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जेडीयू से नहीं मिला जवाब, क्‍या बीजेपी के घोड़े पर बैठ विधान परिषद जाएंगे तेज प्रताप यादव? दही-चूड़ा की थाली से निकला सियासी संदेश

मकर संक्रांति पर पटना में हुए दही-चूड़ा आयोजनों ने बिहार की राजनीति में नए संकेत दे दिए हैं. तेज प्रताप यादव के कार्यक्रम में लालू प्रसाद यादव की मौजूदगी को पारिवारिक और राजनीतिक सुलह के संकेत के रूप में देखा जा रहा है. वहीं तेज प्रताप के बीजेपी नेताओं से बढ़ते मेल-जोल और ‘किसी भी जिम्मेदारी को स्वीकार करने’ वाले बयान ने उनके NDA की ओर झुकाव की अटकलों को और तेज कर दिया है.

जेडीयू से नहीं मिला जवाब, क्‍या बीजेपी के घोड़े पर बैठ विधान परिषद जाएंगे तेज प्रताप यादव? दही-चूड़ा की थाली से निकला सियासी संदेश
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( Image Source:  ANI )
प्रवीण सिंह
Edited By: प्रवीण सिंह

Published on: 15 Jan 2026 10:03 AM

बिहार की राजनीति में मकर संक्रांति के मौके पर होने वाला दही-चूड़ा भोज हमेशा से सिर्फ एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि यह नेताओं के बीच रिश्तों, समीकरणों और आने वाले राजनीतिक बदलावों का मंच भी रहा है. इस बार पटना में दही-चूड़ा कार्यक्रम के बहाने जो तस्वीर उभरी, उसने राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के भीतर चल रही खींचतान, तेज प्रताप यादव के भविष्य और लालू प्रसाद यादव के बदले रुख को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है.

इंडियन एक्‍सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, मकर संक्रांति के मौके पर पटना में आयोजित अपने दही-चूड़ा कार्यक्रम के दौरान जनशक्ति जनता दल (JJD) के प्रमुख तेज प्रताप यादव ने बिना किसी पार्टी का नाम लिए कहा कि उन्हें जो भी जिम्मेदारी दी जाएगी, वह उसे स्वीकार करने के लिए तैयार हैं. यह बयान ऐसे समय आया है, जब यह अटकलें तेज हैं कि तेज प्रताप भारतीय जनता पार्टी (BJP) के करीब जा सकते हैं या फिर उन्हें विधान परिषद (MLC) भेजे जाने की तैयारी हो सकती है.

तेज प्रताप के कार्यक्रम में दिखी सियासी हलचल

तेज प्रताप के दही-चूड़ा कार्यक्रम में बिहार के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान, उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा, राज्य मंत्री राम कृपाल यादव और अशोक चौधरी जैसे कई बड़े चेहरे मौजूद थे. लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की रही कि खुद RJD सुप्रीमो और तेज प्रताप के पिता लालू प्रसाद यादव भी इस कार्यक्रम में शामिल हुए. यह उपस्थिति इसलिए भी अहम मानी जा रही है, क्योंकि मई 2024 में तेज प्रताप को न सिर्फ पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया गया था, बल्कि पारिवारिक रिश्ते तोड़ने तक की बात सामने आई थी.

इसके उलट, तेज प्रताप के छोटे भाई और बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव को इस कार्यक्रम का न्योता दिए जाने के बावजूद वे इसमें शामिल नहीं हुए. इससे यह संकेत भी मिला कि परिवार और पार्टी के भीतर सब कुछ अभी सामान्य नहीं हुआ है.

Photo Credit: ANI

लालू की मौजूदगी के मायने

हालांकि लालू प्रसाद यादव ने कार्यक्रम में मीडिया से कोई बातचीत नहीं की, लेकिन उनकी मौजूदगी ने ही कई संदेश दे दिए. राजनीतिक हलकों में इसे तेज प्रताप के साथ सुलह की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है. उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा ने भी कहा, “आखिर वे पिता-पुत्र हैं. त्योहारों पर परिवार को एक साथ होना चाहिए.” यह बयान भी अपने आप में सियासी संकेत माना जा रहा है.

लालू का कार्यक्रम में आना इसलिए भी अहम है, क्योंकि कुछ महीने पहले तक उन्होंने तेज प्रताप के व्यवहार को पारिवारिक मूल्यों और परंपराओं के खिलाफ बताते हुए उनसे पूरी तरह दूरी बना ली थी.

पार्टी से निष्कासन और निजी विवाद

मई 2024 में तेज प्रताप यादव को RJD से छह साल के लिए निष्कासित कर दिया गया था. इसकी वजह उनका एक सोशल मीडिया पोस्ट बना, जिसमें उन्होंने शादीशुदा होने के बावजूद 12 साल के रिश्ते का खुलासा किया था. तेज प्रताप की शादी 2018 में ऐश्वर्या राय से हुई थी, जो पूर्व मुख्यमंत्री दरोगा प्रसाद राय की पोती हैं. पोस्ट हटाने के बावजूद लालू प्रसाद ने कड़ा फैसला लेते हुए उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया और पारिवारिक संबंध भी तोड़ने की घोषणा की. इसके बाद तेज प्रताप ने सितंबर 2024 में अपनी अलग पार्टी जनशक्ति जनता दल (JJD) का गठन किया. बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बनी इस पार्टी के जरिए उन्होंने खुद को राजनीतिक रूप से प्रासंगिक बनाए रखने की कोशिश की.

चुनावी हार और नए विकल्पों की तलाश

तेज प्रताप यादव दो बार विधायक रह चुके हैं और राज्य सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं. उन्होंने JJD के उम्मीदवार के तौर पर महुआ विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें चिराग पासवान की अगुवाई वाली लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के उम्मीदवार के हाथों हार का सामना करना पड़ा. इस हार के बाद तेज प्रताप की राजनीतिक जमीन और कमजोर होती नजर आई.

इसी पृष्ठभूमि में अब वे नए विकल्पों की तलाश में दिख रहे हैं. बुधवार को जब उनसे पूछा गया कि क्या बीजेपी उन्हें विधान परिषद भेज सकती है, तो उन्होंने कहा, “हर कोई राजनीति में आगे बढ़ना चाहता है. मेरे पिता भी प्रधानमंत्री बनने का सपना देखते थे. अगर मुझे कोई जिम्मेदारी दी जाती है, तो मैं उसे स्वीकार करूंगा. तेजस्वी को नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी दी गई है.”

Photo Credit: ANI

बीजेपी और NDA की ओर झुकाव?

तेज प्रताप का यह बयान और इससे एक दिन पहले उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा के दही-चूड़ा कार्यक्रम में उनकी मौजूदगी, दोनों ही संकेत देते हैं कि वे NDA खेमे के करीब जा रहे हैं. जब उनसे पूछा गया कि क्या वे NDA में शामिल होंगे, तो उन्होंने कहा, “हमारी राजनीतिक विचारधाराएं अलग हो सकती हैं, लेकिन हमारी सांस्कृतिक जड़ें एक जैसी हैं. बाकी चीजें समय आने पर पता चल जाएंगी.”

सूत्रों के मुताबिक, तेज प्रताप बीजेपी में शामिल होकर MLC बनने के विकल्प पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं, ताकि बिहार की राजनीति में अपनी मौजूदगी बनाए रख सकें. उन्होंने जनता दल (यूनाइटेड) से भी संपर्क साधने की कोशिश की थी, लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की ओर से अब तक कोई खास सकारात्मक संकेत नहीं मिले हैं.

दही-चूड़ा और सियासी संदेश

पटना में बुधवार को दही-चूड़ा के दो और बड़े आयोजन हुए. एक आयोजन JD(U) के सोनबरसा विधायक रत्नेश सदा ने NDA नेताओं के लिए रखा, जबकि दूसरा बीजेपी ने अपने नेताओं के लिए आयोजित किया. रत्नेश सदा ने सीट बंटवारे के दौरान अपनी सीट छिनने की कोशिशों का जिक्र करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ही सुनिश्चित किया कि वे उसी सीट से चुनाव लड़ें.

बीजेपी के कार्यक्रम में भोजपुरी गायक पवन सिंह की मौजूदगी भी चर्चा में रही. अटकलें हैं कि अप्रैल में बिहार से राज्यसभा की पांच सीटें खाली होने वाली हैं और पवन सिंह को राज्यसभा भेजा जा सकता है.

त्योहार, राजनीति और भविष्य के संकेत

बिहार में दही-चूड़ा भोज, इफ्तार पार्टी जैसे आयोजन सिर्फ सामाजिक मेल-जोल नहीं होते, बल्कि ये राजनीतिक संदेश देने के मजबूत मंच भी होते हैं. मकर संक्रांति के आसपास होने वाला दही-चूड़ा भोज नेताओं के बीच नजदीकियां और दूरियां दोनों दिखाता है.

इस बार तेज प्रताप यादव का रुख, बीजेपी नेताओं की मौजूदगी और लालू प्रसाद यादव की अप्रत्याशित भागीदारी ने यह साफ कर दिया है कि बिहार की राजनीति में कुछ बड़ा बदलाव पक रहा है. सवाल यही है कि क्या यह पिता-पुत्र के रिश्तों में स्थायी सुधार की शुरुआत है, या फिर यह सिर्फ एक राजनीतिक मजबूरी से उपजा अस्थायी मेल है. आने वाले दिनों में तेज प्रताप का अगला कदम और लालू का रवैया, दोनों ही बिहार की राजनीति की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे.

तेज प्रताप यादवलालू प्रसाद यादव
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