यह है कि सभी विभागों में ऐसे शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं जो हिंदी या उर्दू में पढ़ा सकें या उन भाषाओं में लिखी उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन कर सकें. यही कारण है कि अधिकांश शिक्षण और मूल्यांकन अंग्रेजी में ही होता है.
नियम क्या कहते हैं?
जेएमआई यूनिवर्सिटी के नियमों के अनुसार, सभी स्तरों पर उर्दू और हिंदी को भी मान्यता प्राप्त है, लेकिन पढ़ाई सिर्फ अंग्रेजी में होती है. जबकि उर्दू और हिंदी में भी पढ़ाई और परीक्षा संभव है, लेकिन इसके लिए एकेडमिक काउंसिल की मंजूरी आवश्यक है. यह व्यवस्था नई शिक्षा नीति 2020 के खिलाफ है. नियम में बताया गया है कि साइंस, टेक्निकल और प्रोफेशनल कोर्स में माध्यम अंग्रेजी ही रहेगा.
विडंबना यह है कि एडमिशन के समय छात्रों से उनकी पसंदीदा भाषा भी पूछी जाती है, लेकिन छात्रों का आरोप है कि जमीनी हकीकत यह है कि यह व्यवस्था पूरी तरह लागू नहीं है. प्रोफेसर उन्हें उर्दू या हिंदी में नहीं पढ़ाते. प्रश्न पत्र को भी ट्रांसलेट करना होता है.
क्या यह प्रस्ताव NEP से जुड़ा है?
डॉक्यूमेंट में स्पष्ट किया गया है कि यूनिवर्सिटी ने 2024-25 से FYUP लागू कर दिया है और 2026-27 से PG प्रोग्राम में NEP लागू होगा. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 उच्च शिक्षा में मातृभाषा और भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने की वकालत करती है. नीति के अनुसार, संस्थानों को स्थानीय या द्विभाषी प्रोग्राम चलाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है ताकि छात्रों की समझ बेहतर हो और समावेशन बढ़े.
जमीनी चुनौतियां क्या हैं?
एमए पॉलिटिकल साइंस के सेकंड ईयर छात्र समीर का कहना है कि कागज पर तीन भाषाओं की नीति है, लेकिन उसे लागू करने का ढांचा मजबूत नहीं है. ज्यादातर फैकल्टी अंग्रेजी में पढ़ाती है. अगर कोई छात्र उर्दू में उत्तर लिखता है, तो कई बार उत्तर पुस्तिका को दूसरे विभाग में अनुवाद के लिए भेजना पड़ता है. एक फैकल्टी सदस्य ने बताया कि हर विभाग में तीनों भाषाओं के विशेषज्ञ रखना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है, खासकर जब विषय-विशेष मूल्यांकन की बात आती है.
क्या मंजूरी मिलने पर बड़ा बदलाव होगा?
अगर प्रस्ताव मंजूर होता है, तो यह पोस्टग्रेजुएट स्तर पर भाषा नीति में बड़ा बदलाव माना जाएगा. इसके लिए यूनिवर्सिटी को बहुभाषी विशेषज्ञ फैकल्टी की नियुक्ति करनी होगी और मूल्यांकन की स्पष्ट व्यवस्था बनानी होगी. यह कदम एक ओर छात्रों की भाषाई सुविधा बढ़ा सकता है, तो दूसरी ओर प्रशासनिक और अकादमिक चुनौतियां भी खड़ी कर सकता है.
दरअसल, जामिया में हिंदी और उर्दू को PG माध्यम के रूप में लागू करने का प्रस्ताव भाषा और शिक्षा के बीच संतुलन बनाने की कोशिश है. एक तरफ मातृभाषा में शिक्षा का सवाल है, तो दूसरी तरफ अकादमिक गुणवत्ता और मूल्यांकन की व्यावहारिक व्यवस्था की चुनौती. आने वाले समय में एकेडमिक काउंसिल का फैसला यह तय करेगा कि विश्वविद्यालय किस दिशा में आगे बढ़ेगा?





