Tadmetla Maoist Attack Case में शामिल सभी आरोपियों को हाईकोर्ट ने क्यों किया बरी? 2010 में 76 जवान हुए थे शहीद
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 2010 के ताड़मेटला नक्सली हमले मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए सभी आरोपियों की रिहाई बरकरार रखी है. इस हमले में 76 जवान शहीद हुए थे. कोर्ट ने कहा कि सबूतों की कमी और जांच में खामियों के कारण अभियोजन पक्ष आरोप साबित नहीं कर पाया.
Tadmetla Maoist Attack Case Chattisgarh High Court Verdict: छत्तीसगढ़ के चर्चित ताड़मेटला माओवादी हमला मामले में हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने 2013 में निचली अदालत के बरी करने के फैसले को सही ठहराते हुए राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी. यह वही हमला था जिसने साल 2010 में पूरे देश को हिला दिया था.
दंतेवाड़ा जिले के ताड़मेटला जंगल में नक्सलियों ने सुरक्षाबलों पर घात लगाकर हमला किया था, जिसमें 76 जवान शहीद हो गए थे. इनमें 75 जवान CRPF के और एक जवान राज्य पुलिस का था. इसे देश के इतिहास के सबसे बड़े माओवादी हमलों में गिना जाता है.
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में क्या कहा?
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि मामले में प्रत्यक्ष सबूत पर्याप्त नहीं थे. परिस्थितिजन्य साक्ष्य भी पूरी तरह आरोपियों को दोषी साबित नहीं कर सके. कोर्ट ने जांच प्रक्रिया में कई खामियों का जिक्र करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों का दोष 'उचित संदेह से परे' साबित करने में नाकाम रहा.
नक्सलियों ने जवानों पर की ताबड़तोड़ फायरिंग
यह हमला 6 अप्रैल 2010 को दंतेवाड़ा जिले के चिंतागुफा थाना क्षेत्र के ताड़मेटला गांव के जंगलों में हुआ था. CRPF की 62वीं बटालियन और राज्य पुलिस के जवान सर्च ऑपरेशन पर निकले थे. इसी दौरान घात लगाए बैठे नक्सलियों ने जवानों को चारों तरफ से घेर लिया और ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी. घंटों चली इस मुठभेड़ में सुरक्षाबलों को भारी नुकसान उठाना पड़ा. हमले की जिम्मेदारी माओवादियों की पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (PLGA) ने ली थी.
7 जनवरी को सत्र अदालत ने सभी आरोपियों को किया बरी
घटना के बाद जांच एजेंसियों ने 10 लोगों को गिरफ्तार किया था. उनके खिलाफ कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की गई, लेकिन 7 जनवरी 2013 को दंतेवाड़ा की सत्र अदालत ने सभी आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था. इसके खिलाफ राज्य सरकार हाईकोर्ट पहुंची थी, लेकिन अब हाईकोर्ट ने भी निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा है. इस फैसले के बाद एक बार फिर देश के सबसे बड़े नक्सली हमलों में जांच और सबूत जुटाने की प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो गए हैं.




